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नीति आयोग की स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया रिपोर्ट

नीति आयोग की स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया रिपोर्ट

School Education System in India Report by NITI Aayog

संदर्भ:

हाल ही में नीति आयोग ने ‘School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement’ शीर्षक से एक व्यापक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट 2014-15 से 2024-25 तक के एक दशक का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है और Viksit Bharat @2047 के विजन को ध्यान में रखते हुए 13 सूत्रीय रोडमैप का प्रस्ताव दिया गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख सांख्यिकीय निष्कर्ष:

  • सकल नामांकन अनुपात (GER): प्राथमिक स्तर पर नामांकन लगभग सार्वभौमिक है, लेकिन उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) स्तर पर यह केवल 58.4% है। 
  • विश्व का सबसे बड़ा स्कूली तंत्र: भारत में 14.71 लाख स्कूल हैं, जिनमें 24.69 करोड़ से अधिक छात्र और 1.01 करोड़ से अधिक शिक्षक हैं।
  • नामांकन में गिरावट (Declining Enrolment): रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्कूलों में नामांकन 2005 के 71% से गिरकर 2024-25 में 49.24% पर आ गया है।
  • निजी स्कूलों में वृद्धि: सरकारी स्कूलों की गिरावट के मुकाबले निजी स्कूलों का दबदबा बढ़ा है, जो अब माध्यमिक स्कूलों का 44.01% हैं।
  • ड्रॉपआउट का संकट: प्राथमिक स्तर पर लगभग 90% नामांकन के बावजूद, उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) स्तर पर Gross Enrolment Ratio (GER) घटकर 58.4% रह जाता है।
  • सीखने के परिणामों में सुधार (Learning Outcomes): महामारी के बाद मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता (Foundational Literacy and Numeracy – FLN) में सुधार के शुरुआती संकेत मिले हैं, जिसे निपुण भारत और समग्र शिक्षा अभियान का समर्थन प्राप्त है।
  • बुनियादी ढांचे में सुधार: बिजली, कार्यात्मक स्वच्छता सुविधाओं और डिजिटल शिक्षा (कंप्यूटर और इंटरनेट) में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

प्रमुख चुनौतियां:

  •  खंडित स्कूली संरचना (Fragmented Structure): भारत में स्कूलों का वितरण ‘पिरामिड’ जैसा है। 7.3 लाख प्राथमिक स्कूल हैं, लेकिन माध्यमिक स्तर तक आते-आते यह संख्या केवल 1.42 लाख रह जाती है। यह निरंतरता की कमी छात्रों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का सबसे बड़ा कारण है।
  • सरकारी नामांकन में भारी गिरावट: 2005 में सरकारी स्कूलों में नामांकन 71% था, जो 2024-25 में गिरकर 49.24% रह गया है। यह सरकारी तंत्र की गुणवत्ता पर जनता के घटते भरोसे का सूचक है।
  • प्रतिधारण दर (Retention Rate) का संकट: प्राथमिक स्तर पर नामांकन लगभग 90% है, लेकिन उच्च माध्यमिक (कक्षा 11-12) तक पहुँचते-पहुँचते Gross Enrolment Ratio (GER) गिरकर 58.4% रह जाता है।
  • लर्निंग पॉवर्टी (Learning Poverty): ASER 2024 के अनुसार, कक्षा 8 के 71.1% छात्र ही कक्षा 2 का पाठ पढ़ पा रहे हैं (जो 2014 में 74.7% था)। गणित में केवल 45.8% छात्र ही भाग (Division) के सवाल हल कर पा रहे हैं।
  • एकल-शिक्षक विद्यालय (Single-Teacher Schools): भारत में 1 लाख से अधिक स्कूल (कुल स्कूलों का 7%) ऐसे हैं जहाँ केवल एक शिक्षक पूरी संस्था चला रहा है। इससे शिक्षण की गुणवत्ता और प्रशासनिक कार्य दोनों प्रभावित होते हैं।
  • बुनियादी ढांचे में असमानता: आज भी 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है, 14,500 में पीने का पानी नहीं है और लगभग 98,592 स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय की सुविधा नहीं है।
  • STEM लैब का अभाव: सरकारी माध्यमिक स्कूलों में से केवल 51.7% के पास ही विज्ञान प्रयोगशालाएं (Labs) हैं, जिससे ‘इनक्वायरी-आधारित लर्निंग’ संभव नहीं हो पा रही है।
  • डिजिटल खाई (Digital Divide): यद्यपि इंटरनेट की पहुँच 8 गुना बढ़ी है (63.5%), लेकिन ग्रामीण स्कूलों में अभी भी हार्डवेयर और स्थिर कनेक्टिविटी की भारी कमी है।
  • प्रारंभिक बचपन देखभाल (ECCE) में कमी: आंगनवाड़ी और प्राथमिक स्कूलों के बीच समन्वय की कमी के कारण बच्चों की ‘स्कूल-रेडीनेस’ कमजोर रह जाती है।
  • व्यावसायिक शिक्षा का सामाजिक कलंक: व्यावसायिक विषयों को ‘कमजोर छात्रों के विकल्प’ के रूप में देखा जाता है, जिससे कौशल विकास (Skill Integration) में बाधा आती है।
  • शून्य नामांकन वाले स्कूल (Zero Enrolment Schools): देश में लगभग 7,993 स्कूल ऐसे हैं जहाँ एक भी छात्र नहीं है, फिर भी वहां संसाधन और फंड जा रहे हैं। [3, 4, 5, 6, 7, 8]

