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West Bengal Anti-Goonda Bill, राष्ट्रपति ने पुनर्विचार हेतु बिल वापिस भेजा

West Bengal Anti-Goonda Bill, राष्ट्रपति ने पुनर्विचार हेतु बिल वापिस भेजा

West Bengal Anti-Goonda Bill

संदर्भ:

हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पारित ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, 2026’ (West Bengal Anti-Goonda Bill) को पुनर्विचार (Reconsideration) हेतु राज्य सरकार को वापस भेजा।

West Bengal Anti-Goonda Bill क्या हैं?

  • परिचय: यह एक प्रस्तावित निवारक निरोध विधेयक (Preventive Detention Bill) है, जिसका उद्देश्य आदतन अपराधियों (Habitual Offenders) को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने तथा राज्य में सार्वजनिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और प्रशासन को असाधारण शक्तियां प्रदान करना है।
  • आवश्यकता: पश्चिम बंगाल में संगठित अपराध (Organised Crime), जबरन वसूली, सिंडिकेट राज, अवैध खनन (Illegal Mining), साइबर अपराध और सांप्रदायिक या राजनीतिक हिंसा जैसी असामाजिक गतिविधियों (Anti-Social Activities) पर अंकुश लगाने के लिए एक कड़े कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
    • गुजरात के ‘असामाजिक गतिविधि निवारण अधिनियम, 1985’ (PASA) की तर्ज पर बंगाल में भी आदतन अपराधियों पर नकेल कसने के लिए इसे तैयार किया गया था। 
  • प्रस्ताव:
    • 29 जून 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा (West Bengal Legislative Assembly) द्वारा इस विवादास्पद विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया गया। 
    • जुलाई 2026: राज्य के राज्यपाल ने इस विधेयक को संवैधानिक प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति की सहमति (Presidential Assent) के लिए आरक्षित कर केंद्र सरकार के पास भेजा। 
    • 25 सितंबर 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई विधिक आपत्तियों के बाद बिल को पुनर्विचार (Anti-Goonda Bill President Reconsideration) के लिए वापस लौटा दिया।
  • प्रमुख प्रावधान:
    • निवारक निरोध (Preventive Detention): यह प्रावधान प्रशासन को किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसे ‘गुंडा’ या असामाजिक तत्व के रूप में वर्गीकृत किया गया है, बिना किसी औपचारिक मुकदमे के 12 महीने (1 वर्ष) तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है।
    • जिलाबदर के प्रावधान (Externment Provisions): इसके तहत सक्षम प्राधिकारी किसी संदिग्ध अपराधी को एक वर्ष की अवधि के लिए निर्दिष्ट क्षेत्रों या जिलों में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर सकते हैं।
    • गुंडा और असामाजिक गतिविधियों की व्यापक परिभाषा: इसके तहत जबरन वसूली, सार्वजनिक भय पैदा करना, अवैध खनन, रेत माफिया और वित्तीय धोखाधड़ी को शामिल किया गया है।
    • तलाशी और जब्ती की शक्तियां (Search and Seizure): पुलिस को बिना वारंट के संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी करने, संपत्ति जब्त करने और अपराध को संज्ञेय (Cognizable) व गैर-जमानती (Non-Bailable) बनाने का अधिकार दिया गया है।
    • अधिकारियों को कानूनी संरक्षण: अधिनियम के कार्यान्वयन के दौरान सद्भावनापूर्वक (Good Faith) की गई कार्रवाई के लिए लोक सेवकों को कानूनी अभियोजन से मुक्ति (Legal Immunity) दी गई है।
    • सलाहकार बोर्ड (Advisory Board): प्रत्येक निरोध मामले की समीक्षा तीन सप्ताह के भीतर एक उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले बोर्ड द्वारा की जाएगी। 

विधेयक के पक्ष और विपक्ष में तर्क:

पक्ष में तर्क (Arguments For)

