सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति

संदर्भ:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए पांच नए नामों की सिफारिश की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने मई 2026 में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया। कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों में चार विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं:
- न्यायमूर्ति शील नागू (Justice Sheel Nagu): वर्तमान में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (मूल हाई कोर्ट: मध्य प्रदेश)।
- न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (Justice Shree Chandrashekhar): वर्तमान में बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (मूल हाई कोर्ट: झारखंड)।
- न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा (Justice Sanjeev Sachdeva): वर्तमान में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (मूल हाई कोर्ट: दिल्ली)।
- न्यायमूर्ति अरुण पल्ली (Justice Arun Palli): वर्तमान में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (मूल हाई कोर्ट: पंजाब और हरियाणा)।
- वरिष्ठ अधिवक्ता वी. मोहना (Senior Advocate V. Mohana): सुप्रीम कोर्ट बार से सीधे पदोन्नत होने वाली भारत की दूसरी महिला जज बनने की राह पर (जस्टिस इंदु मल्होत्रा के बाद)।
सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया:
भारत में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की नियुक्ति बहु-स्तरीय है, जो मुख्य रूप से कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) और प्रक्रिया के ज्ञापन (Memorandum of Procedure – MoP) पर आधारित है।
1. संवैधानिक आधार और योग्यताएँ:
संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार, राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के बाद, जिन्हें वह आवश्यक समझे, जजों की नियुक्ति करते हैं। न्यायाधीश बनने के लिए किसी भी व्यक्ति में निम्नलिखित अर्हताएँ होनी अनिवार्य हैं:
- वह भारत का नागरिक हो।
- वह किसी एक या अधिक उच्च न्यायालयों (High Courts) में लगातार कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो।
- या उसने किसी उच्च न्यायालय में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक वकालत (Advocate) की हो।
- या वह राष्ट्रपति की राय में एक पारंगत या प्रतिष्ठित न्यायविद् (Distinguished Jurist) हो।
2. कॉलेजियम प्रणाली:
सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की वास्तविक शक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पास होती है। इस कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के 4 अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। यह प्रणाली तीन ऐतिहासिक न्यायिक मामलों (‘थ्री जजेस केसेज’) के माध्यम से विकसित हुई है, जिसके तहत न्यायपालिका ने नियुक्तियों में अपने ‘परामर्श’ को ‘बाध्यकारी सहमति’ में बदल दिया।
3. चरण-दर-चरण नियुक्ति प्रक्रिया:
‘प्रक्रिया के ज्ञापन’ (MoP) के तहत जजों की नियुक्ति निम्नलिखित व्यवस्थित चरणों में पूरी होती है:
- प्रस्ताव की शुरुआत (Initiation): सुप्रीम कोर्ट में रिक्ति होने पर, नियुक्ति प्रक्रिया की शुरुआत हमेशा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा की जाती है।
- कॉलेजियम की बैठक और विमर्श: CJI अपने चार वरिष्ठतम सहयोगियों के साथ बैठक करते हैं। उपयुक्त उम्मीदवारों (हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों, वरिष्ठ जजों या बार के वकीलों) के नामों पर विचार किया जाता है।
- सहमति और लिखित सिफारिश: कॉलेजियम के सभी सदस्यों की राय लिखित रूप में दर्ज की जाती है। यदि कोई वरिष्ठ न्यायाधीश छूट रहा हो, तो उसका कारण भी दर्ज किया जाता है। इसके बाद अंतिम प्रस्ताव सरकार को भेजा जाता है।
- कार्यपालिका की भूमिका (Executive Review): कॉलेजियम की सिफारिश सबसे पहले केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री (Union Minister of Law and Justice) के पास पहुंचती है। कानून मंत्रालय खुफिया ब्यूरो (Intelligence Bureau – IB) के माध्यम से उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और सत्यनिष्ठा की जांच करवाता है।
- प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की मंजूरी: कानून मंत्री इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं। प्रधानमंत्री की सलाह पर इसे अंतिम स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
- अधिसूचना और शपथ: राष्ट्रपति के हस्ताक्षर (Warrant under his hand and seal) के बाद न्याय विभाग द्वारा आधिकारिक राजपत्र (Gazette Notification) जारी किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति नए जज को पद की गोपनीयता और संविधान की शपथ दिलाते हैं।
4. कार्यपालिका की पुनर्विचार की शक्ति:
प्रक्रिया के तहत यदि सरकार को किसी नाम पर आपत्ति है, तो वह फाइल को पुनर्विचार (Reconsideration) के लिए कॉलेजियम के पास वापस भेज सकती है। हालाँकि, यदि कॉलेजियम सर्वसम्मति से उसी नाम को दोबारा (Reiterate) सरकार के पास भेज देता है, तो स्थापित नियमों के अनुसार सरकार उस नाम को मंजूरी देने के लिए बाध्य होती है।