भविष्य का रोडमैप – 13 व्यापक सिफारिशें:

  • समग्र स्कूल (Composite Schools): ‘पिरामिड’ मॉडल को बदलकर ‘सिलिंड्रिकल’ मॉडल अपनाना, यानी एक ही छत के नीचे कक्षा 1 से 12 तक की शिक्षा प्रदान करना ताकि छात्र ड्रॉपआउट न करें।
  • तर्कसंगत स्कूल विलय (Rationalisation): कम नामांकन वाले स्कूलों का वैज्ञानिक आधार पर विलय करना ताकि शिक्षकों और प्रयोगशालाओं का अधिकतम उपयोग हो सके।
  • स्वतंत्र नियामक (SSSA): प्रत्येक राज्य में ‘स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी’ का गठन करना जो सुरक्षा और गुणवत्ता की निगरानी करे।
  • राज्य और जिला टास्क फोर्स: ‘होल-ऑफ-सोसाइटी’ दृष्टिकोण अपनाते हुए गुणवत्ता के लिए विशिष्ट टास्क फोर्स बनाना।
  • पारदर्शी शिक्षक प्रबंधन: शिक्षकों की भर्ती और पदोन्नति के लिए डेटा-आधारित पारदर्शी प्रणाली विकसित करना और संविदात्मक नियुक्तियों पर निर्भरता कम करना।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): पीएम ई-विद्या और भारतनेट जैसी योजनाओं का विलय कर एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना।
  • SMC का सुदृढ़ीकरण: स्कूल प्रबंधन समितियों को जवाबदेह बनाना और स्थानीय समुदाय को बजट प्रबंधन में शामिल करना।
  • समावेशी शिक्षा: दिव्यांग (CwSN) और प्रवासी बच्चों के लिए विशेष सहायता और ‘रैंप-टू-टॉयलेट’ जैसी सार्वभौमिक सुलभता सुनिश्चित करना। 
  • FLN पर मिशन मोड फोकस: कक्षा 3 तक के बच्चों के लिए ‘निपुण भारत’ के लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से प्राप्त करना।
  • योग्यता-आधारित मूल्यांकन: रटने की प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए ‘परख’ (PARAKH) के माध्यम से वास्तविक कौशल और समझ का आकलन करना।
  • एआई (AI) का एकीकरण: व्यक्तिगत सीखने (Personalised Learning) के लिए एआई टूल्स का उपयोग करना, साथ ही इसके नैतिक उपयोग के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना।
  • व्यावसायिक शिक्षा का मुख्यधाराकरण: कक्षा 6 से कौशल विकास और स्थानीय बाजार से जुड़ाव (Local Internships) अनिवार्य करना।
  • छात्र कल्याण और मानसिक स्वास्थ्य: परीक्षा-केंद्रित दबाव को कम करने के लिए सामाजिक-भावात्मक शिक्षण (Socio-emotional Learning) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना।

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