Apni Pathshala

El Nino and La Nina

चर्चा में क्यों –

हाल ही में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग जलवायु केंद्र (APEC) के पूर्वानुमान के मुताबिक जुलाई से सितंबर तक जब मानसून चरम पर होगा तब भारत में औसत से ज्यादा बारिश होने की संभावना है। जलवायु केंद्र ने भारत के लिए मानसून का इस साल का पहला पूर्वानुमान जारी किया है। इसमें अप्रैल से जून तक और जुलाई से सितंबर के लिए दो अलग-अलग आकलन किए गए हैं।

एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग जलवायु केंद्र ने जुलाई से सितंबर के लिए अपने पूर्वानुमान में कहा कि पूर्वी अफ्रीका से अरब सागर तक भारत में बंगाल की खाड़ी, इंडोनेशिया, कैरेबियन सागर, ध्रुवीय उत्तरी अटलांटिक, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणवर्ती प्रशांत क्षेत्र में औसतन सामान्य से अधिक बारिश की संभावना है।

इससे पहले भारतीय मौसम विभाग ने कहा था कि अल नीनो के कारण इस वर्ष भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा सकता है। हालांकि गर्मी के मौसम के बाद अल नीनो निष्क्रिय होने की संभावना है। वहीं ला नीना के कारण भारत में मानसून के उत्तरार्ध में अच्छी वर्षा हो सकती है।

अल नीनो और ला नीना दो प्राकृतिक घटनाएं हैं जो जलवायु को प्रभावित करती हैं। ये घटनाएं प्रशांत महासागर के सतही जल के तापमान में परिवर्तन के कारण होती हैं।

अल नीनो (El Nino) एक ऐसी घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग में सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह घटना हर 2 से 7 साल में एक बार होती है और 9 महीने से लेकर 1 साल तक रह सकती है। अल नीनो के कारण दुनिया भर में मौसम में बदलाव होता है, जिसके परिणामस्वरूप बाढ़, सूखा, और तूफान जैसी आपदाएं आ सकती हैं।

अल नीनो

  • अल नीनो की घटना को सबसे पहले पेरू के मछुआरों ने पेरू के तट से दूर सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने के रूप में जाना था।
  • स्पेनिश प्रवासियों ने इसे अल नीनो कहा जिसका अर्थ स्पेनिश में “छोटा लड़का” होता है।
  • जल्द ही अल नीनो का उपयोग तटीय सतह के जल के गर्म होने के बजाय अनियमित एवं तीव्र जलवायु परिवर्तनों का वर्णन करने के लिये किया जाने लगा।
  • अल नीनो घटना एकनियमित चक्र नहीं है, इनकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है, ये दो से सात वर्ष के अंतराल पर अनियमित रूप से होती हैं।
  • मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो की घटना दक्षिणी दोलन के साथ होती है।
  • दक्षिणी दोलन, उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के वायुमंडलीय दाब में परिवर्तन को कहते है।
  • जब पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र (अल नीनो) में तटीय जल गर्म हो जाता है, तो समुद्र के ऊपर वायुमंडलीय दाब कम हो जाता है।
  • मौसम वैज्ञानिक इन घटनाओं कोअल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के रूप में परिभाषित करते हैं।

