भारत के परमाणु ऊर्जा विजन पर TERI रिपोर्ट

संदर्भ:
हाल ही में द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) ने “India’s Nuclear Energy Vision: Strategic Pathways for SMR Deployment” नामक रिपोर्ट जारी की। जिसमें भारत के वर्ष 2047 (विकसित भारत लक्ष्य) तक 100 गीगावॉट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के विजन का व्यापक रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।
वर्तमान स्थिति और लक्ष्य:
- मौजूदा क्षमता: वर्तमान में भारत 7 साइटों पर 25 परमाणु रिएक्टरों का संचालन कर रहा है, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.8 GW है। यह देश की कुल बिजली उत्पादन में लगभग 3% का योगदान देती है।
- मध्यम अवधि का लक्ष्य: निर्माणाधीन और स्वीकृत परियोजनाओं के माध्यम से इसे वर्ष 2031-32 तक बढ़ाकर 22 GW करने का लक्ष्य है।
- दीर्घकालिक विजन (2047): वर्ष 2047 तक क्षमता को बढ़ाकर 100 GW तक पहुंचाना, जो भारत के 2070 नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य के लिए अनिवार्य है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
1. SMR (स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर) की तीव्र तैनाती
- हाइब्रिड मॉडल: बेस-लोड पावर ग्रिड स्थिरता के लिए बड़े पारंपरिक ‘प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स’ (PHWRs) और ‘हार्ड-टू-एबेट’ उद्योगों (जैसे स्टील, सीमेंट, डेटा सेंटर) के लिए SMRs का एक साथ उपयोग किया जाना चाहिए।
- SMR के लाभ: ये अधिकतम 300 मेगावॉट (MWe) क्षमता वाले छोटे रिएक्टर होते हैं। ये फैक्ट्रियों में निर्मित होने के कारण जल्दी असेंबल होते हैं, इनकी लागत कम होती है और इनमें उन्नत सुरक्षा प्रणालियाँ होती हैं।
2. विशाल पूंजी जुटाना (Financial Mobilization)
- 100 GW का महत्वाकांक्षी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भारत को लगभग ₹23 लाख करोड़ से ₹25 लाख करोड़ के भारी-भरकम पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होगी।
- इसके समाधान के लिए परमाणु क्षेत्र को ‘ग्रीन फाइनेंसिंग’ और ‘सस्टेनेबल टैक्सोनॉमी’ के दायरे में शामिल करने की सिफारिश की गई है।
3. विधायी और नियामक सुधार (Regulatory Reforms)
- पारंपरिक रूप से बड़े रिएक्टरों के लिए बने पुराने परमाणु नियमों को SMR और निजी क्षेत्र के अनुकूल बनाना होगा।
- केंद्रीय बजट में घोषित आरएंडडी मिशन और शांति अधिनियम, 2025 (SHANTI Act) जैसी नीतिगत पहलों के माध्यम से ‘परमाणु ऊर्जा अधिनियम’ और ‘नागरिक परमाणु दायित्व अधिनियम’ में आवश्यक संशोधन कर निजी निवेश के रास्ते आसान किए जा रहे हैं।
भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियां:
- ईंधन सुरक्षा: भारत वैश्विक उत्पादन का केवल 1-2% (लगभग 600 टन सालाना) यूरेनियम उत्पादित करता है। अतः भारत अंतरराष्ट्रीय आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
- कुशल कार्यबल की कमी: 100 GW क्षमता के संचालन के लिए देश को 1.2 लाख से 2 लाख कुशल तकनीकी कर्मियों की जरूरत होगी, जो वर्तमान बुनियादी ढांचे में एक बड़ी कमी है।
- सार्वजनिक स्वीकृति और धारणा: ऐतिहासिक परमाणु दुर्घटनाओं (जैसे फुकुशिमा, चेरनोबिल) के कारण स्थानीय स्तर पर विकिरण का डर और भूमि अधिग्रहण के प्रति विरोध एक बड़ी चुनौती है।
- वित्तीय और तकनीकी जोखिम: परमाणु परियोजनाओं की लंबी गर्भावधि (Gestation Period) और उच्च प्रारंभिक पूंजीगत लागत निजी कंपनियों के लिए वित्तीय जोखिम बढ़ाती है।
आगे की राह:
- थ्री-स्टेज परमाणु कार्यक्रम का सुदृढ़ीकरण: यूरेनियम की कमी से निपटने के लिए भारत को अपने पारंपरिक तीन-चरण वाले परमाणु कार्यक्रम (विशेषकर थोरियम-आधारित चरण) पर ध्यान केंद्रित रखना होगा। कलपक्कम में प्रोटाटाईप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का क्रिटिकल चरण हासिल करना इस दिशा में एक बड़ा कदम है।
- ‘न्यूक्लियर मित्र’ स्किलिंग कार्यक्रम: कार्यबल की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने होंगे।
- सार्वजनिक आउटरीच: परमाणु सुरक्षा और इसके कम कार्बन फायदों को लेकर स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाकर जन-विश्वास जीतना होगा।