संसदीय समिति ने ‘Polar Ambassador’ नियुक्त करने की सिफारिश की, जानिए क्या होते है?
संदर्भ:
हाल ही में शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट ‘आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भारत की भूमिका और उपस्थिति’ में सरकार को एक समर्पित ‘ध्रुवीय राजदूत (Polar Ambassador)’ नियुक्त करने की सिफारिश की.
ध्रुवीय राजदूत (Polar Ambassador) क्या होते है?
- परिचय: ध्रुवीय राजदूत (Polar Ambassador) एक विशेष राजनयिक पद है जो किसी देश की विदेश नीति में दोनों ध्रुवों (आर्कटिक और अंटार्कटिक) से जुड़े रणनीतिक, वैज्ञानिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक मामलों का नेतृत्व करता है.
- ध्रुवीय मामलों के लिए एक विशेष और संस्थागत दूत या राजदूत नियुक्त करने का विचार 21वीं सदी की शुरुआत में तेजी से उभरा.
- कार्य: आर्कटिक परिषद (Arctic Council) और अंटार्कटिक संधि प्रणाली (ATS) जैसे वैश्विक मंचों पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करना और ध्रुवीय क्षेत्रों में संसाधनों के दोहन पर वैश्विक रणनीतियां तैयार करना.
- संसदीय समिति की सिफारिश:
- प्रस्तावित पद: यह भारत के विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs – MEA) के अंतर्गत अन्य देशों के समकक्ष स्तर का एक विशेष राजनयिक पद होगा.
- समर्पित डेस्क: इसके साथ ही विदेश मंत्रालय में एक विशिष्ट ‘ध्रुवीय और अंटार्कटिक मामले डेस्क’ (Polar and Antarctic Affairs Desk) स्थापित करने का सुझाव दिया गया है.
- एकीकृत दृष्टिकोण: यह पद भारत के वैज्ञानिक अनुसंधानों और विदेशी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं को एक साझा मंच पर लाने का काम करेगा.
- भूमिका और कार्य:
- पूर्ण सदस्यता की प्राप्ति: वर्तमान में भारत आर्कटिक परिषद (Arctic Council) में केवल एक ‘पर्यवेक्षक देश’ (Observer Country) है. इस पद का मुख्य उद्देश्य भारत को परिषद की पूर्णकालिक सदस्यता दिलाना है.
- वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व: ध्रुवीय क्षेत्रों के प्रशासन और नीतियों में विकासशील देशों (Global South) की सामूहिक चिंताओं और हितों को मजबूती से उठाना.
- नीतिगत विस्तार: भारत की वर्तमान आर्कटिक नीति (2022) को केवल वैज्ञानिक अनुसंधान (Polar Science) तक सीमित न रखकर उसमें भू-राजनीति, रणनीति और संसाधनों तक पहुंच को शामिल करना.
- राजनयिक प्रतिनिधित्व: अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे आर्कटिक परिषद और अंटार्कटिक संधि प्रणाली (Antarctic Treaty System) में भारत का पक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना.
- बहुपक्षीय सहयोग: अंटार्कटिक अनुसंधान (Antarctic Research) और जलवायु कूटनीति (Climate Diplomacy) के लिए अन्य सदस्य राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को सुगम बनाना.
- रणनीतिक समन्वय: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES), राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (NCPOR) और विदेश मंत्रालय के बीच सेतु के रूप में कार्य करना.
- तुलनात्मक परिदृश्य: संसदीय समिति ने नोट किया कि आर्कटिक परिषद के सभी आठ सदस्य देशों के अलावा जापान, चीन, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे गैर-आर्कटिक पर्यवेक्षक देशों के पास पहले से ही अपने समर्पित ध्रुवीय या आर्कटिक राजदूत और विशिष्ट विभाग कार्यरत हैं.
समिति की अन्य प्रमुख सिफारिशें:
- अनुसंधान वाहनों की खरीद: भारत के पास वर्तमान में स्वयं का कोई अत्याधुनिक आइस-क्लास ध्रुवीय अनुसंधान वाहन (Polar Research Vehicle) नहीं है, जिसे तुरंत खरीदने की सिफारिश की गई है.
- रूसी आर्कटिक तक पहुंच: यूक्रेन संघर्ष के कारण बाधित वैज्ञानिक कार्यों के बीच, भारत को साइबेरिया स्थित विश्व के बड़े अनुसंधान स्टेशन ‘चेरस्की’ (Chersky Station) तक पहुंच के लिए कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए.
- एशियाई चतुर्भुज (Asian Quad): आर्कटिक प्रशासन (Polar Governance) में समन्वय बढ़ाने के लिए भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर का एक विशेष गठबंधन बनाने का सुझाव दिया गया है.
ध्रुवीय क्षेत्र का महत्व क्या है?