अल नीनो का प्रभाव

  • अल नीनो की अवधारणा को समझने के लिये प्रशांत महासागर में अल नीनो रहित अवस्था से परिचित होना आवश्यक है।
  • सामान्यतः शक्तिशाली व्यापारिक पवनें पश्चिम की ओर उष्णकटिबंधीय प्रशांत, कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य स्थित प्रशांत महासागर क्षेत्र में चलती हैं।
  • महासागर पर प्रभाव: अल नीनो समुद्र के तापमान, समुद्र की धाराओं की गति एवं शक्ति, तटीय मत्स्य पालन और ऑस्ट्रेलिया से दक्षिण अमेरिका तथा उनसे आगे तक के स्थानीय मौसम को भी प्रभावित करता है।
  • वर्षा में वृद्धि: गर्म जल के सतह पर बहाव के कारण वर्षा में वृद्धि होती है।
  • इसकी वजह से दक्षिण अमेरिका में वर्षा में भारी वृद्धि होती है, जिससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़ एवं अपरदन की घटनाओं की वृद्धि होती है।
  • बाढ़ एवं सूखे के कारण होने वाले रोग: बाढ़ अथवा सूखा जैसे प्राकृतिक खतरों से प्रभावित समुदायों में बीमारियाँ पनपती हैं।
  • अल नीनो की वजह से बाढ़ के कारण विश्व के कुछ हिस्सों में हैजा, डेंगू एवं मलेरिया के मामलों में वृद्धि होती है, वहीं सूखे के कारण जंगलों में आग की घटनानों में वृद्धि हो सकती है जो कि श्वसन संबंधी समस्याओं से संबंधित है।
  • सकारात्मक प्रभाव: कभी-कभी इसके सकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं, उदाहरण के लिये अल नीनो के कारण अटलांटिक महासागर में तूफान की घटनाओं में कमी आती है।
  • दक्षिण अमेरिका: अल नीनो के कारण दक्षिण अमेरिका में बारिश अधिक होती है, वहीं इंडोनेशिया एवं ऑस्ट्रेलिया में इसके कारण सूखे की घटनाएँ होती हैं।
  • सूखे की इन घटनाओं के कारण क्षेत्र में जल आपूर्ति का संकट उत्पन्न होता है, क्योंकि जलाशय सूख जाते हैं एवं नदियों में भी जल की कमी होती है। कृषि जो कि सिंचाई जल पर निर्भर होती है, पर भी संकट उत्पन्न होता है।
  • पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र : इन पवनों के कारण पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की ओर जहाँ यह एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया से सीमाएँ बनाता है, गर्म सतही जल का प्रवाह होता है।
  • उष्ण व्यापारिक पवनों के कारण इंडोनेशिया में समुद्र की सतह इक्वाडोर की तुलना में लगभग 5 मीटर अधिक एवं 4-5° F गर्म होती है।
  • गर्म जल के पश्चिमी प्रवाह के कारण इक्वाडोर, पेरू एवं चिली के तटों पर सतह की ओर ठंडे जल का स्तर बढ़ जाता है। इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) के रूप में जाना जाता है।
  • अपवेलिंग के कारण समुद्र के ऊपरी सतह, यूफोटिक ज़ोन में ठंडे पोषक तत्त्वों से युक्त जल आ जाता है।

भारत में अल-नीनो का प्रभाव

  • भारत में अल-नीनो प्रभाव ज्यादातर नकारात्मक है क्योंकि भारतीय मानसून और अल-नीनो एक दूसरे के विपरीत हैं। यह मानसून को कमजोर करता है और कई बार मानसून की विफलता का कारण बनता है।
  • पहला प्रमुख अल नीनो प्रभाव कम वर्षा है। भारत में औसत वर्षा 120 सेमी है लेकिन अल-नीनो वर्ष के दौरान इसमें भारी कमी आई है।
  • 1871 के बाद से अल-नीनो सूखे ने भारत के सबसे उल्लेखनीय सूखे में से छह को जन्म दिया है, जिसमें 2002 और 2009 में सबसे हाल के सूखे भी शामिल हैं।
  • भारत में, वर्षा आधारित कृषि भूमि क्षेत्र का लगभग 50% कृषि योग्य है और भारतीय फसलों के लिए एक अच्छा दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्मकालीन मानसून आवश्यक है। मानसून की विफलता अल-नीनो प्रभाव के कारण भारत के कई क्षेत्रों में पानी की कमी और औसत से कम फसल का कारण बनती है।
  • महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और राजस्थान जैसे प्रमुख सूखा-प्रवण क्षेत्र अल नीनो प्रभाव का सामना करते हैं।
  • मानसून की विफलता के साथ, भारत को उच्च मुद्रास्फीति और धीमी जीडीपी वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है।
  • कमजोर मॉनसून जलविद्युत बांध बिजली उत्पादन को कम करने में भी योगदान देता है, जिसके परिणामस्वरूप सिंचाई की जरूरतों के लिए बिजली भी कम होती है। इससे फसल की पैदावार और भी कम हो जाती है।
  • हालांकि, अल-नीनो का हर साल भारत को प्रभावित नहीं करता है। उदाहरण के लिए, भले ही 1997 और 1998 उल्लेखनीय अल नीनो वर्ष थे, कोई सूखा नहीं था।

