Supreme Court order on passive euthanasia
संदर्भ:
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नोएडा ज़िला अस्पताल को 31 वर्षीय व्यक्ति की स्थिति और उसके पिता की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की याचिका का आकलन करने के लिए एक प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया है।
हरिश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु संबंधी याचिका:
हरिश राणा 2013 की दुर्घटना के बाद से Permanent Vegetative State (PVS) में हैं और 100% विकलांगता के साथ पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले उनकी इच्छामृत्यु की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह मशीनों पर निर्भर नहीं हैं। हाल में स्वास्थ्य और पीड़ा बढ़ने पर उनके पिता ने फिर से निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति माँगी। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने 2018 और 2023 के दिशानिर्देशों के आधार पर नोएडा जिला अस्पताल को प्राथमिक मेडिकल बोर्ड बनाकर उनकी स्थिति का मूल्यांकन करने का आदेश दिया है, जिससे यह तय हो सके कि जीवन-रक्षक उपचार हटाना चिकित्सकीय रूप से उचित है या नहीं।
क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु वह प्रक्रिया है जिसमें किसी गंभीर, असाध्य या अपरिवर्तनीय अवस्था (जैसे Permanent Vegetative State या terminal illness) में पहुँचे मरीज के जीवन-रक्षक उपचारों को हटाया या रोका जाता है, ताकि मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो सके।
- इसमें डॉक्टर कोई सक्रिय कदम (जैसे घातक दवा देना) नहीं उठाते, बल्कि उपचार—जैसे वेंटिलेटर, कृत्रिम पोषण, फीडिंग ट्यूब या जीवन-लंबित दवाइयाँ—बंद कर दी जाती हैं।
- इसका उद्देश्य जीवन समाप्त करना नहीं, बल्कि अत्यधिक कष्ट से मुक्ति दिलाना है, जब चिकित्सकीय रूप से सुधार की कोई संभावना न हो।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का विधिक ढांचा:
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पूरा ढांचा सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक फैसलों द्वारा स्थापित है।
- अरुणा शानबाग केस (2011): सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 2011 में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित रूप में स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि इसे केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में अनुमति दी जा सकती थी। निर्णय का अधिकार अदालत और डॉक्टरों की टीम पर में रखा गया।
- कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018): 2018 के ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि: “सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार (Right to Die with Dignity), अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।” इसके साथ न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध घोषित किया।
- लिविंग विल/Advance Medical Directive को मान्यता दी गई, जिसमें कोई व्यक्ति पहले से लिखकर तय कर सकता है कि असाध्य अवस्था में उसे जीवन-रक्षक उपचार न दिए जाएँ।
- इस फैसले में मरीज के निर्णय को सर्वोपरि माना जाएगा (यदि लिविंग विल मौजूद है)। इसमें दो स्तर के मेडिकल बोर्ड अनिवार्य थे।
- संशोधित दिशानिर्देश (2023): 2018 की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल थी, इसलिए 2023 में कोर्ट ने इसे सरलीकृत किया। नई प्रक्रिया में: मेडिकल बोर्डों की संरचना सरल हुई।
- Judicial Magistrate की भूमिका औपचारिक और कम बोझिल की गई।
- अस्पतालों को निर्देश दिया गया कि वे Advance Directives का रिकॉर्ड बनाए रखें।
- मरीज के लिविंग विल को वैध मानने से पहले प्राथमिक मेडिकल बोर्ड द्वारा उसकी स्थिति का मूल्यांकन करने का निर्देश दिया गया।
- इसकी अनुमति मिलने पर द्वितीयक बोर्ड स्वतंत्र रूप से निर्णय की पुष्टि की जा सकती है, जिसके लिए परिजनों की सहमति आवश्यक है।
नैतिक-संवैधानिक विमर्श:
- संवैधानिक मूल्य: इच्छामृत्यु पर विमर्श भारत के मूल संवैधानिक सिद्धांतों – व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता, स्वायत्तता, और मानवीय मूल्य – को पुनः परिभाषित करता है। लंबी पीड़ा झेल रहे व्यक्ति को अनंत कष्ट में बांधे रखना अनुच्छेद 21 की गरिमा के अवधारणा के विरुद्ध है।
- चिकित्सकीय दायित्व: चिकित्सकीय आचार संहिता में “कष्ट को कम करने” का कर्तव्य सर्वोच्च माना जाता है। लेकिन ‘अच्छी मृत्यु’ (Good Death) की अवधारणा आधुनिक चिकित्साशास्त्र का महत्वपूर्ण सिद्धांत बन चुकी है।
- चुनौतियाँ: Living Will के प्रति जनजागरूकता अत्यंत कम है। अस्पतालों में मेडिकल बोर्ड बनाने की क्षमता हर जगह नहीं है। परिवारों पर भावनात्मक-आर्थिक दबाव निर्णय को जटिल बना देता है।

