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संयुक्त राष्ट्र का राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता समझौता आधिकारिक रूप से प्रभावी हुआ (UN Non-Nationally Relevant Agreement on Biological Diversity Officially Enters Into Effect) | Ankit Avasthi sir

UN Non-Nationally Relevant Agreement on Biological Diversity Officially Enters Into Effect

UN Non-Nationally Relevant Agreement on Biological Diversity Officially Enters Into Effect

संदर्भ:

संयुक्त राष्ट्र का राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता (Biodiversity Beyond National Jurisdiction – BBNJ) समझौता, आधिकारिक रूप से 17 जनवरी 2026 को लागू हो गया है, जो खुले समुद्र की रक्षा के लिए पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा प्रदान करता है। 

पृष्ठभूमि और विकास:

  • UNCLOS के तहत समझौता: BBNJ समझौता ‘समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ (UNCLOS, 1982) के ढांचे के भीतर विकसित किया गया है। यह UNCLOS के तहत तीसरा कार्यान्वयन समझौता है; इससे पहले 1994 में गहरे समुद्री तल के खनिज संसाधनों और 1995 में मछली भंडार (Fish Stocks) पर समझौते हुए थे।
  • वार्ता का सफर: इसकी आधिकारिक वार्ता 2008 में शुरू हुई और लगभग 15 वर्षों की जटिल चर्चाओं के बाद मार्च 2023 में इसे अंतिम रूप दिया गया।
  • लागू होने की प्रक्रिया: सितंबर 2025 में 60वें देश (मोरक्को) द्वारा इसके अनुसमर्थन (Ratification) के बाद, यह 17 जनवरी 2026 को प्रभावी हुआ। 

संधि के चार मुख्य स्तंभ:

  • समुद्री आनुवंशिक संसाधन (Marine Genetic Resources – MGRs): इसमें गहरे समुद्र के जीवों (जैसे जीवाणु, प्रवाल) से प्राप्त आनुवंशिक सामग्री के वाणिज्यिक उपयोग से होने वाले लाभों को साझा करने की व्यवस्था है। 
  • क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण (ABMTs): इसमें समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (Marine Protected Areas – MPAs) की स्थापना के लिए कानूनी प्रावधान शामिल हैं। इसका उद्देश्य ’30×30′ लक्ष्य (2030 तक 30% महासागरों की रक्षा) को प्राप्त करना है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): खुले समुद्र में प्रदूषण या पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी गतिविधि (जैसे गहरे समुद्र में खनन) से पहले उसका कड़ा पर्यावरणीय मूल्यांकन करना अनिवार्य होगा।
  • क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: इसका उद्देश्य विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को समुद्री प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक ज्ञान प्रदान करना है ताकि वे संधि को लागू करने में सक्षम हो सकें। 

संधि का दायरा:

  • खुला समुद्र (High Seas): यह संधि उन क्षेत्रों को कवर करती है जो किसी भी देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) (तट से 200 समुद्री मील) से परे हैं। ये क्षेत्र विश्व के महासागरों का 64% और पृथ्वी की सतह का लगभग 50% हिस्सा हैं।
  • गवर्नेंस गैप को भरना: अब तक खुले समुद्र के केवल 1% हिस्से का ही संरक्षण किया जाता था। यह संधि इन अनियमित क्षेत्रों में “मानव जाति की साझा विरासत” के सिद्धांत को लागू करती है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण: यह जलवायु परिवर्तन, अति-मत्स्यन (Overfishing) और समुद्री प्रदूषण (विशेषकर प्लास्टिक) जैसी चुनौतियों से निपटने में सहायक होगी। 

भारत का दृष्टिकोण और स्थिति:

  • हस्ताक्षरकर्ता: भारत ने 25 सितंबर 2024 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे।
  • वर्तमान स्थिति (2026): जनवरी 2026 तक, भारत ने संधि पर हस्ताक्षर तो कर दिए हैं लेकिन इसका पूर्ण अनुसमर्थन अभी लंबित है। भारत वर्तमान में घरेलू कानूनों (जैसे जैविक विविधता अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम) को इस संधि के अनुरूप ढालने के लिए एक 12-सदस्यीय समिति के माध्यम से कानून का मसौदा तैयार कर रहा है।
  • नोडल मंत्रालय: भारत में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences) इस समझौते के कार्यान्वयन के लिए नोडल एजेंसी है। 

चुनौतियाँ:

  • प्रमुख देशों का रुख: जहाँ चीन और यूरोपीय संघ ने इसका अनुसमर्थन किया है, वहीं अमेरिका जैसे कुछ बड़े देशों ने अभी तक इसे आधिकारिक रूप से नहीं अपनाया है, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • क्षेत्रीय विवाद: दक्षिण चीन सागर जैसे विवादित समुद्री क्षेत्रों में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना करना जटिल होगा।
  • निगरानी और धन: विशाल खुले समुद्र की निगरानी के लिए व्यापक वित्तीय संसाधनों और उन्नत उपग्रह प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होगी।

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