अल-नीनो घटनाओं का इतिहास

  • पिछले 300 वर्षों से, प्रत्येक दो से सात वर्षों में ENSO (El Niño–Southern Oscillation) की स्थिति उत्पन्न हुई है, लेकिन उनमें से अधिकांश कमजोर रही हैं।
  • 1789- 1793: हाल के एक अध्ययन के अनुसार, एक मजबूत अल नीनो प्रभाव ने यूरोप की फसल की खराब फसल में योगदान दिया होगा, जिसने बदले में फ्रांसीसी क्रांति को जन्म दिया हो।
  • 1876-1877: 19वीं शताब्दी के सबसे घातक अकाल अल-नीनो द्वारा लाई गई कठोर जलवायु परिस्थितियों के कारण हुए थे और यह उम्मीद की जाती है कि केवल 1876 के उत्तरी चीन के अकाल में 13 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई थी।
  • 1892: कैप्टन कैमिलो कैरिलो ने लीमा में ज्योग्राफिकल सोसाइटी कांग्रेस को बताया कि पेरू के नाविकों ने गर्म, दक्षिण-प्रवाह वाली धारा को “अल-नीनो” उपनाम दिया क्योंकि यह क्रिसमस के आसपास सबसे अधिक स्पष्ट था। यह पहली बार था जब “अल-नीनो” वाक्यांश का उपयोग जलवायु का वर्णन करने के लिए किया गया था।
  • 1982-1983: महत्वपूर्ण अल-नीनो प्रभावों के परिणामस्वरूप वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान बढ़ा।
  • 1997- 1998: यह पहला अल नीनो एपिसोड था जिसकी शुरुआत से अंत तक सावधानीपूर्वक निगरानी की गई थी और अल नीनो एपिसोड द्वारा लाए गए 25 डिग्री सेल्सियस की सामान्य वृद्धि की तुलना में, इस घटना ने हवा के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया।
  • 1997-98 में: एक अल नीनो ने दुनिया की 16% रीफ प्रणालियों को प्रभावित किया और उनमें से अधिकांश को मार डाला।

ला नीना:

ला नीना (La Nina) अल नीनो के विपरीत घटना है। इसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग में सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है।

  • स्पेनिश भाषा में ला नीना का अर्थ होता है छोटी लड़की। इसे कभी-कभी अल विएखो, एंटी-अल नीनो या “एक शीत घटना” भी कहा जाता है।
  • ला नीना घटनाएँपूर्व-मध्य विषुवतीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में औसत समुद्री सतही तापमान से निम्न तापमान की द्योतक हैं।
  • इसे समुद्र की सतह के तापमान में कम-से-कम पाँच क्रमिक त्रैमासिक अवधि में 9°F से अधिक की कमी द्वारा दर्शाया जाता है।
  • जबपूर्वी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में जल का तापमान सामान्य की  तुलना में कम हो जाता है तो ला नीना की घटना देखी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वी विषुवतीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में एक उच्च दाब की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • यह घटना हर 3 से 7 साल में एक बार होती है और 9 महीने से लेकर 1 साल तक रह सकती है। ला नीना के कारण भी दुनिया भर में मौसम में बदलाव होता है, लेकिन यह बदलाव अल नीनो के विपरीत होता है।

