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औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक 2026 (Industrial Relations Code Bill 2026) | UPSC Preparation

Industrial Relations Code Bill 2026

Industrial Relations Code Bill 2026

संदर्भ

हाल ही में लोकसभा द्वारा औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया गया। यह विधेयक मूल ‘औद्योगिक संबंध संहिता, 2020’ में संशोधन है और इसका मुख्य उद्देश्य बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, ‘गिग इकोनॉमी’ के उदय और व्यापार सुगमता के बीच संतुलन बनाना है।

औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 की मुख्य विशेषताएं:

  • श्रमिक’ (Worker) की परिभाषा का विस्तार: संशोधन के माध्यम से ‘श्रमिक’ (Worker) की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। अब इसमें गिग वर्कर्स (Gig Workers) और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी शामिल किया गया है, जिससे उन्हें सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार मिल सकेगा।

  • ​छंटनी और तालाबंदी के नियमों में परिवर्तन: ​वर्तमान में, 300 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों को छंटनी या बंदी के लिए सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होती है। नए संशोधन में राज्य सरकारों को अपने विवेक से 300 से 500 के बीच समायोजित करने की शक्ति दी गई है।

  • ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ (FTE) को बढ़ावा: ​संशोधन में ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ (निश्चित अवधि के रोजगार) के लिए अधिक स्पष्टता प्रदान की गई है। ​FTE श्रमिकों को अब नियमित श्रमिकों के समान ही आनुपातिक (Pro-rata) आधार पर वैधानिक लाभ (जैसे ग्रेच्युटी) प्राप्त होंगे, चाहे उनकी सेवा अवधि कितनी भी कम क्यों न हो।

  • ​हड़ताल की सूचना: ​अब किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान (न कि केवल सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं) में हड़ताल पर जाने से पहले 60 दिन की पूर्व सूचना देना अनिवार्य कर दिया गया है। 

  • ​विवाद निवारण तंत्र:  विवादों को निपटाने के लिए त्रि-स्तरीय ढांचे बनाया गया है:

  1. सुलह अधिकारी (Conciliation Officer): प्रारंभिक स्तर पर बातचीत के माध्यम से समाधान।
  1. औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal): यदि सुलह विफल रहती है, तो मामला न्यायाधिकरण में जाएगा। संशोधन ने न्यायाधिकरण के निर्णयों को लागू करने के लिए समय-सीमा तय की है।
  2. राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण: राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के लिए।
  • ट्रेड यूनियनों की मान्यता: ​विधेयक में प्रावधान है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में एक से अधिक ट्रेड यूनियन हैं, तो 51% या उससे अधिक समर्थन प्राप्त यूनियन को ही ‘एकमात्र वार्ता संघ’ (Sole Negotiating Union) के रूप में मान्यता दी जाएगी।

  • ​डिजिटल लेबर कोर्ट: ​विवादों के तेजी से निपटारे के लिए ‘वर्चुअल ट्रिब्यूनल’ की स्थापना का प्रस्ताव है, जहाँ साक्ष्यों को डिजिटल रूप से प्रस्तुत किया जा सकेगा, जिससे समय और धन की बचत होगी।

  • ​सामाजिक सुरक्षा: ​विधेयक में एक ‘राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड’ के गठन का प्रावधान है। यह बोर्ड विशेष रूप से उन श्रमिकों के लिए योजनाएं बनाएगा जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों से बाहर हैं।

  • कॉर्पोरेट योगदान: ई-कॉमर्स कंपनियों को अपने वार्षिक टर्नओवर का एक निश्चित हिस्सा (1-2%) इस कल्याण कोष में जमा करना होगा।

पक्ष और विपक्ष:

सकारात्मक पक्ष (Pros):

  1. श्रम कानूनों का सरलीकरण: 29 से अधिक जटिल श्रम कानूनों को 4 संहिताओं में समेटने की प्रक्रिया पूर्ण होगी।
  2. निवेश को बढ़ावा: नियमों में स्पष्टता और लचीलेपन से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) आकर्षित होगा।
  3. अदृश्य कार्यबल को पहचान: भारत के करोड़ों गिग वर्कर्स को पहली बार वैधानिक मान्यता मिली है।

​चिंताएं (Cons):

  1. श्रमिक अधिकारों का हनन: आलोचकों का तर्क है कि छंटनी के नियमों में ढील देने से ‘हायर एंड फायर’ की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।
  2. यूनियनों का विरोध: ट्रेड यूनियनों का मानना है कि 51% की शर्त से छोटी यूनियनों की आवाज दब जाएगी।
  3. कार्यान्वयन की जटिलता: श्रम ‘समवर्ती सूची’ (Concurrent List) का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच नियमों में एकरूपता लाना कठिन होगा।

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