Pillar remains of Yadava period temple discovered
संदर्भ:
हाल ही में महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट (Hinganghat) में हाल ही में 12वीं शताब्दी के यादव कालीन (Yadava-era) मंदिर के स्तंभ के अवशेष मिले।
यादव कालीन मंदिर के स्तंभ अवशेष:
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- स्थान: यह अवशेष वर्धा जिले के हिंगनघाट कस्बे के पास वेणा नदी (Vena River) के तट पर पाए गए हैं।
- शोधकर्ता: मूर्ति शोधकर्ता पंचशील ठुल (Panchsheel Thul) और प्रवीण काडू (Pravin Kadu) ने इन नक्काशीदार पत्थरों की पहचान की, जो पहले सामान्य पत्थर प्रतीत हो रहे थे।
- संरचना: अवशेषों में एक नक्काशीदार स्तंभ और संभवतः मंदिर के गर्भगृह के सामने वाले सभा-मंडप का आधार (Pedestal) शामिल है।
- पत्थर: ये स्तंभ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध काले बेसाल्ट (Black Basalt) पत्थर से निर्मित हैं।
- स्थापत्य शैली: यह खोज यादव वंश के प्रसिद्ध हेमाडपंथी स्थापत्य की पुष्टि करते है:
- बिना चूने का उपयोग: इस शैली में पत्थरों को बिना किसी चूने या गारे (Mortar) के, इंटरलॉकिंग (Interlocking) तकनीक से जोड़ा जाता था।
- नक्काशी: स्तंभों पर कमल के फूल (Lotus motif) की सूक्ष्म नक्काशी यादव कालीन कारीगरी की उत्कृष्ट मिसाल है।
- कठोरता: बेसाल्ट जैसे कठोर पत्थर पर इतनी बारीकी से काम करना उस समय के उन्नत कौशल को दर्शाता है।
- सांस्कृतिक समृद्धि: यह खोज मौर्य और वाकाटक काल के बाद मध्यकाल में भी विदर्भ क्षेत्र की अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि का नया साक्ष्य प्रदान करती है।
यादव राजवंश के बारे में:
- शासन काल: 12वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान इनका शासन तुंगभद्रा से नर्मदा नदी तक फैला था।
- राजधानी: देवगिरी (वर्तमान दौलताबाद), जो अपनी अभेद्य किलेबंदी के लिए प्रसिद्ध थी।
- महान शासक: भिल्लम पंचम (Bhillama V) ने स्वतंत्रता घोषित की और सिंघण द्वितीय (Singhana II) के समय साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था।
- सांस्कृतिक योगदान:
- इन्होंने मराठी भाषा को राजकीय भाषा बनाया और इसके विकास को प्रोत्साहित किया।
- संत ज्ञानेश्वर (Dnyaneshwari के लेखक) इसी कालखंड के थे।
- उनके मंत्री हेमाद्रि ने ‘चतुर्वर्ग चिंतामणि’ लिखी और हेमाडपंथी शैली को लोकप्रिय बनाया।