ला नीना स्थितियाँ

  • ला नीना घटनाउष्णकटिबंधीय प्रशांत, कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य प्रशांत महासागर क्षेत्र में सामान्य से ठंडे जल के कारण होती है।
  • ला नीना की विशेषतापश्चिमी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में सामान्य से कम वायुदाब का होना है। ये निम्न दाब के क्षेत्र वर्षा वृद्धि में योगदान देते हैं।
  • ला नीना की घटनाएँदक्षिण-पूर्वी अफ्रीका एवं उत्तरी ब्राज़ील में सामान्य से अधिक वर्षा की स्थितियों से भी संबंधित हैं।
    • हालाँकि प्रबल ला नीना की घटनाएँ उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में विनाशकारी बाढ़ का कारण बनती हैं।
  • मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में सामान्य सेउच्च वायुदाब भी ला नीना की विशेषता है।
    • इसके कारण इस क्षेत्र में बादल कम बनते हैं एवं वर्षा कम होती है।
  • उष्णकटिबंधीय दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट, संयुक्त राज्य अमेरिका के खाड़ी तट एवं दक्षिण अमेरिका के पम्पास क्षेत्र में सामान्य से अधिक सूखे की स्थितिदेखी जाती है।

ला नीना का प्रभाव 

  • तापमान में कमी- ला नीना के कारण समुद्री सतह का तापमान अत्यंत कम हो जाने से दुनियाभर का तापमान औसत से काफी कम हो जाता है।
  • ला नीना से प्राय: उत्तर-पश्चिम में मौसम ठंडा और दक्षिण-पूर्व में मौसम गर्म होता है। भारत में इस दौरान अत्यधिक ठंड पड़ती है।
  • चक्रवातों की दिशा में परिवर्तन- ला नीना अपनी गति के साथ उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की दिशा को बदल सकती है। साथ ही, यूरोप में अल नीनो से तूफानों की संख्या में कमी आती है 
  • साथ ही, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में अत्यधिक आर्द्रता वाली स्थिति उत्पन्न होती है। 
  • वर्षा पर प्रभाव- इससे इंडोनेशिया तथा आसपास के क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा हो सकती है और ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ आने की संभावना होती है। वहीं इक्वाडोर और पेरू सूखाग्रस्त हो जाते हैं। 

ला नीना  एवं भारत

  • ला नीनाअल नीनो की ठंडी हवाओं की तुलना में ला नीना की ठंडी हवाएँ भारत के एक बड़े हिस्से में व्याप्त होती हैं।
  • ‘ला नीना वर्ष’ के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया में‘विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत एवं बांग्लादेश में’ ग्रीष्म मानसून से संबंधित वर्षा सामान्य से अधिक होती है।
    • सामान्यतः यहभारतीय अर्थव्यवस्था के लिये लाभदायक होती है, जो कि कृषि एवं उद्योग के लिये मानसून पर निर्भर होती है।
  • सामान्यतः इसके कारण भारत मेंसामान्य से अधिक सर्दी पड़ती है।
  • ला नीना की घटनासाइबेरिया एवं दक्षिण चीन से आने वाली ठंडी हवाओं के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित करता है, जो उष्णकटिबंधीय वायु के साथ मिलकर उत्तर-दक्षिण निम्न दाब तंत्र का निर्माण करती है।
  • उत्तर-दक्षिण निम्न दाब क्षेत्र से संबंधितला नीना की ठंडी हवाएँ भारत में दक्षिण की ओर विस्तारित होती हैं।
    • उल्लेखनीय रूप से अल नीनो से संबंधित ठंडी हवाओं के उत्तर-पश्चिमी दक्षिण पूर्वी प्रस्फोट से भिन्न है।
    • उत्तर-दक्षिण की ओर दाब पैटर्न का अर्थ पश्चिमी विक्षोभ का अल्प प्रभाव है।
    • निम्न तापमान अधिक-से-अधिक तमिलनाडु तक पहुँच सकता है, लेकिन उत्तर-पूर्व क्षेत्र को इतना अधिक प्रभावित नहीं कर सकता है।