  1. कठोर निवारक प्रभाव (Deterrent Effect): बिना मुकदमे के हिरासत की शक्ति से संगठित सिंडिकेट्स और आदतन अपराधियों में डर पैदा होगा, जिससे अपराध दर में कमी आएगी।
  2. कानून-व्यवस्था में सुधार: पुलिस को त्वरित कार्रवाई की स्वतंत्रता मिलने से जबरन वसूली और अवैध रेत/खनिज खनन पर तत्काल रोक लगेगी।
  3. सार्वजनिक सुरक्षा की बहाली: दंगे या राजनीतिक हिंसा भड़काने वाले तत्वों को अग्रिम रूप से हिरासत में लेकर सार्वजनिक शांति सुनिश्चित की जा सकती है। 

विपक्ष में तर्क (Arguments Against)

  1. नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन (Threat to Civil Liberties): बिना मुकदमे के 12 महीने की हिरासत (Preventive Detention) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन कर सकती है।
  2. राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका: विपक्ष का आरोप है कि इस कानून का उपयोग शांतिपूर्ण आंदोलनों, छात्र प्रदर्शनों और असहमति की आवाजों को दबाने के लिए किया जा सकता है।
  3. शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण: पुलिस और नौकरशाही को व्यापक विवेकाधीन शक्तियां मिलने से मानवाधिकारों के उल्लंघन (Human Rights Violation) का खतरा बढ़ जाता है। 

केंद्रीय कानूनों के साथ टकराव और वापसी का कारण:

राष्ट्रपति द्वारा विधेयक लौटाए जाने (Anti-Goonda Bill Returned) का मुख्य कारण विधिक विसंगति (Repugnancy) है:

  • NDPS Act से संबंध: विधेयक की धारा 2(d)(iii)(B) के तहत मादक पदार्थों की तस्करी (Drug Trafficking) और ‘एनडीपीएस अधिनियम, 1985’ (NDPS Act) के तहत आने वाले अपराधों को भी ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल कर लिया गया था।
  • PITNDPS Act से टकराव: केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि मादक पदार्थों के अवैध व्यापार के निवारक निरोध के लिए पहले से ही एक केंद्रीय कानून ‘PITNDPS अधिनियम, 1988’ अस्तित्व में है।
  • संवैधानिक गतिरोध: एक ही विषय पर केंद्र और राज्य के दो अलग-अलग निवारक निरोध तंत्र होने से अनुच्छेद 254 (Article 254) के तहत विधिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही थी, जिसके कारण इसे वापस भेजा गया। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: West Bengal Anti-Goonda Bill 2026 क्या है?

उत्तर: यह पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित एक सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (West Bengal Public Safety Bill) है, जो संगठित अपराधियों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति देता है।

प्रश्न 2: राष्ट्रपति ने Anti-Goonda Bill को पुनर्विचार के लिए क्यों लौटाया?

उत्तर: विधेयक का एक प्रावधान केंद्रीय मादक पदार्थ विरोधी कानून (PITNDPS Act) के साथ ओवरलैप (Overlap) हो रहा था, जिससे संवैधानिक विसंगति पैदा हो रही थी।

प्रश्न 3: West Bengal Public Safety Bill में क्या प्रावधान हैं?

उत्तर: इसमें अपराधियों के लिए 12 महीने तक की निवारक हिरासत, जिलाबदर (Externment), बिना वारंट तलाशी और अपराधों को गैर-जमानती बनाने के कठोर प्रावधान हैं। 

प्रश्न 4: Anti-Goonda Bill का NDPS Act से क्या संबंध है?

उत्तर: इस बिल में एनडीपीएस अधिनियम (NDPS Act) के तहत नशीली दवाओं की तस्करी करने वालों को भी ‘गुंडा’ की श्रेणी में शामिल किया गया था। 

प्रश्न 5: क्या राष्ट्रपति द्वारा Bill लौटाने के बाद उसे फिर से Assembly में पेश किया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, राज्य सरकार विवादित प्रावधानों में संशोधन करके इस विधेयक को दोबारा विधानसभा से पास कराकर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज सकती है। 

प्रश्न 6: West Bengal Anti-Goonda Bill में preventive detention क्या है?

उत्तर: इसके तहत किसी व्यक्ति को भविष्य में अपराध करने से रोकने के लिए बिना किसी न्यायिक मुकदमे या दोषसिद्धि के 1 वर्ष तक जेल में रखा जा सकता है।

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