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India-Iran Chabahar Port Agreement

हाल ही में भारत और ईरान ने चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए । यह अनुबंध इंडिया पोर्ट ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन (पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन-पीएमओ) के बीच हस्ताक्षरित किया गया।

चाबहार बंदरगाह:

  • चाबहार बंदरगाह दक्षिणपूर्वी ईरान में ओमान की खाड़ी में स्थित है।
  • यह एकमात्र ईरानी बंदरगाह है जिसकी समुद्र तक सीधी पहुँच है।
  • यह ऊर्जा संपन्न ईरान के दक्षिणी तट पर सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है।
  • चाबहार बंदरगाह को मध्य एशियाई देशों के साथ भारत, ईरान और अफगानिस्तान द्वारा व्यापार के सुनहरे अवसरों का प्रवेश द्वार माना जाता है।

चाबहार के साथ भारत के जुड़ाव की ऐतिहासिक समयरेखा-

चाबहार की उत्पत्ति और संकल्पना का चरण

1970 के दशक में 1980 के दशक

आधुनिक चाबहार के विकास की कल्पना 1970 के दशक में शुरू हुई । 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान को बंदरगाह के रणनीतिक महत्व का एहसास हुआ।

जनवरी 2003

ईरानी राष्ट्रपति खातमी और भारतीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रणनीतिक सहयोग के एक महत्वाकांक्षी रोडमैप पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चाबहार बंदरगाह का विकास भी शामिल था।

ठहराव का चरण

2004-2015

अमेरिका ने इराक और उत्तर कोरिया के साथ ईरान को “बुराई की धुरी” में से एक घोषित किया। इस वजह से भारत को ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध खत्म करने पड़े और चाहबार परियोजना इसी का शिकार हो गई।

प्रगति और समापन का चरण

2015

संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) पर हस्ताक्षर करने के बाद, जिसने ईरान और पी-5+1 के बीच संबंध सामान्य कर दिए, चाबहार बंदरगाह के विकास को एक नई गति दी गई।

2016

अंतर्राष्ट्रीय परिवहन और पारगमन गलियारे की स्थापना के लिए भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर मई 2016 में हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद, भारत के शिपिंग मंत्रालय ने चाबहार परियोजना को विकसित करने के लिए तेज गति से काम किया।

2018

संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) से अमेरिका के हटने के बावजूद, भारत चाबहार परियोजना के लिए अमेरिका से छूट पाने में कामयाब रहा। भारत ने अफगानिस्तान के साथ कनेक्टिविटी और चीनी आक्रामक बुनियादी ढांचे का मुकाबला करने को इस प्रयास के प्रमुख कारणों के रूप में बताया।

 महत्त्व:

  • चाबहार बंदरगाह सभी को वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग का विकल्प प्रदान करता है, इस प्रकार व्यापार के संबंध में पाकिस्तान के महत्त्व को कम करता है।
  • यह भारत को समुद्री-भूमि मार्ग का उपयोग करके अफगानिस्तान में माल के परिवहन में पाकिस्तान को बायपास करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
    • वर्तमान में पाकिस्तान, भारत को अपने क्षेत्र से अफगानिस्तान तक यातायात की अनुमति नहीं देता है।
  • यह अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे को गति प्रदान करेगा, जिसमें दोनों रूस के साथ प्रारंभिक हस्ताक्षरकर्त्ता हैं।
    • ईरान इस परियोजना का प्रमुख प्रवेश द्वार है।
    • यह अरब में चीनी उपस्थिति का मुकाबला करेगा।

अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC):

  • परिचय:
    • यह सदस्य देशों के बीच परिवहन सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ईरान, रूस और भारत द्वारा सेंट पीटर्सबर्ग में 12 सितंबर, 2000 को स्थापित एक बहु-मॉडल परिवहन परियोजना है।
      • अज़रबैजान आर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिज़ गणराज्य, ताजिकिस्तान, तुर्की, यूक्रेन, बेलारूस, ओमान, सीरिया और बुल्गारिया पर्यवेक्षक हैं। 