- जलवायु नियंत्रण (Climate Control): ध्रुवों पर जमी सफेद बर्फ सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित (Albedo Effect) कर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित रखती है. ध्रुवों पर होने वाले बदलावों का सीधा असर भारतीय मानसून और वैश्विक समुद्री धाराओं पर पड़ता है.
- विशाल प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources): माना जाता है कि दुनिया का लगभग 22% अनदेखा तेल और प्राकृतिक गैस का भंडार अकेले आर्कटिक क्षेत्र में छिपा है. अंटार्कटिका महाद्वीप पर पृथ्वी के 70% ताजे पानी (Fresh Water) का भंडार बर्फ के रूप में सुरक्षित है.
- इन क्षेत्रों में मूल्यवान दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements) और क्रिटिकल मिनरल्स मौजूद हैं.
- नए व्यापारिक समुद्री मार्ग (Geopolitical & Trade Routes): आर्कटिक की बर्फ पिघलने से ‘नॉर्दर्न सी रूट’ (Northern Sea Route) खुल रहा है. इससे एशिया और यूरोप के बीच समुद्री दूरी लगभग 40% कम हो जाएगी, जिससे ईंधन और समय की भारी बचत होगी.
- वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research): ध्रुवों की प्राचीन बर्फ की परतों में लाखों साल पुराने वायुमंडल के नमूने दबे हैं, जो जलवायु परिवर्तन के अध्ययन के लिए ‘टाइम मशीन’ की तरह काम करते हैं.
भारत के लिए इस पहल का महत्व:
- निर्णायक शक्ति का अभाव दूर करना: वर्तमान में एक ‘पर्यवेक्षक’ के रूप में भारत को आर्कटिक परिषद में वित्तीय योगदान देने या नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं है. ध्रुवीय राजदूत के माध्यम से पूर्ण सदस्यता मिलने पर भारत वैश्विक नीतियों को आकार दे सकेगा.
- मानसून और जलवायु सुरक्षा: अंटार्कटिक और आर्कटिक की बर्फ पिघलने का सीधा संबंध भारतीय मानसून प्रणाली और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से है. भारत की 11,000 किमी से लंबी तटरेखा की सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र की जलवायु कूटनीति (Climate Diplomacy) आवश्यक है.
- संसाधन और ऊर्जा सुरक्षा (Resource Security): आर्कटिक क्षेत्र हाइड्रोकार्बन (तेल और प्राकृतिक गैस) और चिकित्सा उद्योग (APIs), इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आवश्यक क्रिटिकल खनिजों (Critical Minerals) का विशाल भंडार है. भारत की भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए इन संसाधनों तक पहुंच महत्वपूर्ण है.
- रणनीतिक उपस्थिति सुदृढ़ करना: अंटार्कटिका में भारत के दो सक्रिय अनुसंधान केंद्र ‘मैत्री’ (1989) और ‘भारती’ (2012) हैं. समिति ने पुराने पड़ रहे मैत्री स्टेशन के स्थान पर शीघ्र ‘न्यू मैत्री स्टेशन’ के निर्माण पर बल दिया है, जिससे भारत की भू-रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: ध्रुवीय राजदूत नियुक्त करने की सिफारिश क्यों की गई है?
उत्तर: भारत की ध्रुवीय कूटनीति (Polar Diplomacy) को प्रभावी बनाने, विदेशी निर्भरता कम करने और आर्कटिक परिषद (Arctic Council) में पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने के लिए यह सिफारिश की गई है.
प्रश्न 2: ध्रुवीय राजदूत की भूमिका क्या होगी?
उत्तर: यह राजदूत विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों से संबंधित रणनीतिक, आर्थिक और जलवायु नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का नेतृत्व और कूटनीतिक समन्वय करेगा.
प्रश्न 3: ध्रुवीय क्षेत्रों का वैश्विक महत्व क्या है?
उत्तर: ये क्षेत्र पृथ्वी के कुल मीठे पानी का 70% हिस्सा संचित रखते हैं और वैश्विक जलवायु, समुद्री धाराओं तथा मानसून प्रणालियों को सीधे नियंत्रित करते हैं.
प्रश्न 4: भारत की ध्रुवीय अनुसंधान में क्या भूमिका है?
उत्तर: भारत अंटार्कटिका में ‘मैत्री’ और ‘भारती’ स्टेशनों तथा आर्कटिक (Svalbard) में ‘हिमाद्रि’ स्टेशन के माध्यम से दशकों से सक्रिय वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहा है.
प्रश्न 5: इस सिफारिश का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका उद्देश्य भारत की ध्रुवीय नीति को केवल विज्ञान से आगे बढ़ाकर भू-राजनीति, खनिज संपदा और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व के साथ जोड़ना है.
प्रश्न 6: क्या अन्य देशों ने भी ध्रुवीय राजदूत नियुक्त किए हैं?
उत्तर: हाँ, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे प्रमुख गैर-आर्कटिक देशों ने पहले से ही अपने विशेष ध्रुवीय राजदूत नियुक्त कर रखे हैं.
