प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (Economic Advisory Council to the Prime Minister)
संदर्भ:
हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के आगामी परिसीमन पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसे परिषद की सदस्य डॉ. शमिका रवि और भारतीय सांख्यिकीय संस्थान (ISI) के मुदित कपूर द्वारा तैयार किया गया।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद:
- प्रकृति (Nature): यह एक स्वतंत्र, गैर-संवैधानिक (Non-Constitutional) और गैर-सांविधिक निकाय है, जिसका कोई निश्चित कानूनी या संवैधानिक ढांचा नहीं है।
- प्राथमिक उद्देश्य (Primary Objective): इसका मुख्य उद्देश्य भारत सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री को आर्थिक नीति और उससे जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर निष्पक्ष सलाह देना है।
- नोडल एजेंसी (Nodal Agency): इसके प्रशासनिक, बजटीय, नियोजन और लॉजिस्टिक्स संबंधी कार्यों के प्रबंधन के लिए नीति आयोग (NITI Aayog) नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
- वर्तमान संरचना (Current Composition): इसमें एक अध्यक्ष (वर्तमान में प्रो. एस. महेंद्र देव), 3 पूर्णकालिक सदस्य (जैसे डॉ. शमिका रवि, संजीव सान्याल) और 11 अंशकालिक सदस्य शामिल हैं।
- सदस्यों की योग्यता (Qualifications): इसके सदस्य अर्थशास्त्र, सार्वजनिक नीति, उद्योग और वित्त जगत के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ होते हैं।
- कार्यकाल (Tenure): यह एक अस्थायी निकाय है जिसका कार्यकाल प्रधानमंत्री के विवेक और कार्यकाल पर निर्भर करता है। सरकार बदलने या आवश्यकतानुसार इसका पुनर्गठन होता रहता है।
- संबोधन के तरीके (Modus Operandi): यह परिषद दो तरीकों से काम करती है—या तो प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए मामलों (Reference) पर सलाह देती है, या फिर स्वयं संज्ञान (Suo-motu) लेकर रिपोर्ट तैयार करती है।
- प्रमुख कार्य (Key Functions): यह व्यापक आर्थिक महत्व (Macroeconomic importance) के मुद्दों जैसे मुद्रास्फीति (Inflation), औद्योगिक उत्पादन और सूक्ष्म वित्त का गहन विश्लेषण करती है।
- प्रकाशन व रिपोर्ट (Publications): यह परिषद समय-समय पर वार्षिक आर्थिक परिदृश्य (Annual Economic Outlook), नीतिगत समीक्षाएं और जनसांख्यिकी या नीति से जुड़े महत्वपूर्ण वर्किंग पेपर्स (Working Papers) जारी करती है।
- सलाह की बाध्यता (Advisory Status): इसकी भूमिका पूरी तरह से सलाहकार (Strictly Advisory) है। इसके द्वारा दी गई सिफारिशें या सुझाव सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Not Binding) नहीं होते हैं।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष और सिफारिशें:
- टारगेटेड परिसीमन (Targeted Delimitation): परिषद ने देश की सभी सीटों पर एक समान नियम (Uniform Rule) लागू करने के बजाय एक “Multi-factor Targeted Criterion” (बहु-कारक लक्षित मानदंड) अपनाने का सुझाव दिया है। परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्र के आकार या जनसंख्या पर आधारित न होकर उसके जनसांख्यिकीय और भाषाई प्रोफाइल पर आधारित होना चाहिए।
- लोकसभा सीटों का विस्तार (Expansion of Lok Sabha Seats): वर्तमान में 543 निर्वाचित लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 824 करने का प्रस्ताव है। इसके लिए देश के सबसे बड़े और अधिक मतदाता संख्या वाले 170 निर्वाचन क्षेत्रों को विभाजित (Split) करने की सिफारिश की गई है।
- सीटों के विभाजन का फॉर्मूला (Formula for Seat Splitting): मॉडल के अनुसार, 59 निर्वाचन क्षेत्रों को दो भागों में (Two-way split) और 111 निर्वाचन क्षेत्रों को तीन भागों में (Three-way split) विभाजित किया जाना चाहिए।
- वोटर टर्नआउट में वृद्धि (Maximising Voter Turnout): इस लक्षित योजना के माध्यम से अगले आम चुनाव में राष्ट्रीय मतदाता मतदान (Voter Turnout) में 0.3 से 2.3 प्रतिशत अंकों की वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे लगभग 9 से 23 मिलियन अतिरिक्त मतदाता मतदान कर सकेंगे।
- समानुपातिक वृद्धि (Proportionate Expansion): यह मॉडल सभी बड़े राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में लगभग 54-55% की समान वृद्धि सुनिश्चित करता है, जिससे राज्यों का मौजूदा अनुपात (Proportion) बरकरार रहेगा। [2, 7]