ला नीना की चक्रवात निर्माण में भूमिका 

  • ला नीना की अवधि में अटलांटिक महासागर और बंगाल की खाड़ी में क्रमश: बारंबार एवं तीव्र हरिकेन तथा चक्रवात उत्पन्न होते हैं।
  • बंगाल की खाड़ी के ऊपर उच्च सापेक्षिक आर्द्रता और निम्न सापेक्षिक वायु प्रवाह सहित कई सहायक कारकों के कारण अरब सागर तथा हिंद महासागर सहित उत्तरी हिंद महासागर में भी अत्यधिक चक्रवात आने की संभावना होती है।
  • उत्तरी हिंद महासागर में मानसून के बाद अक्टूबर से दिसंबर तक के महीने चक्रवात के विकास के लिये उपयुक्त होते हैं। साथ ही, नवंबर माह चक्रवाती गतिविधियों के लिये चरम समय होता है।

विश्व के विभिन्न भागों पर अल नीनो-ला नीना का प्रभाव

  • उत्तरी यूरोप में हल्की सर्दियाँ और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के आसपास दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप में ठंडी सर्दियाँ।
  • उत्तरी अमेरिका में, यह भूमध्यरेखीय क्षेत्र में तेज़ हवाओं, कैरेबियन और मध्य अटलांटिक में तूफान और अमेरिका में अधिक बवंडर का कारण बनता है।
  • दक्षिण अमेरिका विशेषकर पेरू और इक्वाडोर में सूखा।
  • पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में बढ़ी हुई वर्षा ने अंततः महाद्वीपीय एशिया और चीन को प्रभावित किया।
  • ऑस्ट्रेलिया में भारी बाढ़।
  • पश्चिमी प्रशांत, हिंद महासागर और सोमालिया तटों पर तापमान में वृद्धि।
  • भारत में सर्दियाँ अधिक ठंडी होती हैं क्योंकि यह साइबेरिया से तेज़ ठंडी हवा भेजती है और उत्तर-दक्षिण निम्न दबाव प्रणाली बनाती है।
  • पश्चिमी विक्षोभ का असर कम।

अल नीनो-ला नीना घटना की निगरानी

  • प्रशांत महासागर में विकास की भविष्यवाणी करने के लिए कई तरीकों का उपयोग किया जाता है। जटिल गतिशील मॉडल भविष्यवाणी करते हैं कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर अपनी वर्तमान स्थिति से कैसे बदल जाएगा।
  • ऐसे विकासों के कुछ अग्रदूतों को सांख्यिकीय पूर्वानुमान मॉडल द्वारा भी पकड़ा जा सकता है।
  • वर्तमान स्थिति के विशेषज्ञ विश्लेषण द्वारा अतिरिक्त मूल्य जोड़ा जाता है, खासकर जब समुद्र की सतह के नीचे बदलती स्थिति के परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है।
  • जलवायु प्रणाली के भीतर समुद्र-वायुमंडलीय अंतःक्रियाओं के परिणामों को सभी पूर्वानुमान तकनीकों द्वारा ध्यान में रखा जाता है।
  • मौसम विज्ञान और समुद्र विज्ञान संबंधी डेटा जो अल नीनो और ला नीना प्रकरणों की निगरानी और पूर्वानुमान करने की अनुमति देता है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवलोकन प्रणालियों से लिए गए हैं।
  • डेटा का आदान-प्रदान और प्रसंस्करण विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) द्वारा समन्वित कार्यक्रमों के तहत किया जाता है ।
  • इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (आईआरआई) और डब्लूएमओ संयुक्त राष्ट्र अंतर-एजेंसी टास्क फोर्स में योगदान के रूप में अर्ध-नियमित आधार पर (लगभग हर तीन महीने में) डब्लूएमओ अल नीनो/ला नीना अपडेट तैयार करने के लिए मिलकर काम करते हैं।
  • यह शीर्ष वैश्विक निगरानी और पूर्वानुमान केंद्रों के योगदान और एक विशेषज्ञ सहमति पर आधारित है जिसे बनाने में WMO और IRI ने मदद की।

