फसल उत्सव मिथुन संक्रांति (Mithun Sankranti Festival)
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संदर्भ:
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओडिशा के प्रमुख कृषि और मानसून आधारित फसल उत्सव मिथुन संक्रांति (Mithun Sankranti Festival या राजा) के अवसर पर देशवासियों, विशेषकर ओडिशा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दी।
Mithun Sankranti Festival के बारे में:
- परिचय: ‘मिथुन संक्रांति’ (Mithuna Sankranti) जिसे ‘राजा परबा’ (Raja Parba) के नाम से भी जाना जाता है, ओडिशा में मनाया जाने वाला एक फसल उत्सव है।
- यह पर्व मुख्य रूप से प्रकृति के बदलाव, मानसून के आगमन, कृषि चक्र की शुरुआत और नारीत्व (Womanhood) के सम्मान को समर्पित है।
- महत्व: हिंदू पंचांग और सौर कैलेंडर के अनुसार, जब सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस विशिष्ट काल को मिथुन संक्रांति कहा जाता है।
- यह संक्रांति हिंदू वर्ष के तीसरे सौर महीने और आषाढ़ मास की शुरुआत का प्रतीक है। इस समय उत्तर भारत में तीव्र ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ऋतु (मानसून) का आगमन होता है, जो कृषि के लिए जीवनदायिनी मानी जाती है।
- इस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। सूर्य गोचर के समय पवित्र नदियों में स्नान, पितरों के लिए श्राद्ध और वस्त्र, अनाज, तिल, तथा जल का दान करने का अत्यधिक धार्मिक महत्व है।
- मान्यता: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ‘राजा’ शब्द संस्कृत के ‘रजस्वला’ (मासिक धर्म) से प्रेरित है। माना जाता है कि इन तीन दिनों में भगवान जगन्नाथ की अर्धांगिनी ‘भूदेवी’ (धरती माता) अपने वार्षिक मासिक चक्र से गुजरती हैं।
- जिस प्रकार महिलाओं में मासिक धर्म सृजन और उर्वरता (Fertility) का प्रतीक है, उसी प्रकार धरती मां का यह समय कृषि के नए सीजन से पहले खुद को पुनर्जीवित (Rejuvenate) करने का विश्राम काल है।
- उत्सव: यह त्योहार मुख्य रूप से चार दिनों तक क्रमानुसार विभिन्न अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है:
- सजाबजा (Sajabaja – पूर्व तैयारी का दिन): आधिकारिक त्योहार से एक दिन पहले घर-आंगन की सफाई की जाती है। रसोई के औजारों और विशेष रूप से सिलबट्टे (Grinding Stone) को साफ करके रख दिया जाता है।
- पहिल राजा (Pahili Raja – प्रथम दिन): यह त्योहार का पहला दिन होता है, जिसमें सुबह से ही उत्सव और उमंग की शुरुआत होती है। लड़कियां तड़के उठकर शुद्ध स्नान करती हैं।
- मिथुन/राजा संक्रांति (Mithuna Sankranti – द्वितीय दिन): यह मध्य का मुख्य दिन होता है। इस दिन सूर्य का राशि परिवर्तन होता है।
- भू दाह या बासी राजा (Bhu Daha / Basi Raja – तृतीय दिन): यह धरती माता के विश्राम काल का अंतिम दिन होता है।
- वसुमती स्नान (Vasumati Snana – चतुर्थ दिन): चौथे दिन धरती माता के प्रतीक रूप में रसोई के सिलबट्टे को दूध और जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद चंदन, सिंदूर, हल्दी और फूलों से भूमि की विदाई पूजा की जाती है, जिसके बाद ही धरती पुनः काम के लिए तैयार मानी जाती है।
- प्रतिबंध: इन तीन दिनों के दौरान पृथ्वी को किसी भी प्रकार की क्षति या व्यवधान से बचाने के लिए कृषि कार्य पूरी तरह स्थगित रहते हैं।
