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स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 (State of India Environment 2026) | Apni Pathshala

State of India Environment 2026

State of India Environment 2026

संदर्भ:

हाल ही में ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (CSE) और ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका द्वारा ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरमेंट 2026’ (SOE 2026) रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु संकट और पारिस्थितिक गिरावट का एक व्यापक विश्लेषण प्रदान किया गया है। 

स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 के मुख्य बिंदु:

  • प्लेनेटरी बाउंड्रीज का उल्लंघन: रिपोर्ट की सबसे गंभीर चेतावनी यह है कि मानवता ने पृथ्वी की स्थिरता बनाए रखने वाली 9 में से 7 सीमाओं (Planetary Boundaries) को पार कर लिया है। 
  • सातवीं सीमा: ‘महासागरीय अम्लीकरण’ (Ocean Acidification) अब सातवीं ऐसी सीमा बन गई है जिसे पार कर लिया गया है।
  • अन्य उल्लंघन: जलवायु परिवर्तन, जीवमंडल अखंडता (Biosphere Integrity), भूमि प्रणाली परिवर्तन, ताजे पानी का क्षरण, जैव-भू-रासायनिक प्रवाह (Biogeochemical flows), और नवीन इकाइयाँ (Novel entities जैसे प्लास्टिक और रसायन)।
  • प्रभाव: औद्योगिक युग के बाद से महासागरीय अम्लता में 30-40% की वृद्धि हुई है, जो समुद्री पारिस्थितिक तंत्र (कोरल और प्लवक) के लिए खतरा है।
  • चरम मौसम की घटनाएं: वर्ष 2025 भारत के लिए जलवायु की दृष्टि से अत्यंत विनाशकारी रहा है:
  • आवृत्ति: 1 जनवरी से 30 नवंबर 2025 के बीच 99% दिनों में भारत के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम दर्ज किया गया।
  • मानवीय क्षति: इन घटनाओं के कारण 4,419 लोगों की मृत्यु हुई।
  • कृषि पर प्रभाव: कम से कम 17.41 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ, जो खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
  • सर्वाधिक प्रभावित राज्य: हिमाचल प्रदेश, केरल और मध्य प्रदेश। 
  • वायु प्रदूषण की निगरानी में असमानता: रिपोर्ट में भारत के वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क में गंभीर संरचनात्मक कमियों को उजागर किया गया है:
  • निगरानी की कमी: भारत की 85% जनसंख्या (लगभग 1.2 बिलियन लोग) ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ 10 किमी के दायरे में कोई निरंतर वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (CAAQMS) नहीं है।
  • शहरी केंद्रित: वर्तमान नेटवर्क मुख्य रूप से राज्य की राजधानियों और मेट्रो शहरों तक सीमित है, जबकि औद्योगिक बेल्ट और ग्रामीण इलाके डेटा के अभाव में हैं। 
  • जैव विविधता:
  • बाघों का व्यवहार: आवास की कमी और संरक्षित क्षेत्रों (Reserves) में बाघों की संख्या बढ़ने के कारण उनके व्यवहार में बदलाव आया है।
  • संघर्ष में वृद्धि: बाघ अब भोजन और क्षेत्र की तलाश में संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकल रहे हैं, जिससे मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं। 2025 की पहली छमाही में ही बाघों के हमलों में 43 लोगों की मौत हुई।
  • आक्रामक प्रजातियां: ‘लैंटाना कैमारा’ (Lantana camara) जैसी विदेशी आक्रामक प्रजातियों के प्रसार ने स्थानीय चारे को विस्थापित कर दिया है। 
  • जल और मृदा स्वास्थ्य:
  • ताजे पानी का संकट: जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन के कारण भारत के जल भंडार गंभीर तनाव में हैं।
  • भूमि क्षरण: बहाली के प्रयासों के बावजूद, भारत की 29.77% भूमि अभी भी खराब (Degraded) है। राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में मरुस्थलीकरण का खतरा बना हुआ है। 

नीतिगत सुझाव:

  • रिपोर्ट के अनुसार, भारत को “प्रतिक्रियात्मक मुआवजे” (Reactive compensation) से हटकर “सक्रिय बहाली” (Proactive restoration) की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। 
  • प्रकृति-आधारित समाधान: बाढ़ नियंत्रण के लिए आर्द्रभूमियों (Wetlands) का पुनरुद्धार और जलभृतों (Aquifers) का पुनर्भरण आवश्यक है।
  • डाटा गैप को भरना: गैर-फ्लैगशिप प्रजातियों (जैसे कीड़े, कवक) और ग्रामीण वायु गुणवत्ता पर अधिक डेटा एकत्र करने की आवश्यकता है।
  • जलवायु अनुकूलन: बुनियादी ढांचे (जैसे पुल, सड़कें) के डिजाइन में जलवायु विज्ञान को एकीकृत करना अनिवार्य है।

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