Supreme Court stays new definition of Aravalli

संदर्भ:
हाल ही में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अरावली पहाड़ियों को परिभाषित करने के लिए ‘100 मीटर की ऊंचाई’ का मानक तय करने संबंधी आदेश पर रोक लगा दी है।
हालिया विवाद की पृष्ठभूमि:
- नवंबर 2025 का निर्णय: नवंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तावित परिभाषा को स्वीकार किया था। इसके अनुसार, केवल उन्हीं भू-आकृतियों को ‘अरावली पहाड़ी’ माना गया था जो जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची थीं।
- पर्यावरणविदों की चिंता: इस परिभाषा के तहत अरावली रेंज वह होगी जब दो ऐसी पहाड़ियाँ (100 मीटर+) एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हों। इस मानक के कारण अरावली के लगभग 90% क्षेत्र से सुरक्षा कवच हट जाने का खतरा पैदा हो गया था, क्योंकि अधिकांश छोटी पहाड़ियाँ और कम ऊँचाई वाली पर्वतमालाएँ इस परिभाषा से बाहर हो रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने के प्रमुख कारण:
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance): जन आक्रोश और पर्यावरण समूहों के विरोध के बाद, मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया।
- संरचनात्मक विरोधाभास (Structural Paradox): न्यायालय ने टिप्पणी की कि 100 मीटर से कम ऊँची पहाड़ियों को बाहर रखने से पारिस्थितिक अखंडता खंडित हो सकती है और विनियमित खनन के नाम पर विनाशकारी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
- वैज्ञानिक अस्पष्टता: न्यायालय ने संदेह व्यक्त किया कि क्या 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 को सुरक्षित मानना वैज्ञानिक रूप से सही है। नई परिभाषा के कारण उन क्षेत्रों में खनन के रास्ते खुल सकते थे जो पहले ‘वन’ या ‘अरावली’ के रूप में संरक्षित थे।
उच्चतम न्यायालय के नवीनतम निर्देश:
- आदेश पर स्थगन: नवंबर 2025 के निर्णय को ‘अबेयन्स’ (Abeyance) यानी स्थगित रखा गया है।
- विशेषज्ञ समिति का गठन: न्यायालय ने अब इस मामले की नए सिरे से जांच करने के लिए एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश दिया है। जो अरावली की परिभाषा, पारिस्थितिक निरंतरता और खनन के प्रभावों की समीक्षा करेगी।
- खनन पर रोक: अगली सुनवाई (21 जनवरी 2026) तक अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों (Leases) के आवंटन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
- राज्य सरकारों को नोटिस: दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात सरकारों को इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया गया है।
अरावली पहाड़ियों का पारिस्थितिक महत्व:
- मरुस्थलीकरण रोकना: अरावली रेंज थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने वाली एक महत्वपूर्ण ‘हरी दीवार’ (Green Wall) है।
- जलभृत पुनर्भरण (Groundwater Recharge): यह क्षेत्र उत्तर भारत के लिए एक विशाल वाटरशेड है, जो दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में भूजल स्तर बनाए रखता है।
- जैव विविधता: यह तेंदुआ, चिंकारा और कई प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक आवास है।
- जलवायु नियामक: यह उत्तर भारत की धूल भरी आंधियों को रोकने और तापमान को नियंत्रित करने में बफर की भूमिका निभाती है।
