Supreme Court order on Pennaiyar river water dispute
संदर्भ:
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए पेन्नैयार (दक्षिणा पिनाकिनी) नदी जल विवाद के समाधान के लिए एक महीने के भीतर विशेष न्यायाधिकरण गठित करने का आदेश दिया है।
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यों के बीच इस लंबित विवाद को सुलझाने के लिए अब और देरी का कोई आधार नहीं है।
- इससे पहले नवंबर 2024 में केंद्र ने अदालत को सूचित किया था कि दोनों राज्यों के बीच मध्यस्थता प्रक्रिया विफल हो गई है।
पेन्नैयार (दक्षिणा पिनाकिनी) नदी के बारे में:
- उद्गम एवं विस्तार: यह नदी कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर जिले में नंदी पहाड़ियों (चेन्नाकेशव पर्वत) से निकलती है। यह दक्षिण भारत की एक प्रमुख पूर्व-प्रवाहित नदी है, जो लगभग 432 किमी की दूरी तय कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- प्रवाह क्षेत्र: इसका जलग्रहण क्षेत्र कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी में फैला हुआ है। तमिलनाडु में इसका सबसे बड़ा हिस्सा आता है।
- सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में मार्कंडेय, चिन्नार, वानियार और पंबन शामिल हैं।
- आर्थिक महत्व: यह नदी शुष्क क्षेत्रों के लिए कृषि और पेयजल का प्राथमिक स्रोत है। इस पर बने ‘साथनूर बांध’ (तमिलनाडु) जैसे जलाशय सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण हैं।
पेन्नैयार नदी जल विवाद की पृष्ठभूमि:
- राज्य: यह विवाद मुख्य रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच है।
- विवाद: तमिलनाडु ने 2018 में कर्नाटक द्वारा पेन्नैयार नदी की सहायक नदी मार्कंडेय नदी पर चेक डैम और पानी मोड़ने वाली संरचनाओं के निर्माण के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
- तमिलनाडु का पक्ष: तमिलनाडु का तर्क है कि कर्नाटक द्वारा ऊपरी क्षेत्रों में किए जा रहे निर्माण से निचले क्षेत्रों में पानी का प्रवाह कम हो जाएगा, जिससे किसानों की सिंचाई और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होगी।
- कर्नाटक का पक्ष: कर्नाटक इन परियोजनाओं को अपनी पेयजल आवश्यकताओं के लिए आवश्यक मानता है।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान:
- अनुच्छेद 262: इसमें संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति दी गई है।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956: इसी कानून के तहत केंद्र सरकार न्यायाधिकरणों का गठन करती है। अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, यदि केंद्र को लगता है कि बातचीत से समाधान संभव नहीं है, तो वह न्यायाधिकरण बना सकता है।
- संसदीय क्षेत्राधिकार: अनुच्छेद 262 के तहत संसद यह प्रावधान भी कर सकती है कि न तो सर्वोच्च न्यायालय और न ही कोई अन्य न्यायालय ऐसे विवाद के संबंध में क्षेत्राधिकार का प्रयोग करेगा।

