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भारत में स्वस्थ वृद्धावस्था (Healthy Ageing in India) | UPSC

Healthy Ageing in India

Healthy Ageing in India

Healthy Ageing in India – 

संदर्भ:

आईआईएससी बेंगलुरु ने BHARAT स्टडी शुरू की है, जिसका उद्देश्य भारत-विशिष्ट बायोमार्कर्स विकसित करना है ताकि सक्रिय और स्वस्थ बुढ़ापे को बेहतर ढंग से समझा जा सके। यह पहल उन निदान संबंधी खामियों को दूर करने का प्रयास है, जो अब तक पश्चिमी देशों के स्वास्थ्य डेटा पर आधारित रही हैं।

BHARAT परियोजना: भारतीय संदर्भ में आयु संबंधी वैज्ञानिक अध्ययन की पहल:

परियोजना का परिचय:

  • वैज्ञानिक शुरुआत: यह एक राष्ट्रीय अनुसंधान पहल है जिसे भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु द्वारा शुरू किया गया है।
  • प्रमुख उद्देश्य: भारत में लोगों के जैविक, पर्यावरणीय और सामाजिक रूप से बुजुर्ग होने की प्रक्रिया पर पहला वैज्ञानिक बेसलाइन बनाना।

नेतृत्व: परियोजना का नेतृत्व IISc के विकास जीवविज्ञान और आनुवंशिकी विभाग के प्रोफेसर डी.के. सैनी कर रहे हैं।

वैश्विक अनुसंधान की खामियों को भरना: यह परियोजना पश्चिमी आबादी पर आधारित अंतरराष्ट्रीय बुढ़ापे अध्ययनों की तुलना में भारतीय-विशिष्ट डेटा प्रदान कर एक महत्वपूर्ण शोध अंतर को भरती है।

सामान्य को पुनर्परिभाषित करना: कोलेस्ट्रॉल, विटामिन D जैसी स्वास्थ्य संबंधी अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारतीय संदर्भ में चुनौती देने की तैयारी, जो कई बार गलत निदान करते हैं।

जैविक उम्र पर ध्यान: कालानुक्रमिक आयु की बजाय जैविक उम्र के बायोमार्कर के आधार पर बीमारी के जोखिम की प्रारंभिक पहचान की जाएगी।

हेल्दी एजिंग (Healthy Ageing): परिभाषा और भारत में स्थिति:

हेल्दी एजिंग क्या है?

  • हेल्दी एजिंग का अर्थ है बुजुर्ग अवस्था में शारीरिक, मानसिक और कार्यात्मक क्षमता को बनाए रखना।
  • इसका ज़ोर केवल जीवनकाल बढ़ाने पर नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने पर होता है।
  • अक्सर जैविक उम्र (biological age) और कालानुक्रमिक उम्र (chronological age) में अंतर होता है।

बुढ़ापा कैसे होता है?

  • यह एक लगातार चलने वाली जैविक प्रक्रिया है जिसमें टिलोमेर (telomere) की लंबाई में कमी जैसे आणविक और कोशकीय परिवर्तन होते हैं।
  • प्रारंभिक जीवन में संक्रमण, प्रदूषण और सामाजिक समर्थन जैसे कारक यह निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति कैसे और कितनी जल्दी वृद्ध होता है।

भारत में एजिंग से संबंधित आँकड़े और स्थिति:

बुजुर्ग जनसंख्या में तीव्र वृद्धि: 2050 तक भारत की 20% आबादी (लगभग 319 मिलियन) 60 वर्ष से अधिक की होगी।

बीमारी का बढ़ता बोझ: पार्किंसन रोग में 168% और डिमेंशिया (स्मृति-हानि) में 200% की वृद्धि की संभावना।

लैंगिक असमानता: महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक जीती हैं, लेकिन उन्हें ज़्यादा विकलांगता-समायोजित जीवन वर्षों (DALYs) का सामना करना पड़ता है।

आर्थिक प्रभाव: बढ़ती वरिष्ठ नागरिक निर्भरता दर स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन प्रणाली पर भार बढ़ा रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं की कमी: अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) और जिला अस्पतालों में जेरियाट्रिक (बुजुर्ग स्वास्थ्य) सेवाएँ सीमित हैं।

परियोजना की प्रमुख विशेषताएँ:

  • भारतकेंद्रित बेसलाइन: भारतीय अनुवांशिकी, आहार और जीवनशैली के आधार पर बायोमार्कर कट-ऑफ तय किए जाएंगे।
  • विस्तृत बायोमार्कर अध्ययन: जीनोमिक, मेटाबॉलिक और पर्यावरणीय संकेतकों का विश्लेषण कर अंगों की उम्र और प्रतिरोध क्षमता की पहचान की जाएगी।
  • एआईसंचालित विश्लेषण: मशीन लर्निंग टूल्स का उपयोग कर बुढ़ापे के पैटर्न, स्वास्थ्य हस्तक्षेपों की सिमुलेशन और जोखिम का पूर्वानुमान किया जाएगा।
  • समग्र वृद्धावस्था मॉडल: पोषण, प्रदूषण, संक्रमण, और सामाजिक कारकों को अध्ययन में शामिल किया जाएगा।
  • वैश्विक दक्षिण के लिए समानता: स्थानीय रूप से सत्यापित स्वास्थ्य डेटा के माध्यम से वैश्विक मानकों में भारत के प्रति पूर्वाग्रह को चुनौती दी जाएगी।
  • स्वास्थ्य जीवन पर केंद्रित: केवल जीवनकाल बढ़ाने की बजाय स्वस्थ जीवनकाल (Healthspan) बढ़ाने पर ज़ोर—अर्थात् लंबे समय तक बेहतर जीवन गुणवत्ता।

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