- खेतों में हल चलाना, कुदाल चलाना, भूमि की खुदाई करना, या पौधों/घास को तोड़ना पूरी तरह से वर्जित होता है। अविवाहित लड़कियां जमीन पर नंगे पैर नहीं चलतीं; वे पैरों की सुरक्षा के लिए पारंपरिक चप्पलें पहनती हैं या घास के टुकड़ों का उपयोग करती हैं।
- सांस्कृतिक प्रथाएं: पेड़ों की मजबूत शाखाओं पर रस्सियों और फूलों से सुंदर झूले बांधे जाते हैं। महिलाएं और युवा लड़कियां नए वस्त्र पहनकर, पैरों में अलता लगाकर पारंपरिक ‘राजा गीता’ (लोकगीत) गाते हुए झूला झूलती हैं।
- इस त्योहार का मुख्य आकर्षण ‘पोड़ा पीठा’ (Poda Pitha) है, जो चावल, गुड़, नारियल और देशी घी से धीमी आंच पर पकाया जाने वाला एक बेक्ड केक है। इसके अतिरिक्त मीठा पान (Mitha Pana) चबाना इस उत्सव की एक आवश्यक परंपरा है।
- पुरुष और बच्चे ताश, पासा और कबड्डी जैसे पारंपरिक इनडोर व आउटडोर खेल खेलते हैं। कुछ क्षेत्रों में ‘दल्खाई’ (Dalkhai) जैसे पारंपरिक लोक नृत्य और संगीत की प्रस्तुतियां इस उत्सव की रौनक बढ़ाती हैं।
भारत के प्रमुख फसल उत्सवों (Harvest Festivals) के नाम:
| उत्सव का नाम (Festival Name) | संबंधित राज्य/क्षेत्र (State/Region) | मनाने का समय (Season/Month) |
| मकर संक्रांति (Makar Sankranti) | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार | जनवरी (शीतकालीन फसल) |
| पोंगल (Pongal) | तमिलनाडु | जनवरी (धान की कटाई) |
| बिहू (Bhogali Bihu / Magh Bihu) | असम | जनवरी |
| लोहड़ी (Lohri) | पंजाब और हरियाणा | जनवरी (गन्ने की कटाई) |
| उत्तरायण (Uttarayan) | गुजरात | जनवरी |
| पौष संक्रांति (Poush Sankranti) | पश्चिम बंगाल | जनवरी |
| बैसाखी (Baisakhi) | पंजाब और हरियाणा | अप्रैल (रबी फसल – गेहूं की कटाई) |
| विशू (Vishu) | केरल | अप्रैल (मलयालम नव वर्ष) |
| पुथांडु (Puthandu) | तमिलनाडु | अप्रैल |
| बोहाग बिहू (Bohag Bihu) | असम | अप्रैल (वसंत ऋतु/बुआई का समय) |
| ओणम (Onam) | केरल | अगस्त/सितंबर (धान की नई फसल) |
| नुआखाई (Nuakhai) | ओडिशा और छत्तीसगढ़ | अगस्त/सितंबर (नया चावल ग्रहण करना) |
| वांगला (Wangala) | मेघालय और असम (गारो जनजाति) | नवंबर (सर्दियों की शुरुआत) |
| नबान्न (Nabanna) | पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश | नवंबर/दिसंबर (धान की नई फसल) |
| हरेली (Hareli) | छत्तीसगढ़ | जुलाई/अगस्त (सावन अमावस्या) |
| करम परब (Karam Parab) | झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल | अगस्त/सितंबर |
FAQs:
1. मिथुन संक्रांति क्या है?
यह हिंदू कैलेंडर का एक उत्सव है, जो सूर्य के वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करने का प्रतीक माना जाता है।
2. यह उत्सव कब मनाया जाता है?
यह त्योहार प्रतिवर्ष सौर आषाढ़ महीने की शुरुआत में, आमतौर पर जून के मध्य (14-15 जून) में मनाया जाता है।
3. इसका सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह त्योहार प्रकृति, धरती माता के सम्मान और महिलाओं के सशक्तीकरण व उनके सम्मान के उत्सव का सांस्कृतिक प्रतीक है।
4. किन राज्यों में यह प्रमुख रूप से मनाया जाता है?
यह पर्व मुख्य रूप से ओडिशा (जहाँ इसे ‘राजा परबा’ कहते हैं), पश्चिम बंगाल और भारत के पूर्वी हिस्सों में मनाया जाता है।
5. फसल उत्सव के रूप में इसकी क्या भूमिका है?
यह मानसून के आगमन और कृषि वर्ष की शुरुआत का जश्न मनाता है, जिसमें धरती माता को अगली अच्छी फसल के लिए तैयार माना जाता है।