मापदंड

अल नीनो

ला नीना

अर्थ

इसका नाम “छोटा लड़का” के लिए स्पेनिश शब्द से लिया गया है।

इसका नाम एक स्पेनिश शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है “छोटी लड़की।”

व्यापार हवाओं

यह पहली बार तब दिखाई दिया जब उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की व्यापारिक हवाएँ बहना बंद हो गईं और समुद्र असामान्य रूप से गर्म होने लगा।

जब व्यापारिक हवाएं विशेष रूप से जोर से चलती हैं और समुद्र का तापमान औसत से नीचे गिर जाता है, तो ऐसा होता है।

तापमान

समुद्र की सतह पर तापमान सामान्य से अधिक होता है। दक्षिण अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय दिनांक रेखा के बीच, प्रशांत महासागर गर्म हो रहा है। यह भूमध्य रेखा पर केंद्रित है और भूमध्य रेखा के दोनों ओर कई डिग्री अक्षांश की ओर बढ़ रहा है।

समुद्र की सतह पर तापमान सामान्य से कम रहता है। यह पहली बार तब दिखाई दिया जब दक्षिण अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के बीच भूमध्य रेखा पर समुद्र का तापमान सामान्य से नीचे गिर गया।

दबाव

पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र अत्यधिक उच्च सतही दबाव से भरा हुआ है।

पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में निम्न वायु सतही दबाव मौजूद है।

मौसम के

मौसमी पैटर्न पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह उत्तर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सर्दियों को सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क बनाता है, दक्षिण पश्चिम प्रशांत क्षेत्र में गीला और कम हिमपात होता है।

प्रशांत के उत्तर-पश्चिम में, सर्दियाँ गीली होती हैं और औसत से अधिक वर्षा होती है, जबकि दक्षिण पश्चिम में, सर्दियाँ शुष्क होती हैं और औसत से कम वर्षा होती हैं।

कोरिओलिस बल

कोरिओलिस बल की शक्ति कम हो जाती है।

परिणामस्वरूप कोरिओलिस बल मजबूत हो जाता है।

महासागरीय जल

दक्षिण अमेरिका के तटों पर गर्म पानी आ रहा है, जो पोषक तत्वों से भरपूर गहरे पानी के बहाव को कम करता है, जिसका प्रभाव मछली की आबादी पर पड़ता है।

सूखे के कारण गहरे, ठंडे समुद्र के पानी का ऊपर आना और अधिक पोषक तत्वों से भरपूर पूर्वी प्रशांत जल ठंडे पानी के कारण होता है।

चक्रवात

अल नीनो एपिसोड के दौरान अटलांटिक में ट्रोपोस्फेरिक वर्टिकल शीयर बढ़ता है, जिससे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति और तीव्रता को रोका जा सकता है। अल नीनो घटना के दौरान, पश्चिमी प्रशांत बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवात पूरी तरह से आवृत्ति में बदलाव के बिना घूमते हैं।

जब हवा की दिशा बदली, तो इंडोनेशिया और आस-पास के क्षेत्रों के बीच पानी जमा हो गया, इसमें तीव्र उष्णकटिबंधीय चक्रवात पैदा करने की प्रबल प्रवृत्ति थी क्योंकि अफ्रीका से आने वाली हवाएँ अवरुद्ध थीं।

प्रभाव

जिम्बाब्वे, मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया में सूखा; इक्वाडोर और पेरू में भारी बारिश; एशिया, जिसमें भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस शामिल हैं, सूखे और अल्प वर्षा का सामना कर रहा है; वैश्विक प्रवाल विरंजन ऑस्ट्रेलियाई पूर्वी रेगिस्तान सूखा।

