भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 | India first private orbital rocket Vikram-1

संदर्भ:
हाल ही में हैदराबाद स्थित स्पेस स्टार्टअप Skyroot Aerospace अपने बहुप्रतीक्षित रॉकेट ‘विक्रम-1’ (Vikram-1) को जून 2026 के आसपास लॉन्च करने की तैयारी में है। हाल ही में इस रॉकेट के हार्डवेयर को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) के लिए रवाना किया गया है।
निजी कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 के बारे में:
विक्रम-1 भारत का पहला निजी क्षेत्र द्वारा विकसित ‘कक्षीय-श्रेणी’ का प्रक्षेपण यान (Orbital Launch Vehicle) है। ‘कक्षीय’ होने का अर्थ है कि इसमें उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में एक निश्चित गति से स्थापित करने की क्षमता है, ताकि वे पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा सकें। यह ‘सब-ऑर्बिटल’ रॉकेटों (जैसे विक्रम-S) से भिन्न है, जो केवल अंतरिक्ष की सीमा को छूकर वापस आ जाते हैं।
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इसका निर्माण हैदराबाद स्थित एयरोस्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने किया है। इसकी स्थापना पूर्व इसरो वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका द्वारा।
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इसे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) और इसरो (ISRO) के तकनीकी सहयोग और सुविधाओं (जैसे श्रीहरिकोटा लॉन्च पैड) के माध्यम से विकसित किया गया है।
मुख्य उद्देश्य:
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किफायती प्रक्षेपण: छोटे उपग्रहों (Small Satellites) के लिए ‘ऑन-डिमांड’ और सस्ता प्रक्षेपण समाधान प्रदान करना।
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व्यावसायिक बाजार: वैश्विक नैनो और सूक्ष्म उपग्रह बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना।
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तकनीकी प्रदर्शन: पूरी तरह से 3D-प्रिंटेड इंजन और कार्बन-कंपोजिट बॉडी की प्रभावशीलता को सिद्ध करना।
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त्वरित तैनाती: पारंपरिक रॉकेटों के विपरीत, इसे बहुत कम समय में लॉन्च के लिए तैयार करना।
तकनीकी विशेषताएं:
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बहु-चरणीय प्रणाली: यह एक 4-चरणीय (Four-stage) रॉकेट है।
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प्रथम तीन चरण: ठोस ईंधन (Solid Fuel) आधारित।
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चौथा चरण (अपर स्टेज): तरल ईंधन (Liquid Fuel) आधारित ‘हाइपरगोलिक’ इंजन, जो उपग्रहों को सटीक कक्षा में रखता है।
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पेलोड क्षमता: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 480 किलोग्राम तक और सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (SSO) में लगभग 290 किलोग्राम।
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पदार्थ (Materials): रॉकेट की पूरी संरचना ‘ऑल-कार्बन फाइबर’ से बनी है, जो इसे असाधारण रूप से हल्का और मजबूत बनाती है।
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3D-प्रिंटिंग: इसके ऊपरी चरण के इंजनों में 3D-प्रिंटेड तकनीक का व्यापक उपयोग किया गया है, जिससे पुर्जों की संख्या कम हुई है और दक्षता बढ़ी है।
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इंजन के नाम:
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कलाम श्रृंखला (Kalam Series): ठोस इंजनों के लिए (कलाम-100, 250 आदि)।
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रमन श्रृंखला (Raman Series): तरल ईंधन वाले ऊपरी चरण के लिए।
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अन्य रॉकेट्स के साथ तुलना:
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रॉकेट |
श्रेणी |
पेलोड क्षमता |
स्थिति |
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विक्रम-S |
सब-ऑर्बिटल |
प्रायोगिक |
सफल (नवंबर 2022) |
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विक्रम-1 |
कक्षीय (Orbital) |
480 kg (LEO) |
जून 2026 में प्रस्तावित |
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विक्रम-2 |
कक्षीय (भारी) |
595 kg (LEO) |
विकास के चरण में |
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विक्रम-3 |
कक्षीय (सर्वाधिक भारी) |
815 kg (LEO) |
भविष्य की योजना |
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ISRO SSLV |
सरकारी (Small Sat) |
500 kg (LEO) |
परिचालन में |
महत्व:
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: 2020 के अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारों और IN-SPACe की स्थापना के बाद यह भारत का पहला निजी कक्षीय मिशन होगा।
- वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी: वैश्विक लघु उपग्रह प्रक्षेपण बाजार (Small Satellite Market) तेजी से बढ़ रहा है। विक्रम-1 जैसी किफायती तकनीकें भारत को इस बाजार में अग्रणी बना सकती हैं।
- आत्मनिर्भर भारत: 99% स्वदेशी घटकों के साथ, यह मिशन रक्षा और अनुसंधान क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
- अंतरिक्ष सुधार 2020: विक्रम-1 की सफलता भारत सरकार के उन सुधारों का प्रमाण है, जिनका उद्देश्य अंतरिक्ष गतिविधियों का वि-सरकारीकरण करना था।