रक्षा मंत्रालय का ट्रॉल सिस्टम के लिए 975 करोड़ रुपये का अनुबंध | Defence Ministry signs Rs 975 crore contract for trawl system

संदर्भ:
रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय सेना के मुख्य युद्धक टैंकों (MBT) की परिचालन क्षमता बढ़ाने हेतु T-72 और T-90 टैंकों के लिए स्वदेशी ‘ट्रॉल सिस्टम’ की खरीद हेतु 975 करोड़ रुपये के दो बड़े अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए। यह अनुबंध स्वदेशी रक्षा निर्माताओं के साथ किए गए हैं, जो ‘बाय (इंडियन-आईडीडीएम)’ श्रेणी के तहत आते हैं।
ट्रॉल सिस्टम क्या हैं?
- परिचय: ट्रॉल सिस्टम एक जटिल इंजीनियरिंग उपकरण है जिसे मुख्य युद्धक टैंकों (जैसे T-72 और T-90) के अगले हिस्से पर फिट किया जाता है। यह एक ‘माइन-क्लीयरिंग’ (सुरंग हटाने वाला) तंत्र है जो युद्ध क्षेत्र में बिछाई गई एंटी-टैंक बारूदी सुरंगों को हटाने या उन्हें सुरक्षित रूप से विस्फोटित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
उद्देश्य:
- गतिशीलता सुनिश्चित करना: टैंकों के काफिले के लिए दुश्मन के माइन-फील्ड में सुरक्षित रास्ता (Safe Lane) बनाना।
- जीवन रक्षा: सैनिकों और करोड़ों की लागत वाले टैंकों को गुप्त बारूदी सुरंगों के विनाशकारी प्रभाव से बचाना।
- ऑपरेशनल स्पीड: मैन्युअल तरीके से सुरंग खोजने की धीमी प्रक्रिया को समाप्त कर सैन्य हमले की गति को बनाए रखना।
प्रमुख विशेषताएं:
- स्वदेशी निर्माण: इसे डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित किया गया है और अब ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित किया जा रहा है।
- बहुमुखी प्रतिभा: यह सिस्टम रेतीले, मैदानी और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
- मैग्नेटिक सेंसर: यह न केवल भौतिक दबाव बल्कि आधुनिक ‘प्रॉक्सिमिटी मैग्नेटिक फ्यूज’ वाली आधुनिक सुरंगों को भी चकमा देने या नष्ट करने में सक्षम है।
- गति: टैंक अलाइनमेंट में लगभग 5 मिनट लगते हैं और यह 4 किमी/घंटा की गति से सुरंग सफाई (Trawling) कर सकता है।
- अवयव: इसमें मुख्य रूप से दो भाग होते हैं—ट्रॉल रोलर और ट्रैक विड्थ माइन प्लो (TWMP)। इन्हें आवश्यकतानुसार अलग-अलग या एक साथ उपयोग किया जा सकता है।
कार्यप्रणाली:
- रोलर विधि (Roller Method): इसमें भारी लोहे के पहिए (Rollers) जमीन पर अत्यधिक दबाव डालते हैं। जैसे ही रोलर सुरंग के ऊपर से गुजरता है, वह अपने वजन से उसे विस्फोटित कर देता है। यह टैंक के वास्तविक ट्रैक के लिए रास्ता साफ करता है।
- प्लो विधि (Plough Method): इसमें लगे ‘हल’ (Plough) जैसे दांते जमीन की ऊपरी परत को खोदते हुए सुरंगों को उखाड़कर किनारे फेंक देते हैं, जिससे टैंक के बीच का रास्ता सुरक्षित हो जाता है।
- इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक डिवाइस: यह टैंक के आगे एक कृत्रिम चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, जिससे चुंबकीय सुरंगें टैंक के पहुंचने से पहले ही दूर फट जाती हैं।
महत्व:
- MSME को बढ़ावा: इन प्रणालियों के निर्माण में कई भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) शामिल होंगे, जिससे रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा।
- तकनीकी संप्रभुता: पहले भारत इन उपकरणों के लिए रूस या अन्य देशों पर निर्भर था। अब तकनीक का स्वामित्व भारत के पास होगा।
- पश्चिमी सीमा की सुरक्षा: भारत की पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान के साथ) पर मैदानी और रेगिस्तानी इलाके हैं जहाँ टैंक युद्ध की संभावना अधिक होती है। यहाँ बारूदी सुरंगें एक बड़ी चुनौती हैं।
- बख्तरबंद कोर की शक्ति: T-90 ‘भीष्म’ और T-72 ‘अजेय’ भारतीय सेना के स्तंभ हैं। उन्हें आधुनिक ट्रॉल्स से लैस करने का मतलब है कि वे किसी भी बाधा को पार करने में सक्षम होंगे।