वन केस वन डेटा पहल

संदर्भ:
हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने भारतीय न्यायपालिका में डिजिटल केस प्रबंधन को एकीकृत और सुव्यवस्थित करने के लिए वन केस वन डेटा पहल की शुरुआत की।
वन केस वन डेटा पहल क्या हैं?
‘One Case One Data’ देश की संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय केस प्रबंधन डेटाबेस प्रणाली (Unified National Case Management Database System) है। यह देश की सबसे निचली अदालत से लेकर शीर्ष अदालत तक, प्रत्येक मुकदमे को एक केंद्रीय डिजिटल पहचान के अंतर्गत जोड़ने का तकनीकी ढांचा है।
- इस तकनीकी परियोजना को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री (Supreme Court Registry) और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा संयुक्त रूप से डिज़ाइन और विकसित किया गया है।
उद्देश्य:
- डेटा विखंडन को समाप्त करना: वर्तमान में अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के अलग-अलग डेटाबेस होने से उत्पन्न होने वाली विसंगतियों को मिटाना।
- केस प्रबंधन का सरलीकरण: मुकदमों के अपीलीय चक्र (Appellate Cycle) के दौरान फाइलों और केस रिकॉर्ड के हस्तांतरण को त्वरित और निर्बाध बनाना।
- तकनीक-संचालित त्वरित न्याय: डेटा सत्यापन और केस ट्रैकिंग में होने वाली प्रशासनिक देरी को स्वचालित प्रणाली के जरिए न्यूनतम करना।
- पारदर्शिता बढ़ाना: सभी न्यायिक स्तरों के बीच केस से जुड़े तथ्यों का पारदर्शी आदान-प्रदान और वास्तविक समय (Real-time) पर निगरानी सुनिश्चित करना।
मुख्य विशेषताएं:
- मल्टी-लेवल डिजिटल लिंकेज: यह प्रणाली देश के सर्वोच्च न्यायालय, सभी 25 उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों और अत्यंत दूरस्थ तालुका न्यायालयों (Taluka Courts) के डेटा को एक साझा प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करती है।
- स्वचालित डेटा पुनर्प्राप्ति (Automated Data Retrieval): विभिन्न अदालतों के बीच मुकदमों की पुरानी केस हिस्ट्री, पिछली सुनवाइयों के आदेश और साक्ष्यों के ऑनलाइन सत्यापन की प्रक्रिया पूरी तरह स्वचालित होगी।
- पारस्परिक पहुंच (Reciprocal Access): इसके तहत सभी हितधारकों को डेटा ग्रिड तक संतुलित पहुंच दी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय देश की किसी भी निचली अदालत के केस का लाइव विवरण देख सकेगा, और इसी तरह उच्च न्यायालयों को भी परस्पर एक्सेस प्राप्त होगा।
- ‘Su Sahay’ एआई पूरक: सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर एकीकृत यह चैटबॉट आम नागरिकों और वकीलों को अदालती जटिलताओं, फाइलिंग नियमों और केस स्टेटस को आसान संवाद शैली में समझाने का कार्य करता है।
कार्यप्रणाली:
- यूनिक आईडी जनरेशन: जैसे ही देश की किसी भी अदालत में कोई मुकदमा या एफआईआर से संबंधित दस्तावेज दर्ज होगा, इस प्रणाली के तहत उसे एक विशिष्ट और स्थायी डिजिटल पहचान संख्या आवंटित हो जाएगी।
- सिंगल डिजिटल ट्रेल: जब वह केस निचली अदालत से जिला कोर्ट, फिर हाई कोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा, तो हर स्तर पर नए सिरे से पेपर फाइलिंग या डेटा प्रविष्टि की आवश्यकता नहीं होगी।
- रीयल-टाइम सिंक्रोनाइजेशन: किसी भी एक अदालत स्तर पर दर्ज की गई प्रविष्टि या आदेश तुरंत केंद्रीय सर्वर पर अपडेट हो जाएगा, जिससे मुकदमे का पूरा ‘डिजिटल ट्रेल’ (Digital Trail) लाइव रहेगा।
महत्व:
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संवैधानिक अधिकारों का सुदृढ़ीकरण |
यह नागरिकों को त्वरित और बाधारहित न्याय सुनिश्चित कर अनुच्छेद 21 (त्वरित न्याय का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के सिद्धांतों को व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। |
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ई-कोर्ट्स चरण-3 (e-Courts Phase III) का संरेखण |
यह पहल भारत सरकार के e-Courts परियोजना के तीसरे चरण के मूल दर्शन के अनुकूल है, जिसका मुख्य लक्ष्य न्यायपालिका को पूरी तरह कागज रहित (Paperless) और नागरिक-केंद्रित बनाना है। |
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लंबित मामलों (Pendency) पर नियंत्रण |
प्रशासनिक स्तर पर फाइलों के भौतिक आदान-प्रदान में लगने वाले महीनों का समय अब शून्य हो जाएगा, जिससे देश में लंबित 5 करोड़ से अधिक मुकदमों के निस्तारण में गति आएगी। |
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विचाराधीन कैदियों (Under-trials) को राहत |
एकीकृत डेटा होने से उन कैदियों की पहचान और जमानत प्रक्रियाओं को आसान बनाया जा सकेगा जो केवल समन्वय की कमी के कारण जेलों में बंद हैं। |