परिणामस्वरूप पेरू और इक्वाडोर में सूखा। पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में उच्च दबाव और कम तापमान बनाया। पश्चिमी प्रशांत, हिंद महासागर और सोमालिया के तट पर उच्च तापमान; ऑस्ट्रेलिया में भयंकर बाढ़; और भारत में भरपूर बारिश

भारत मौसम विज्ञान विभाग

  • IMD की स्थापना 1875 में हुई थी।
  • यह देश की राष्ट्रीय मौसम विज्ञान सेवा है और मौसम विज्ञान एवं संबद्ध विषयों से संबंधित सभी मामलों में प्रमुख सरकारी एजेंसी है।
  • यह भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक एजेंसी के रूप में कार्य करती है।
  • IMD विश्व मौसम विज्ञान संगठन के छह क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्रों में से एक है।

FAQ’s

Q.1 अल नीनो के प्रभाव क्या हैं?
अल नीनो के कारण गंभीर सूखा और संबंधित खाद्य असुरक्षा, बाढ़, बारिश और तापमान में वृद्धि से बीमारियों का प्रकोप, कुपोषण, गर्मी का तनाव और श्वसन संबंधी बीमारियों सहित कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं।

Q.2 अल नीनो और ला नीना में क्या अंतर है?
अल नीनो की घटनाएँ मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र के गर्म होने से जुड़ी हैं, जबकि ला नीना की घटनाएँ इसके विपरीत हैं, जिनमें इन्हीं क्षेत्रों में लगातार ठंडक बनी रहती है। प्रशांत महासागर और उसके ऊपरी वायुमंडल में ये परिवर्तन अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) नामक एक चक्र में होते हैं।

PYQ’s

Q. एल-नीनो के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
1. एल-नीनो का अर्थ चाइल्ड क्राइस्टहै।
2. यह एक गर्म महासागरीय धारा है जो आमतौर पर दिसंबर में पेरू तट के साथ दिखाई देती है।
3. भारतीय मानसून भी एल-नीनो से प्रभावित होता है।
(A) 1 और 2 
(B) 1 और 3 
(C) 1, 2, और 3 
(D) 2 और 3 
उत्तर : (C) 1, 2, और 3 

Q. अल नीनो है?
(A) एक गर्म महासागरीय धारा
(B) समुद्री तूफान
(C) उष्णकटिबंधीय अव्यवस्था
(D) आंधी का दूसरा नाम
उत्तर : (A) एक गर्म महासागरीय धारा

Q. ला नीना घटना निम्नलिखित में से किस स्थिति के कारण होती है?
(A) मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के ऊपर वायु दाब कम हो जाता है
(B) पश्चिमी प्रशांत पर उच्च दाब प्रणाली,  सामान्य दाब प्रणाली को प्रतिस्थापित करती है
(C) मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में ठंडे जल के असामान्य संचय के परिणामस्वरूप बहुत तेज़ व्यापारिक पवनें चलती हैं
(D) प्रशांत महासागर के ऊपर व्यापारिक पवनें पश्चिम से पूर्व की ओर दृढ़ता से चलती हैं
उत्तर : (C) मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में ठंडे जल के असामान्य संचय के परिणामस्वरूप बहुत तेज़ व्यापारिक पवनें चलती हैं

Q. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
a. ला नीना एक छोटी लड़की है।
b. ला नीना के समय समुद्र में ठंडा पानी सतह पर उगता है।
c. ला नीना भारतीय मानसून को मजबूत करता है।
d. अल नीनो के समय में, व्यापारिक हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं और गर्म पानी समुद्र में पूर्व की ओर चला जाता है।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) a, b और c
(C) केवल b और c
(D) ऊपर के सभी
उत्तर : (D) ऊपर के सभी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top