UGC issues Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations 2026

संदर्भ:
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में समावेशिता सुनिश्चित करने और भेदभाव को खत्म करने के लिए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) विनियम, 2026’ अधिसूचित किए हैं।
UGC के नए नियमों के प्रमुख प्रावधान:
- भेदभाव की विस्तारित परिभाषा: ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा में अब स्पष्ट रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है। पहले के मसौदे में केवल SC और ST का उल्लेख था, जिसकी आलोचना के बाद यह बदलाव किया गया।
- समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres – EOC): प्रत्येक संस्थान को अनिवार्य रूप से एक स्थायी EOC स्थापित करना होगा। यह केंद्र वंचित समूहों के छात्रों और कर्मचारियों को शैक्षणिक, सामाजिक और वित्तीय मार्गदर्शन प्रदान करेगा।
- इक्विटी समितियां (Equity Committees): EOC के तहत एक ‘इक्विटी समिति’ का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता संस्थान का प्रमुख करेगा। इस समिति में SC, ST, OBC, दिव्यांग व्यक्तियों और महिलाओं का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
- त्वरित शिकायत निवारण तंत्र: संस्थानों को 24-घंटे काम करने वाली हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली संचालित करनी होगी। इसके अंर्तगत शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक होनी चाहिए। 7 दिनों में कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए।
- इक्विटी स्क्वॉड और एंबेसडर: हॉस्टल, लाइब्रेरी और सामान्य क्षेत्रों में भेदभाव रोकने के लिए ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और जागरूकता के लिए विभागों में ‘इक्विटी एंबेसडर’ नियुक्त किए जाएंगे।
- झूठी शिकायतों पर रुख में बदलाव: 2012 के नियमों और शुरुआती मसौदे में झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान था, जिसे अब हटा दिया गया है ताकि वास्तविक शिकायतकर्ता डरे नहीं।
- दंडात्मक कार्रवाई: नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों के खिलाफ UGC कड़ी कार्रवाई कर सकता है, जिसमें UGC की योजनाओं के तहत अनुदान और वित्तीय सहायता पर रोक, डिग्री प्रदान करने या नए कार्यक्रम (दूरी/ऑनलाइन मोड) शुरू करने पर प्रतिबंध, UGC की मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से नाम हटाया जाना शामिल है।
संवैधानिक आधार:
ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक कदम हैं। यह अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर याचिका पर दिए गए निर्देशों का परिणाम है। जहां न्यायालय ने संस्थानों को केवल “तटस्थ” रहने के बजाय “सक्रिय निवारक उपाय” करने का आदेश दिया था।
