मोहन जोदड़ो की प्रसिद्ध डांसिंग गर्ल
संदर्भ:
हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई कला शिक्षा पाठ्यपुस्तक ‘मधुरिमा’ के पहले अध्याय में मोहन जोदड़ो की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा की छवि को डिजिटल रूप से संशोधित (Altered) करके प्रस्तुत किया गया।
- इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कला विशेषज्ञों द्वारा इसे ‘इतिहास के साथ छेड़छाड़’ और ‘अनावश्यक सेंसरशिप’ बताए जाने के बाद, NCERT ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए इसके डिजिटल और आगामी प्रिंटेड संस्करणों में मूल प्रतिमा की तस्वीर को पुनः बहाल करने का निर्णय लिया।
पुरातात्विक एवं प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ के बारे में:
- खोज का स्थान: इस बहुमूल्य प्रतिमा की खोज ब्रिटिश पुरातत्वविद अर्नेस्ट मैके ने वर्ष 1926 में सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के प्रमुख स्थल मोहन जोदड़ो (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में) के एक घर से की थी।
- लगभग 4500 वर्ष पुरानी यह कांस्य प्रतिमा प्राचीन भारतीय इतिहास, धातु विज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता का एक जीवंत दस्तावेज है।
- विभाजन का इतिहास: 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय पुरातात्विक वस्तुओं के बंटवारे के तहत, ‘प्रिस्ट-किंग’ (पुरोहित राजा) की मूर्ति पाकिस्तान को मिली, जबकि प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ भारत के हिस्से आई।
- वर्तमान स्थिति: यह मूर्ति वर्तमान में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) में सुरक्षित रखी हुई हैं।
- माप और माध्यम: यह पूरी तरह से कांस्य (Bronze) से बनी एक छोटी मूर्ति है, जिसकी ऊंचाई मात्र 10.5 सेंटीमीटर (लगभग 4.1 इंच) है।
- शारीरिक मुद्रा (Posture):
- प्रतिमा में लड़की एक अत्यंत आत्मविश्वासपूर्ण और स्वाभाविक त्रिभंग मुद्रा (खड़े होने की त्रि-कोणीय शैली) में दिखाई देती है।
- उसका दाहिना हाथ उसकी कमर पर टिका है और बायां हाथ नीचे की ओर लटका हुआ है, जिसमें उसने एक छोटा बर्तन या कटोरा पकड़ा हुआ है।
- उसकी गर्दन थोड़ी पीछे की ओर झुकी हुई है और घुटने आगे की ओर मुड़े हुए हैं, जो नृत्य की प्रारंभिक अवस्था का संकेत देते हैं।
- आभूषण: यह प्रतिमा आभूषणों से सुसज्जित है।
- उसने अपनी बाईं बांह में लगभग 25 चूड़ियाँ और दाहिनी बांह में केवल 4 चूड़ियाँ/कंगन पहने हुए हैं। इसके अलावा, उसने गले में कौड़ी जैसा दिखने वाला एक पेंडेंट (हार) पहना हुआ है।
- लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग (मधूच्छिष्ट विधि): इस Bronze Sculpture का निर्माण ‘लॉस्ट-वैक्स’ (Lost-Wax Casting) तकनीक से किया गया था।
- इसमें पहले मोम की मूर्ति बनाई जाती थी, उस पर मिट्टी का लेप लगाकर सुखाया जाता था, फिर गर्म करके मोम निकाल लिया जाता था और उस खोखले सांचे में पिघला हुआ कांसा भरा जाता था।
- यह तकनीक दर्शाती है कि हड़प्पावासी धातुओं के सम्मिश्रण (तांबा और टिन मिलाकर कांसा बनाना) और धातु ढलाई के विज्ञान में अत्यधिक निपुण थे।
- नामकरण पर विवाद: अमेरिकी पुरातत्वविद जोनाथन केनोयर के अनुसार, औपनिवेशिक काल के ब्रिटिश अधिकारियों (जैसे जॉन मार्शल) ने समकालीन ‘नौच गर्ल्स’ (नर्तकियों) को देखकर इसका नाम ‘डांसिंग गर्ल’ रख दिया, जबकि यह किसी ऐसी महिला की भी हो सकती है जो वेदी पर कोई भेंट या अर्पण ले जा रही हो।
- सांस्कृतिक कूटनीति: मई 2023 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय एक्सपो के आधिकारिक शुभंकर (Mascot) के रूप में ‘डांसिंग गर्ल’ के आधुनिक चन्नापटना कला संस्करण को चुना गया था, जो भारत की निरंतर नारी शक्ति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
FAQs:
Q1. डांसिंग गर्ल क्या है?
Ans. यह सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ तकनीक से निर्मित 10.5 सेमी ऊंची कांसे की एक विश्व प्रसिद्ध नर्तकी प्रतिमा है।
Q2. यह मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई थी?
Ans. यह ऐतिहासिक प्रतिमा वर्ष 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद अर्नेस्ट मैके द्वारा मोहन जोदड़ो (वर्तमान पाकिस्तान) नामक प्राचीन नगर से खोजी गई थी।
Q3. इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
Ans. यह प्रतिमा 4500 वर्ष पूर्व की हड़प्पा सभ्यता के उन्नत धातु विज्ञान, सम्मिश्रण कला और उनके उच्च स्तरीय सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण को प्रमाणित करती है।
Q4. यह किस सभ्यता से संबंधित है?
Ans. यह प्रतिमा कांस्य युगीन सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा संस्कृति) से संबंधित है, जिसका कालखंड लगभग 2500 ईसा पूर्व माना जाता है।
Q5. डांसिंग गर्ल को भारतीय इतिहास में विशेष क्यों माना जाता है?
Ans. यह प्राचीन भारत की नारी शक्ति, कलात्मक स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के बाद भारत-पाकिस्तान कला विभाजन की सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य प्रतीक है।
