दो दशक बाद दिखा सुभेद्य दुर्लभ ‘Himalayan Serow’
संदर्भ:
हाल ही में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित कालाटोप-खज्जियार वन्यजीव अभयारण्य (Kalatop-Khajjiar Wildlife Sanctuary) के पास डलहौजी के जंगलों में लगभग दो दशकों (20 साल) बाद अत्यंत दुर्लभ हिमालयन सीरो (Himalayan Serow) का वीडियो फुटेज रिकॉर्ड किया गया है.
दुर्लभ हिमालयन सीरो (Himalayan Serow) प्रजाति के बारे में:
- वैज्ञानिक नाम: इसका वैज्ञानिक नाम कैप्रिकॉर्निस थार (Capricornis thar) है. टैक्सोनॉमी (Taxonomy) के अनुसार, यह मुख्य भूमि सीरो की एक उपप्रजाति (Subspecies of Mainland Serow) है.
- अनोखी बनावट: वन्यजीव जीवविज्ञानियों के अनुसार, हिमालयन सीरो की बनावट कई जानवरों का मिश्रण प्रतीत होती है. यह दिखने में बकरी, गधे, गाय और सुअर का एक अनूठा क्रॉस (मिश्रण) जैसा लगता है.
- शारीरिक विशेषताएं: यह मध्यम आकार का स्तनधारी शाकाहारी प्राणी (Herbivore) है. इसका सिर बड़ा, गर्दन मोटी, पैर छोटे, कान खच्चर जैसे लंबे और शरीर के बाल गहरे रंग के होते हैं. इसके सिर पर छोटे और मजबूत सींग होते हैं.
- भौगोलिक अवस्थिति: यह मुख्य रूप से 2,000 मीटर से 4,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है. यह पूर्वी, मध्य और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों के घने जंगलों वाली ढलानों पर निवास करता है.
- यह ट्रांस-हिमालयी (Trans-Himalayan) क्षेत्र के ठंडे रेगिस्तानों में सामान्यतः नहीं पाया जाता. हालांकि, वर्ष 2020 में इसे हिमाचल के स्पीति (Spiti) की शीत मरुभूमि में पहली बार देखा गया था जो एक दुर्लभ घटना थी.
- भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार और चीन के कुछ हिस्सों में भी सीमित रूप से पाया जाता है.
- राज्य पशु: हिमालयन सीरो भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम का राजकीय पशु (State Animal of Mizoram) है.
- संरक्षण स्थिति:
- आईयूसीएन रेड लिस्ट (IUCN Red List): पूर्व में इसे ‘समीप-संकटग्रस्त’ (Near Threatened) श्रेणी में रखा गया था. हालांकि, जनसंख्या और आवास में तीव्र गिरावट को देखते हुए वर्तमान में इसे ‘सुभेद्य’ (Vulnerable – VU) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: भारत में इसे अनुसूची-I (Schedule I) के तहत रखा गया है. इसके तहत इस जीव को पूर्ण और कड़ा विधिक संरक्षण प्राप्त है तथा इसके शिकार या अवैध व्यापार पर सबसे कठोर दंड का प्रावधान है.
- साइट्स (CITES): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय प्रजातियों के अवैध व्यापार को रोकने के लिए इसे परिशिष्ट-I (Appendix I) में सूचीबद्ध किया गया है, जो इसके किसी भी प्रकार के वाणिज्यिक व्यापार को प्रतिबंधित करता है.
- खतरा:
- आवास विखंडन (Habitat Fragmentation): मानवीय हस्तक्षेप, सड़क निर्माण और वनों की कटाई के कारण इसके प्राकृतिक आवास लगातार सिकुड़ रहे हैं.
- बीमारियों का प्रकोप: डलहौजी के जंगलों से इसके गायब होने का एक मुख्य कारण वर्ष 2005-06 में फैला खुरपका-मुँहपका रोग (Foot-and-Mouth Disease) था, जिसने इनकी आबादी को भारी नुकसान पहुँचाया था.
- अवैध शिकार (Poaching): मांस और इसके अंगों के अवैध व्यापार के लिए स्थानीय स्तर पर इसका शिकार किया जाना भी एक बड़ा खतरा है.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: हिमालयन सीरो क्या है?
उत्तर: यह हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक अत्यंत शर्मीला, मध्यम आकार का शाकाहारी पहाड़ी जीव है, जो बकरी, गधे और सुअर के मिश्रण जैसा दिखता है.
प्रश्न 2: इसे संकटग्रस्त प्रजाति क्यों माना जाता है?
उत्तर: आवास विखंडन, मानवीय अतिक्रमण, अवैध शिकार और संक्रामक बीमारियों के कारण पिछले कुछ दशकों में इसकी वैश्विक आबादी में भारी गिरावट आई है.
प्रश्न 3: दो दशक बाद इसके दिखने का क्या महत्व है?
उत्तर: डलहौजी के जंगलों में इसका पुनः दिखना यह दर्शाता है कि स्थानीय वनों की पारिस्थितिकी (Ecological Integrity) सुरक्षित है और पर्यावरण में सुधार हो रहा है.
प्रश्न 4: हिमालयन सीरो कहाँ पाया जाता है?
उत्तर: यह मुख्य रूप से 2000 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पूर्वी, मध्य और पश्चिमी हिमालय के घने और ढलानी पहाड़ी जंगलों में पाया जाता है.
प्रश्न 5: IUCN में इसकी स्थिति क्या है?
उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN Red List) द्वारा इस दुर्लभ जीव को वर्तमान में ‘सुभेद्य’ (Vulnerable) प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
प्रश्न 6: इसके संरक्षण के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
उत्तर: भारत सरकार ने इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-I में रखकर पूर्ण सुरक्षा दी है तथा वन विभाग द्वारा निरंतर गश्त व कैमरा ट्रैपिंग से इसकी निगरानी की जा रही है.ना चाहता है और महाराष्ट्र पूर्व में 148 मीटर पर सहमत था।हैं.
