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विश्व का सबसे बड़ा चीनी बांध प्रोजेक्ट

विश्व का सबसे बड़ा चीनी बांध प्रोजेक्ट

China Brahmaputra Dam

संदर्भ:

हाल ही में चीन ने तिब्बत क्षेत्र में बहने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से पर विश्व का सबसे बड़ा चीनी बांध प्रोजेक्ट (China Brahmaputra Dam) आधिकारिक रूप से शुरू कर दिया है। यह नदी भारत में प्रवेश करने पर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है। 

विश्व का सबसे बड़ा चीनी बांध  (China Brahmaputra Dam) प्रोजेक्ट:

  • भौगोलिक स्थान: यह बांध तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित मेडोग (मोतुओ) काउंटी में बनाया जा रहा है. 
  • नाम: इस महा-परियोजना को ‘मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट’ भी कहा जाता है, जो चीन के वर्तमान ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से लगभग तीन गुना अधिक बिजली पैदा करने की क्षमता रखता है।
  • भारतीय सीमा से निकटता: यह निर्माण स्थल अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के भारतीय बॉर्डर से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • मुख्य नदी का मार्ग: यह बांध तिब्बत की यारलुंग सांगपो बांध परियोजना (Yarlung Tsangpo Dam) का हिस्सा है. यही नदी आगे चलकर भारत के असम और अरुणाचल प्रदेश में ‘ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra River)’ तथा बांग्लादेश में ‘जमुना’ कहलाती है.
  • निर्माणकर्ता (Implementing Body): इस विशालकाय बुनियादी ढांचे का निर्माण चीनी सरकारी ऊर्जा कंपनियों के कंसोर्टियम द्वारा किया जा रहा है. इसकी आधिकारिक आधारशिला चीनी प्रधानमंत्री ली क्यांग की उपस्थिति में रखी गई। 

प्रमुख विशेषताएं: 

  • विशाल पनबिजली परियोजना (Mega Hydropower Project): इस बांध की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 60,000 मेगावाट (60 गीगावाट) निर्धारित की गई है।
  • ऊर्जा उत्पादन का रिकॉर्ड: यह संयंत्र सालाना लगभग 300 बिलियन किलोवाट-घंटे (kWh) स्वच्छ बिजली का उत्पादन करेगा, जो विश्व रिकॉर्ड होगा।
  • परियोजना की अनुमानित लागत: इस मेगा-प्रोजेक्ट पर चीन लगभग 167 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन) खर्च कर रहा है।
  • परियोजना की रूपरेखा: इस जलविद्युत परियोजना (Hydroelectric Project) के तहत नदी की तीव्र ढलान का लाभ उठाने के लिए ‘कैस्केड’ (एक के बाद एक पांच स्टेशन) और विशाल भूमिगत सुरंगों की श्रृंखला बनाई जा रही है।

चीन के लिए इस परियोजना के लाभ:

  • कार्बन तटस्थता का लक्ष्य: यह परियोजना चीन को 2060 तक अपने स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन-न्यूट्रल लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगी।
  • तिब्बत का आर्थिक विकास: इस सुदूर और पहाड़ी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर चीन वहां औद्योगिक गतिविधियों को गति देना चाहता है।
  • राष्ट्रीय ग्रिड को आपूर्ति: उत्पादित बिजली को लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों के माध्यम से चीन के अत्यधिक आबादी वाले पूर्वी और दक्षिणी औद्योगिक शहरों में भेजा जाएगा। 

पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर इसके नुकसान:

  • अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र: यह पूरा प्रोजेक्ट हिमालय के ‘ग्रेट बेंड’ क्षेत्र में स्थित है, जो भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील (सीस्मिक जोन) है। भूकंप आने पर बांध टूटने से निचले इलाकों में भयंकर तबाही आ सकती है।
  • जैव विविधता का ह्रास: यारलुंग त्सांगपो ग्रैंड कैन्यन दुनिया की सबसे गहरी घाटियों में से एक है. बांध के विशाल जलाशय के कारण यहाँ के अद्वितीय जंगलों, दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों के आवास पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे।
  • पोषक तत्वों और गाद का रुकना: बांध के कारण नदी के साथ बहकर आने वाली उपजाऊ मिट्टी (सिल्ट) ऊपर ही रुक जाएगी। इससे निचले मैदानी इलाकों में कृषि भूमि की उर्वरता पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ेगा।

