16th century saint Thirumanakai Alvar statue

संदर्भ:
हाल ही में, ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय स्थित एशमोलियन संग्रहालय ने 16वीं शताब्दी की संत थिरुमनकाई अलवर (Saint Thirumankai Alvar) की एक दुर्लभ कांस्य प्रतिमा औपचारिक रूप से भारत को लौटाई। 3 मार्च, 2026 को लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में आयोजित एक समारोह के दौरान इस प्रतिमा को भारतीय अधिकारियों को सौंपा गया।
- इसे 1950 के दशक के दौरान मंदिर से चुराया गया था। एशमोलियन संग्रहालय ने इसे 1967 में ‘सोथबी’ (Sotheby’s) की नीलामी में डॉ. जे.आर. बेलमोंट के संग्रह से खरीदा था।
संत थिरुमनकाई अलवर कौन थे?
संत थिरुमनकाई अलवर दक्षिण भारत के 12 वैष्णव संत-कवियों (अलवर) में से अंतिम और सबसे विद्वान संतों में से एक थे। वे 8वीं शताब्दी के दौरान सक्रिय थे और उन्हें भगवान विष्णु के ‘शारंग धनुष’ का अवतार माना जाता है।
जीवन और रूपांतरण
- प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म तमिलनाडु के तिरुकुरैयालुर में ‘कल्लार’ समुदाय में हुआ था। उनका मूल नाम कलियन या नीलन था।
- योद्धा से राजा: वे चोल सेना में एक पराक्रमी सेनापति थे। उनकी वीरता से प्रसन्न होकर चोल राजा ने उन्हें ‘थिरुमनकाई’ क्षेत्र का शासक नियुक्त किया, जिससे उनका नाम ‘थिरुमनकाई मन्नान’ (थिरुमनकाई का राजा) पड़ा। उन्हें ‘परकाल’ (शत्रुओं के लिए यमराज) की उपाधि भी दी गई थी।
- भक्ति का मार्ग: किंवदंतियों के अनुसार, अपनी पत्नी कुमुदवल्ली की शर्त (1008 वैष्णवों को प्रतिदिन भोजन कराना) पूरी करने के लिए उन्होंने डकैती तक का सहारा लिया। अंततः, भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और ‘अष्टाक्षर मंत्र’ (ओम नमो नारायणाय) का ज्ञान देकर उन्हें एक महान संत में बदल दिया।
साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान
- रचनाएं: उन्होंने ‘नालयिरा दिव्य प्रबंधम’ में 1,361 भजों का योगदान दिया है, जो किसी भी अन्य अलवर संत से अधिक है। उनकी प्रमुख छह रचनाओं (जैसे पेरिया थिरुमोझी) को चार वेदों के छह ‘वेदांगों’ के समान माना जाता है।
- दिव्य देश यात्रा: उन्होंने भारत के 108 पवित्र वैष्णव मंदिरों (दिव्य देशों) में से 88 की यात्रा की और उनकी महिमा में भजन गाए।
- स्थापत्य: उन्हें श्रीरंगम स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर की तीसरी रक्षात्मक दीवार (प्राकार) के निर्माण का श्रेय भी दिया जाता है।
संत थिरुमनकाई अलवर की प्रतिमा की विशेषताएं:
- निर्माण काल और सामग्री: यह प्रतिमा 16वीं शताब्दी की है और उच्च गुणवत्ता वाले कांस्य (Bronze) से बनी है। इसकी ऊंचाई लगभग 60 सेंटीमीटर है।
- मूल स्थान: यह प्रतिमा मूल रूप से तमिलनाडु के थडिकोम्बू (Thadikombu) स्थित श्री सुंदरराजा पेरुमल मंदिर (Shri Soundararaja Perumal Temple) से संबंधित है।
- मुद्रा और स्वरूप: प्रतिमा में संत को एक योद्धा-भक्त के रूप में दर्शाया गया है। उनके एक हाथ में ढाल (Shield) और दूसरे में तलवार (Sword) है। यह उनके प्रारंभिक जीवन (सेनापति और राजा के रूप में) और उनके द्वारा धर्म की रक्षा के प्रतीक को दर्शाता है।
- वेशभूषा: प्रतिमा में उन्हें पारंपरिक दक्षिण भारतीय शैली के आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित दिखाया गया है, जो उस काल की उत्कृष्ट शिल्प कौशल को दर्शाता है।