भारत-रूस RELOS रक्षा समझौता | India-Russia RELOS Defence Agreement

संदर्भ:
भारत और रूस के पारस्परिक रसद विनिमय समझौता (Reciprocal Exchange of Logistics Support – RELOS) आधिकारिक रूप से लागू कर दिया है। यह समझौता 12 जनवरी 2026 से प्रभावी हुआ, जो दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को एक संस्थागत ढांचा प्रदान करता है।
RELOS रक्षा समझौता क्या हैं?
यह एक प्रशासनिक सैन्य समझौता है जो दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और हवाई क्षेत्रों का उपयोग ईंधन भरने, मरम्मत और रसद आपूर्ति के लिए करने की अनुमति देता है।
RELOS समझौते के प्रमुख प्रावधान:
- सैन्य तैनाती की सीमा: समझौते के अनुसार, दोनों देश एक-दूसरे के क्षेत्र में एक ही समय में अधिकतम 3,000 सैन्य कर्मी, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत तैनात कर सकते हैं।
- लॉजिस्टिक्स और सेवाएं: इसके तहत सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और हवाई क्षेत्रों का उपयोग ईंधन भरने (Refuelling), मरम्मत (Repairs), रसद आपूर्ति (Restocking) और कर्मियों के रहने के लिए कर सकेंगी।
- अवधि और विस्तार: यह समझौता प्रारंभिक रूप से 5 वर्षों के लिए वैध है, जिसे आपसी सहमति से अगले 5 वर्षों के लिए स्वचालित रूप से विस्तारित किया जा सकता है।
- लागू होने की परिस्थितियाँ: यह मुख्य रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास (जैसे ‘इंद्र’), प्रशिक्षण मिशन, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) और आपसी सहमति वाले अन्य ऑपरेशनों के दौरान प्रभावी रहेगा।
- भुगतान तंत्र: लॉजिस्टिक्स सेवाओं के लिए प्रतिपूर्ति का प्रावधान है, जिसमें सीधे भुगतान के बजाय वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय (Barter) भी संभव है।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व:
- आर्कटिक और सुदूर पूर्व में पहुंच: भारत को अब व्लादिवोस्तोक से लेकर मुरमांस्क और सेवेरोमोर्स्क जैसे 40 से अधिक रणनीतिक रूसी ठिकानों तक पहुंच मिलेगी। यह भारत की ‘आर्कटिक नीति’ और ‘उत्तरी समुद्री मार्ग’ (Northern Sea Route) के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
- रूसी मूल के हथियारों का रख-रखाव: भारतीय शस्त्रागार का लगभग 60-70% हिस्सा रूसी मूल (S-400, Su-30MKI, T-90 टैंक) का है। RELOS इन उपकरणों के लिए स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया को सरल बनाता है।
- इंडो-पैसिफिक में संतुलन: जहाँ अमेरिका के साथ भारत का LEMOA समझौता है, वहीं रूस के साथ RELOS लागू कर भारत ने अपनी ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति को मजबूत किया है।
- परिचालन लागत में कमी: लंबी दूरी के मिशनों के दौरान विदेशी बंदरगाहों पर रसद की व्यवस्था करना महंगा होता है। इस समझौते से भारत की परिचालन लागत में लगभग 20–25% की कमी आने का अनुमान है।
रूस के लिए लाभ:
रूस को हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए भारतीय बंदरगाहों तक आसान रसद पहुंच प्राप्त होगी। यह उसे इस क्षेत्र में एक सक्रिय समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित होने में मदद करेगा।