भारत की चिंताएं:

चीन का यह बांध भारत की जल सुरक्षा (Water Security) और संप्रभुता के लिए कई बड़ी चुनौतियां खड़ी करता है:

  • कृत्रिम सूखा और जल प्रवाह नियंत्रण: ऊपरी देश (अपस्ट्रीम) होने के कारण चीन के पास नदी के पानी को मोड़ने या रोकने की ताकत आ जाएगी। गैर-मानसून सीजन में वह पानी रोककर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
  • कृत्रिम बाढ़ (वॉटर बम) का खतरा: युद्ध या सैन्य तनाव की स्थिति में चीन द्वारा अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने से अरुणाचल प्रदेश और असम में अचानक विनाशकारी बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आ सकती है।
  • नदी जल विवाद (River Water Dispute): भारत और चीन के बीच पानी के बंटवारे को लेकर कोई आधिकारिक बहुपक्षीय जल संधि नहीं है। चीन द्वारा साझा किए जाने वाले हाइड्रोलॉजिकल डेटा की पारदर्शिता पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। द्विपक्षीय भारत-चीन संबंध (India China Relations) को और अधिक तनावपूर्ण बना रहा है। 

भारत सरकार द्वारा उठाए गए जवाबी कदम:

  • सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP): भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट की अपनी सबसे बड़ी जलविद्युत और बाढ़-नियंत्रण परियोजना को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। यह विशाल बांध चीन द्वारा छोड़े गए अतिरिक्त पानी को रोकने और अतिरिक्त जल भंडारण बनाए रखने में सक्षम होगा। 
  • उत्तर-पूर्व में 200 से अधिक बांध: भारत ने पूर्वोत्तर राज्यों, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश में पानी पर अपने ‘लोअर रिपेरियन राइट्स’ (निचले हिस्से के वैधानिक अधिकार) को मजबूत करने के लिए लगभग $77 बिलियन की लागत से कई बांध परियोजनाओं की योजना बनाई है।
  • सामरिक बुनियादी ढांचे का विकास: सिलीगुड़ी कॉरिडोर (‘चिकन नेक’) पर निर्भरता कम करने और सेना की त्वरित आवाजाही के लिए उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों को जोड़ने वाले विशाल रेल और सड़क नेटवर्क का निर्माण युद्धस्तर पर किया जा रहा है।

FAQs

प्र.1: ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन का बांध प्रोजेक्ट क्या है?

यह तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनने वाला 60,000 मेगावाट क्षमता का दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत बांध प्रोजेक्ट है।

प्र.2: यह बांध कहाँ बनाया जा रहा है?

यह महा-बांध दक्षिण-पूर्वी तिब्बत के मेडोग काउंटी में, भारतीय अरुणाचल प्रदेश सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर बन रहा है। 

प्र.3: भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह भारत की जल सुरक्षा, उत्तर-पूर्व में कृषि, और सीमा सुरक्षा को प्रभावित करता है, जिससे चीन को जल प्रवाह नियंत्रित करने की ताकत मिलती है। 

प्र.4: इस परियोजना का पर्यावरण पर क्या प्रभाव होगा?

इससे अत्यधिक भूकंप प्रवण क्षेत्र में खतरा बढ़ेगा, जैव विविधता नष्ट होगी और निचले इलाकों में उपजाऊ गाद का प्रवाह रुक जाएगा।

प्र.5: ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन का बांध विवाद क्यों है?

चीन बिना किसी अंतरराष्ट्रीय जल संधि या द्विपक्षीय परामर्श के एकतरफा तरीके से इस साझा अंतरराष्ट्रीय नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर रहा है। लाएगी, बटाला उद्योगों को गति देगी और स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली ‘कवच’ से लैस होगी।

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