    • यह माल परिवहन के लिये जहाज़, रेल और सड़क मार्ग के 7,200 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोड नेटवर्क को लागू करता है, जिसका उद्देश्य भारत और रूस के बीच परिवहन लागत को लगभग 30% कम करना तथा पारगमन समय को 40 दिनों के आधे से अधिक कम करना है।
    • यह कॉरिडोर इस्लामिक गणराज्य ईरान के माध्यम से हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ता है तथा रूसी संघ के माध्यम से सेंट पीटर्सबर्ग एवं उत्तरी यूरोप से जुड़ा हुआ है।
    • इस मार्ग से मुख्य रूप से भारत, ईरान, अज़रबैजान और रूस से माल ढुलाई शामिल है।

  • उद्देश्य:
    • कॉरिडोर का उद्देश्य मुंबई, मॉस्को, तेहरान, बाकू, अस्त्रखान आदि जैसे प्रमुख शहरों के बीच व्यापार संपर्क बढ़ाना है।
  • महत्त्व:
    • इसे चीन केबेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के व्यवहार्य और उचित विकल्प के रूप में प्रदान किया जाएगा।
    • इसके अलावा यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाएगा।

समझौते के बारे में-

इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के पोर्ट एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (पीएमओ) के बीच हस्ताक्षरित अनुबंध में पर्याप्त निवेश और विकास पहल शामिल हैं।

  • आईपीजीएल बंदरगाह की दक्षता और क्षमता को बढ़ाने, शाहिद-बेहस्ती टर्मिनल को सुसज्जित करने में लगभग 120 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा ।
  • भारत ने क्षेत्रीय विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर देते हुए चाबहार से संबंधित बुनियादी ढांचे में सुधार लाने के उद्देश्य से पारस्परिक रूप से पहचानी गई परियोजनाओं के लिए 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट विंडो बढ़ा दी है।

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह का सामरिक महत्व

  • चाबहार बंदरगाह भारत की ईरान तक पहुंच को बढ़ावा देगा , जो अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का प्रमुख प्रवेश द्वार   है, जिसमें भारत, रूस, ईरान, यूरोप और मध्य एशिया के बीच समुद्री, रेल और सड़क मार्ग हैं।
  • चाबहार बंदरगाह अरब सागर में चीनी उपस्थिति का मुकाबला करने में भारत के लिए फायदेमंद होगा,   जिसे चीन पाकिस्तान को ग्वादर बंदरगाह विकसित करने में मदद करके सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है।
  • अफगानिस्तान तक सामान पहुंचाने में भारत पाकिस्तान को दरकिनार कर सकता है

आर्थिक महत्व

  • चाबहार बंदरगाह अरब सागर पर एक महत्वपूर्ण बिंदु पर है, जहाँ से भारत के पश्चिमी तट तक आसान पहुँच है।
  • गुजरात में कांडला बंदरगाह 550 समुद्री मील पर निकटतम बंदरगाह है, जबकि चाबहार और मुंबई के बीच की दूरी 786 समुद्री मील है।
  • 2019 के बाद से, बंदरगाह ने 80,000 से अधिक बीस-फुट समकक्ष इकाइयों (टीईयू) कंटेनर यातायात और 8 मिलियन टन से अधिक थोक और सामान्य कार्गो को संभाला है।
  • यह बंदरगाह मध्य एशियाई देशों और अफगानिस्तान के बीच कार्गो यातायात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से एक वैकल्पिक मार्ग भी प्रदान करता है। 

PYQ’s

Q. निम्नलिखित में से कौन ‘खाड़ी सहयोग परिषद’ का सदस्य नहीं है?
(a) ईरान
(b) सऊदी अरब
(c) ओमान
(d) कुवैत
उत्तर: (a)

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