Zanskar ponies included for the first time in the 77th Republic Day parade
संदर्भ:
77वें भारतीय गणतंत्र दिवस 2026 की परेड में पहली बार ज़ांस्कर टट्टू (Zanskar Ponies) को भारतीय सेना के ‘मौन योद्धा’ के रूप में प्रदर्शित किया गया।
ज़ांस्कर टट्टू के बारे में:
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- परिचय: ये मुख्य रूप से लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के कारगिल जिले की जांस्कर घाटी में पाई जाती है। यह समुद्र तल से 3,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर रहने के लिए अनुकूलित है। इन्हें ज़ांस्कारी या चंगथांगी घोड़ा भी कहा जाता है।
- शारीरिक विशेषताएँ: यह नस्ल मध्यम आकार की (ऊंचाई: 120-140 सेमी) होती है। इनका रंग आमतौर पर धूसर (Grey) होता है। इनके शरीर पर घने और चमकदार बाल होते हैं जो इन्हें -40°C तक की भीषण ठंड से बचाते हैं।
- अद्वितीय चाल (Gait): जांस्कर पोनी दुनिया की कुछ चुनिंदा ‘नेचुरल पेसर’ नस्लों में से एक है। यह तिरछे चलने के बजाय एक ही तरफ के पैरों को एक साथ उठाकर चलती है, जिससे सवार को झटके कम लगते हैं।
- हाइपोक्सिया अनुकूलन: यह नस्ल कम ऑक्सीजन (hypoxia) वाले वातावरण में कार्य करने के लिए आनुवंशिक रूप से विकसित है, जो इसे सियाचिन जैसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बनाती है।
- सहनशक्ति: ये पोनी 40 से 60 किलोग्राम तक का भार उठाकर 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर गश्त कर सकती हैं। ये एक दिन में 70 किलोमीटर तक की दूरी तय करने में सक्षम हैं।
भारतीय सेना में भूमिका:
- जांस्कर पोनी को 2020 में औपचारिक रूप से सेना के रीयूंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) में शामिल किया गया था।
- लॉजिस्टिक्स सपोर्ट: Siachen (सियाचिन) और LOC (लाइन ऑफ कंट्रोल) के पास, जहां गाड़ियां नहीं जा सकतीं, ज़ांस्कर टट्टू गोला-बारूद, भोजन और अन्य रसद पहुँचाते हैं।
- माउंटेड पेट्रोलिंग: सीमावर्ती क्षेत्रों में गश्त के लिए, ये टट्टू सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं।
- प्रशिक्षण: भारतीय सेना ने लद्दाख में दुनिया के सबसे ऊंचे हॉर्स ब्रीडिंग फार्म में इनके लिए ‘ज़ांस्कर टट्टू ब्रीडिंग एंड ट्रेनिंग सेंटर’ स्थापित किया है।
संरक्षण की स्थिति:
- जांस्कर पोनी वर्तमान में एक ‘लुप्तप्राय नस्ल’ की श्रेणी में आती है।
- मशीनीकरण और अन्य घोड़ों के साथ संकरण के कारण इनकी शुद्ध वंश परंपरा खतरे में है। वर्तमान में इनकी संख्या 346 के करीब आंकी गई है।
- 2024 में, ICAR-NRC (राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र) ने भ्रूण स्थानांतरण तकनीक के माध्यम से देश के पहले जांस्कर बछेड़े ‘राज-जांस्कर’ का जन्म सुनिश्चित किया।

