बख्तरबंद वाहन Simha 4×4
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संदर्भ:
हाल ही में भौगोलिक संकेतक (GI) रजिस्ट्री द्वारा त्रिपुरा के पारंपरिक आदिवासी वाद्य यंत्र ‘त्रिपुरा सारिंदा’ (Tripura Sarinda) को भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया गया। इस नई मान्यता के साथ ही त्रिपुरा में जीआई-प्रमाणित उत्पादों की कुल संख्या बढ़कर अब 4 हो गई है।
त्रिपुरा सारिंदा के बारे में (About Tripura Sarinda):
- परिचय: ‘Tripura Sarinda’ राज्य के मूल आदिवासी समुदायों की लोक संगीत परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा है। यह एक उत्कृष्ट और अनूठा ‘Indigenous Instrument’ है।
- संरचना: यह एक ‘Handcrafted Instrument’ है जिसे गम्हार, कुरुम या कटहल जैसी स्थानीय पेड़ों की सूखी लकड़ी के एक ही टुकड़े को अंदर से खोखला करके (Hollow Resonator) तराशा जाता है।
- इसकी बनावट नीचे से अंडाकार होती है और इसका मध्य भाग (कमर) काफी संकरा होता है। ऊपरी हिस्सा चौड़ा और खुला होता है। दिखने में इसकी आकृति कुछ हद तक मोर (Peacock) या मंडोलिन जैसी प्रतीत होती है।
- परंपरागत रूप से इसमें तीन तार होते हैं, जो पहले जानवरों की आंतों या रेशमी धागों से बनते थे, लेकिन आधुनिक समय में इसमें लोहे या पीतल के तारों का उपयोग किया जाता है। इसके ऊपरी हिस्से (Pegbox) पर पक्षियों के आकार की सुंदर नक्काशी की जाती है।
- आदिवासी विरासत: यह मुख्य रूप से त्रिपुरा के त्रिपुरी, रियांग और जमातिया जैसे स्वदेशी जनजातीय समुदायों द्वारा सदियों से बजाया जा रहा है। इसे स्थानीय भाषा में ‘सारिंदा उआख्रप’ भी कहा जाता है।
- लोक संगीत का आधार: इसका उपयोग जनजातीय कलाकारों द्वारा पारंपरिक त्योहारों, अनुष्ठानों, लोक नृत्यों (जैसे गरिया नृत्य) और धार्मिक भजनों के दौरान मुख्य संगत वाद्य यंत्र के रूप में किया जाता है।
- वादन शैली (Playing Style): सारिंदा एक ‘Bowed String Instrument’ है, जिसे एक विशेष धनुष (Bow) की सहायता से घर्षण पैदा करके बजाया जाता है। कलाकार इसे अपनी छाती से सटाकर बैठते हैं और बाएं हाथ की उंगलियों से तारों को दबाकर मधुर और तीखी ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
भौगोलिक संकेतक (GI Tag) क्या है?
- परिचय: भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) मुख्य रूप से एक प्रकार का ‘Intellectual Property’ (बौद्धिक संपदा) अधिकार है, जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से उत्पन्न होने वाले उत्पादों को दिया जाता है।
- अधिनियम: भारत में जीआई टैग प्रणाली ‘भौगोलिक उपदर्शन (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999’ के तहत संचालित होती है, जो सितंबर 2003 से प्रभावी हुआ था।
- प्रदाता संस्था: यह टैग वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कार्यरत ‘भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री’ (चेन्नई, तमिलनाडु) द्वारा प्रदान किया जाता है।
- समय सीमा: एक बार जारी होने के बाद जीआई टैग 10 वर्षों की अवधि के लिए वैध होता है। इसके बाद, इसकी सुरक्षा को अनिश्चित काल तक बनाए रखने के लिए इसे हर 10 साल में नवीनीकृत (Renew) कराना आवश्यक होता है।
- लाभ: यह अनधिकृत व्यक्तियों या अन्य राज्यों/देशों द्वारा उस नाम के दुरुपयोग और नकली उत्पादों की बिक्री के खिलाफ सख्त कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
- जीआई का दर्जा मिलने से उत्पाद की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग में तीव्र वृद्धि होती है।
- यह उत्पाद की प्रामाणिकता सुनिश्चित करता है, जिससे इसके निर्माण में लगे स्थानीय आदिवासी कारीगरों को उनके उत्पादों का सही मूल्य मिलता है और उनकी आजीविका में सुधार होता है।
त्रिपुरा के अन्य जीआई उत्पाद:
त्रिपुरा सारिंदा के अतिरिक्त राज्य के तीन अन्य महत्वपूर्ण उत्पाद जिन्हें पहले जीआई टैग मिल चुका है:
- त्रिपुरा क्वीन पाइनएप्पल: अपनी विशेष सुगंध और सुनहरे रंग के लिए प्रसिद्ध।
- त्रिपुरा रिसा: आदिवासी समुदायों का एक पारंपरिक हाथ से बुना हुआ वस्त्र।
- माताबाड़ी पेड़ा: उदयपुर के त्रिपुर सुंदरी मंदिर में चढ़ाया जाने वाला दूध आधारित प्रसिद्ध प्रसाद।
FAQs:
Q1. त्रिपुरा सारिंदा क्या है?
Ans: यह त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों का एक पारंपरिक स्वदेशी तार वाला वाद्य यंत्र है, जिसे लकड़ी के एक ही टुकड़े को खोखला करके बनाया जाता है।
Q2. इसे GI टैग क्यों मिला?
Ans: इसकी अनूठी शिल्पकला, विशिष्ट ध्वनि और त्रिपुरा की लोक सांस्कृतिक विरासत में इसके ऐतिहासिक महत्व को संरक्षित करने के लिए इसे जीआई टैग मिला।
Q3. GI टैग का क्या महत्व है?
Ans: यह उत्पाद को कानूनी संरक्षण देता है, उसकी नकल रोकता है और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रामाणिकता व ब्रांड वैल्यू को बढ़ाता है।
Q4. इससे स्थानीय कारीगरों को क्या लाभ होगा?
Ans: इससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, जिससे कारीगरों को बेहतर बाजार मूल्य मिलेगा और उनकी पारंपरिक कला व आर्थिक आजीविका को बढ़ावा मिलेगा।
Q5. GI टैग कौन प्रदान करता है?
Ans: भारत में यह टैग वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन चेन्नई में स्थित ‘भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री’ (GI Registry) द्वारा प्रदान किया जाता है।