- सीटों का तुलनात्मक परिदृश्य (State-wise Representation):
- उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh): सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी।
- तमिलनाडु (Tamil Nadu): सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी।
- केरल (Kerala): सीटें 20 से बढ़कर 30 हो जाएंगी।
- बिहार (Bihar): सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी।
- क्षेत्रीय हिस्सेदारी की स्थिरता (Regional Share Stability): इस फॉर्मूले से लोकसभा में दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी वर्तमान के 23.6% से बदलकर 23.7% होगी, जबकि उत्तर और पश्चिमी राज्यों की हिस्सेदारी 45.2% से मामूली बढ़कर 45.6% होगी। इससे Cooperative Federalism (सहकारी संघवाद) को ठेस नहीं पहुंचेगी।
- मतदान व्यवहार: शोध पत्र में 2009 से 2024 के चुनावी डेटा का विश्लेषण कर Voter Turnout और निर्वाचन क्षेत्र की Compositional Features (संरचनात्मक विशेषताओं) के बीच पांच प्रमुख संबंध स्थापित किए गए हैं:
- शहरीकरण का प्रभाव (Urban Share): बड़े और पूरी तरह से शहरी महानगरीय क्षेत्रों (Metropolitan Constituencies) में मतदान दर सबसे कम देखी गई है।
- महिला मतदाता भागीदारी (Female Voter Turnout): महानगरीय क्षेत्रों की कामकाजी महिलाओं में मतदान के प्रति उदासीनता अधिक है, जबकि ग्रामीण और उच्च अनुसूचित जनजाति (High-ST Share) वाले क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक है।
- भाषाई विविधता (Linguistic Diversity & Polarisation): भाषाई रूप से मिश्रित (Linguistically mixed) क्षेत्रों में मतदान की प्रवृत्ति अधिक पाई गई है।
- समान बूथ युक्तिकरण (Booth Rationalisation): परिषद ने परिसीमन अभ्यास को 2027 की जनगणना (Census 2027) के प्रकाशन और नए ‘बूथ रेशनलाइजेशन चक्र’ के साथ संरेखित करने की सिफारिश की है।
- सिफारिशें: इसके लिए कुछ जमीनी नीतिगत सुधार (Policy Interventions) आवश्यक हैं:
- महिला-विशेष मतदान केंद्र (Women-only Polling Booths): शहरी क्षेत्रों में महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए विशेष बूथ बनाए जाएं।
- मतदान के समय का विस्तार (Evening Polling Hours): कामकाजी शहरी महिलाओं की समय की कमी को देखते हुए मतदान का समय शाम तक बढ़ाया जाए।
- परिवहन लिंकेज (Transport Infrastructure): शहरी बाहरी इलाकों (Fringes) से मतदान केंद्रों तक बेहतर परिवहन पहुंच प्रदान की जाए।
- स्थानीय नेटवर्क का उपयोग: मतदाता सूची (Voter Rolls) को अद्यतन करने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जाए।
मुख्य बिंदु:
- अनुच्छेद 82 (Article 82) और अनुच्छेद 170 (Article 170): इसके तहत प्रत्येक जनगणना के बाद क्रमशः लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन का प्रावधान है।
- सीटों का फ्रीज (Freeze on Seats):42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा सीटों के पुनर्गठन को वर्ष 2000 तक के लिए फ्रीज किया गया था, जिसे बाद में 84वें संशोधन अधिनियम (2001) द्वारा वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था।
- वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना (जो कि अब 2027 में अपेक्षित है) के आंकड़ों के आधार पर ही अगला परिसीमन किया जाएगा।
FAQs:
1. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद क्या है?
यह प्रधानमंत्री को आर्थिक और नीतिगत मुद्दों पर निष्पक्ष सलाह देने वाला एक स्वतंत्र, गैर-सांविधिक विशेषज्ञ निकाय है।
2. EAC-PM की भूमिका क्या है?
यह व्यापक आर्थिक रुझानों का विश्लेषण करती है, रिपोर्ट बनाती है और प्रधानमंत्री द्वारा सौंपे गए आर्थिक मामलों पर सुझाव देती है।
3. इसके अध्यक्ष कौन होते हैं?
वर्तमान में इसके अध्यक्ष विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर एस. महेंद्र देव हैं, जिन्होंने डॉ. बिबेक देबरॉय के बाद यह पद संभाला है।
4. यह सरकार को कैसे सलाह देती है?
यह परिषद या तो स्वयं संज्ञान (Suo-motu) लेकर या प्रधानमंत्री के संदर्भ (Reference) पर नीतिगत वर्किंग पेपर्स और रिपोर्ट सौंपकर सलाह देती है।
5. भारतीय अर्थव्यवस्था में इसकी क्या भूमिका है?
यह सरकार को मुद्रास्फीति, कृषि, वित्तीय नीतियों और हालिया लोकसभा परिसीमन जैसे जटिल मुद्दों पर साक्ष्य-आधारित नीतिगत ब्लूप्रिंट प्रदान करती है।
