Assam passes bill to provide land rights to tea garden workers

संदर्भ:
हाल ही में असम विधानसभा द्वारा The Assam Fixation of Ceiling on Land Holding (Amendment) Bill, 2025 पारित किया गया, जो राज्य के चाय बागान श्रमिकों को प्रथम बार व्यवस्थित रूप से भूमि स्वामित्व प्रदान करने का ऐतिहासिक प्रयास है।
भूमि स्वामित्व विधेयक के मुख्य प्रावधान:
- विधेयक का मुख्य प्रावधान लगभग 3 लाख चाय बागान श्रमिक परिवारों को वैध भूमि पट्टा (title deed) प्रदान करना है। इसके तहत बागान क्षेत्रों में स्थित लेबर लाइंस तथा उनके आसपास की उपलब्ध भूमि का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर वैध स्वामित्व सौंपने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जो कई चरणों में लागू होगी।
- विधेयक के अनुसार, प्रदान की गई भूमि 20 वर्ष तक गैर-हस्तांतरणीय (non-transferable) रहेगी। इस अवधि के बाद भी यदि बिक्री की आवश्यकता हो तो भूमि केवल किसी अन्य चाय बागान श्रमिक परिवार को ही बेची जा सकेगी, ताकि भूमि का वाणिज्यिक दुरुपयोग, कॉर्पोरेट अधिग्रहण या बड़े भू-स्वामी समूहों द्वारा कब्ज़ा रोका जा सके।
- विधेयक में यह भी प्रावधान है कि भूमि आवंटन का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित किया जाएगा, सर्वेक्षण प्रक्रिया पारदर्शी होगी और प्राथमिकता उन परिवारों को दी जाएगी जो पीढ़ियों से बागान क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं।
- इसमें राज्य सरकार भूमि पट्टा मिलने के बाद चाय बागान श्रमिक परिवारों को आवास निर्माण सहायता, मूलभूत संरचना हेतु अनुदान, तथा लाभार्थी-आधारित कल्याण योजनाओं से भी जोड़ेगी।
विधेयक को लागू करने की आवश्यकता क्यों?
असम का चाय उद्योग लगभग 200 वर्ष पुराना है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान 19वीं सदी में झारखंड, ओडिशा, बंगाल और छत्तीसगढ़ से हजारों आदिवासी समुदायों—जैसे ओरांव, संथाल, मुंडा को असम के चाय बागानों में काम करने के लिए लाया गया। वे बंधनकारी और शोषणकारी श्रम अनुबंधों के माध्यम से लाए गए। तब से अब तक चाय श्रमिक समुदायों के पास किसी भी प्रकार का भूमि स्वामित्व, कृषि योग्य भूमि, या आवासीय पट्टा नहीं है। इस कारण वे न तो सरकारी योजनाओं का पूर्ण लाभ ले सके और न ही सामाजिक-आर्थिक उन्नति कर पाए।
चाय जनजाति समुदाय का सामाजिक-आर्थिक महत्व:
- जनसांख्यिक प्रभाव: असम में चाय जनजाति समुदाय कुल जनसंख्या का लगभग 17–20% हिस्सा बनाता है और 126 में से लगभग 35–40 विधानसभा सीटों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है।
- आर्थिक प्रभाव: यह समुदाय असम की लगभग 50% चाय उत्पादन क्षमता का आधार है, जो भारत की कुल चाय उत्पादन का बड़ा भाग है। यह दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक क्षेत्रों में से एक बन गया है।
- सांस्कृतिक पहचान: इनके पारंपरिक त्योहार, झुमैर नृत्य, सामुदायिक संरचना और आदिवासी सांस्कृतिक तत्व असम की बहुसांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करते हैं। सरकार इन्हें Tea and Ex-Tea Garden Tribes के रूप में मान्यता देती है और OBC वर्ग में शामिल करती है।
सकारात्मक प्रभाव एवं चुनौतियां:
- सकारात्मक प्रभाव: भूमि स्वामित्व मिलने से चाय बागान श्रमिकों का आवासीय सुरक्षा, सामाजिक पहचान, और आर्थिक स्वावलंबन मजबूत होगा। वे अब घर निर्माण, सरकारी योजनाओं, बैंक ऋण, और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का अधिक लाभ ले सकेंगे।
- चुनौतियां: उपलब्ध भूमि केवल 2–2.5 लाख बीघा है, जबकि श्रमिक परिवार 3.5 लाख से अधिक हैं। प्रति परिवार भूमि का आकार सीमित हो सकता है, जिससे कृषि-आधारित स्वावलंबन बाधित हो सकता है। चार क्षेत्रों (riverine chars) में रहने वाले अन्य समुदायों को भी भूमि अधिकार देने की मांग उठाई गई है।
