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लोकसभा सचिवालय द्वारा बागी सांसदों को अयोग्यता नोटिस जारी, किस कानून के अंतर्गत जारी हुआ नोटिस?

लोकसभा सचिवालय द्वारा बागी सांसदों को अयोग्यता नोटिस जारी, किस कानून के अंतर्गत जारी हुआ नोटिस?

Lok Sabha Secretariat

संदर्भ:

हाल ही में लोकसभा सचिवालय (Lok Sabha Secretariat) ने भारत के दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के अंतर्गत तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत कर नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने वाले 20 बागी सांसदों को अयोग्यता नोटिस जारी किया.

  • यह कदम उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा दलबदल याचिकाओं पर निर्णय लेने में हो रही देरी को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई की सहमति देने के तुरंत बाद उठाया गया है.

अयोग्यता नोटिस क्या है और इसका कानूनी आधार?

  • परिचय: लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी किया जाने वाला अयोग्यता नोटिस संसद के किसी सदस्य की सदस्यता समाप्त करने की प्राथमिक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य बागी सांसदों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principle of Natural Justice) के तहत अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर देना है.
  • आधार: यह नोटिस भारतीय संविधान और संसदीय नियमों के दोहरे कानूनी स्तंभों पर आधारित है:
  • संवैधानिक आधार: संविधान का अनुच्छेद 102(2) यह प्रावधान करता है कि यदि कोई सदस्य दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत अयोग्य पाया जाता है, तो उसकी संसद सदस्यता समाप्त हो जाएगी. 
  • संसदीय नियम: यह विशिष्ट नोटिस लोकसभा सदस्य (दलबदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985 के नियम 6 के अंतर्गत जारी किया गया है. इसके तहत सांसदों को 7 दिनों के भीतर अपना लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना अनिवार्य है.

दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के मुख्य प्रावधान:

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में ‘आया राम, गया राम’ (बार-बार दल बदलने) की संस्कृति और राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी. इसके मुख्य प्रावधान:

  • अयोग्यता के मुख्य आधार (Grounds for Disqualification): किसी निर्वाचित सांसद को निम्नलिखित परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है:
    • स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना: यदि कोई सांसद चुनाव जीतने के बाद अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है. 
    • व्हिप का उल्लंघन: यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी के निर्देशों (Whip) के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है और पार्टी 15 दिनों के भीतर उसे माफ नहीं करती है. 
    • निर्दलीय सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र या निर्दलीय रूप से जीता हुआ उम्मीदवार चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है.
    • मनोनीत सदस्य: यदि कोई मनोनीत (Nominated) सदस्य अपनी नियुक्ति के 6 महीने समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेता है.
  • विलय (Merger) से संबंधित अपवाद और संशोधन:
    • मूल कानून (1985): मूल प्रावधान के तहत यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई (1/3) सदस्य अलग होते हैं, तो उसे ‘विभाजन’ (Split) मानकर अयोग्यता से छूट दी जाती थी.
    • 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003: कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए इस संशोधन द्वारा एक-तिहाई के विभाजन वाले अपवाद को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. अब अयोग्यता से बचने का एकमात्र तरीका वैधानिक विलय (Valid Merger) है, जिसके लिए किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का किसी अन्य दल में विलय होना आवश्यक है.

न्यायपालिका के ऐतिहासिक फैसले:

दलबदल विरोधी कानून में पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) की शक्तियों और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं:

  • किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामला (1992): इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दसवीं अनुसूची के तहत निर्णय लेते समय लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) एक न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करता है.
    • कोर्ट ने कानून के उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया जो अध्यक्ष के निर्णय को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखता था. अर्थात, अध्यक्ष के अंतिम फैसले को उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है.
  • डॉ. काशीनाथ जी. झालमी बनाम गोवा अध्यक्ष (1993): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष के पास दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने के अपने ही पुराने निर्णय की समीक्षा (Review) करने की शक्ति नहीं है। एक बार फैसला देने के बाद, केवल अदालत ही उसकी समीक्षा कर सकती है।
  • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007): इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यदि अध्यक्ष दलबदल की शिकायतों या अवैध विलय/विभाजन के मामलों पर उचित निर्णय लेने में विफल रहता है या शिकायत को नजरअंदाज करता है, तो यह उसके संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है। ऐसी स्थिति में अदालत अध्यक्ष द्वारा अंतिम निर्णय न लिए जाने पर भी हस्तक्षेप कर सकती है।
  • केशम मेघचंद्र सिंह मामला (2020): इस मामले में न्यायपालिका ने एक बड़ा निर्देश देते हुए कहा कि अध्यक्ष को दलबदल की याचिकाओं पर अधिकतम 3 महीने की उचित समय-सीमा के भीतर निर्णय ले लेना चाहिए. केवल असाधारण परिस्थितियों में ही इसे टाला जा सकता है.

महत्त्वपूर्ण आयाम:

  • अध्यक्ष के पद की तटस्थता: अध्यक्ष एक राजनीतिक दल से जुड़ा होता है, जिससे उसके निर्णयों में पक्षपात (Political Bias) और अनावश्यक देरी की आलोचना होती है.
  • वैकल्पिक सुधार: दिनेश गोस्वामी समिति और विधि आयोग (Law Commission) ने सिफारिश की है कि दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय चुनाव आयोग की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा लिया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके.
  • संसदीय लोकतंत्र पर प्रभाव: यह कानून सांसदों को अपनी पार्टी की नीतियों के खिलाफ स्वतंत्र विचार रखने से रोकता है, जिससे वे केवल पार्टी आलाकमान के प्रतिनिधि बनकर रह जाते हैं, न कि अपनी जनता के स्वतंत्र विचारक. 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी यह नोटिस किस कानून के अंतर्गत आता है?

    यह नोटिस मुख्य रूप से संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) और लोकसभा नियम, 1985 के नियम 6 के तहत जारी किया जाता है.

  2. दलबदल विरोधी कानून के तहत अंतिम फैसला कौन करता है?

    सदन का पीठासीन अधिकारी—लोकसभा के मामले में लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) और राज्यसभा के मामले में सभापति (Chairman)-अंतिम निर्णय लेता है.

  3. क्या अयोग्यता से बचने के लिए कोई कानूनी अपवाद मौजूद है?

    हाँ, यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य दल में शामिल होने या विलय (Merger) करने का निर्णय लेते हैं, तो वे अयोग्य नहीं होते.

  4. क्या अध्यक्ष के दलबदल संबंधी निर्णय की न्यायिक समीक्षा हो सकती है?

    हाँ, किहोतो होलोहन मामले (1992) के अनुसार, अध्यक्ष के निर्णय की दुर्भावना या तकनीकी अनियमितता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.

  5. क्या कानून में दलबदल याचिका पर फैसला लेने की कोई निश्चित समय-सीमा तय है?

    मूल संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, लेकिन 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अध्यक्ष को सामान्यतः 3 महीने के भीतर निर्णय करना चाहिए.

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