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Indus Waters Treaty PCA- सिंधु जल संधि पर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का फैसला, भारत ने किया सिरे से खारिज 

Indus Waters Treaty PCA- सिंधु जल संधि पर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का फैसला, भारत ने किया सिरे से खारिज 

Indus Waters Treaty PCA

संदर्भ:

हाल ही में 31 अगस्त 2026 को नीदरलैंड के द हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration – PCA) द्वारा सिंधु जल संधि पर दिए गए अंतरिम आदेश और फैसले को भारत सरकार ने अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए सिरे से खारिज किया।

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty 1960) क्या हैं?

  • परिचय: सिंधु जल संधि, सिंधु नदी तंत्र की प्रमुख नदियों के जल बंटवारे पर भारत और पाकिस्तान के मध्य हुआ एक ऐतिहासिक समझौता है। 
  • हस्ताक्षर: यह ऐतिहासिक समझौता 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान और विश्व बैंक (World Bank) के प्रतिनिधित्व में हस्ताक्षरित हुआ था। 
  • पृष्ठभूमि: भारत के विभाजन के समय सीमा रेखा खींचने से सिंधु नदी तंत्र (Indus River System) का जलग्रहण क्षेत्र भारत (Upstream) और मुख्य नहरें पाकिस्तान (Downstream) में चली गईं। इस भौगोलिक गतिरोध और संभावित संघर्ष को टालने के लिए विश्व बैंक की मध्यस्थता से यह स्थायी कानूनी समझौता किया गया। 
  • प्रावधान: इस संधि के तहत सिंधु बेसिन की छह नदियों को दो हिस्सों में विभाजित किया गया: 
  • पूर्वी नदियाँ (Eastern Rivers): रावी, ब्यास और सतलज के जल पर भारत को बिना किसी प्रतिबंध के पूर्ण नियंत्रण (100% उपयोग का अधिकार) दिया गया।
  • पश्चिमी नदियाँ (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चिनाब का लगभग 80% जल पाकिस्तान के लिए आरक्षित किया गया।
  • भारत के सीमित अधिकार: भारत को पश्चिमी नदियों के जल का सीमित उपयोग करने की अनुमति दी गई है, जिसमें घरेलू उपयोग, गैर-उपभोग्य कार्य (Non-consumptive use) जैसे नौवहन, और ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (Run-of-the-river) जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण शामिल है, बशर्ते पानी का भंडारण न किया जाए।
  • विवाद निपटान तंत्र (Dispute Resolution Mechanism): संधि के सुचारू संचालन और मतभेदों को सुलझाने के लिए अनुच्छेद VIII के तहत एक द्विपक्षीय स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission – PIC) का गठन किया गया। संधि में विवाद समाधान के लिए एक स्पष्ट त्रि-स्तरीय (Three-tier) व्यवस्था का प्रावधान है:
  • चरण 1 (Questions): किसी भी तकनीकी सवाल या मुद्दे को दोनों देशों के कमिश्नरों द्वारा ‘स्थायी सिंधु आयोग’ के स्तर पर सुलझाया जाएगा।
  • चरण 2 (Differences): यदि आयोग में सहमति नहीं बनती, तो इस ‘अंतर’ को सुलझाने के लिए विश्व बैंक द्वारा एक स्वतंत्र तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) नियुक्त किया जाएगा 
  • चरण 3 (Disputes): यदि मुद्दा केवल तकनीकी न होकर संधि की कानूनी व्याख्या से जुड़ा हो, तो इसे सात सदस्यीय मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) को प्रेषित किया जाएगा।

दोनों देशों के बीच Indus Waters Treaty Dispute एवं मध्यस्थता:

  • किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाएं:
    • किशनगंगा परियोजना: झेलम की सहायक नदी (किशनगंगा) पर जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में निर्मित 330 मेगावाट की परियोजना है, जिसके डिजाइन और जल मोड़ने की प्रणाली पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई.
    • रतले जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydroelectric Project): चिनाब नदी पर किश्तवाड़ जिले में निर्माणाधीन 850 मेगावाट की रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है. पाकिस्तान का दावा है कि इन परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन संधि के मानदंडों का उल्लंघन करते हैं.
  • 2025 का पहलगाम हमला: भारत-पाकिस्तान जल विवाद (India Pakistan Water Dispute) में सबसे बड़ा नीतिगत और रणनीतिक मोड़ 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद आया। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हो गई थी, जिसके बाद भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को सर्वोपरि रखते हुए एक अभूतपूर्व दंडात्मक कदम उठाया: 
  • संधि को स्थगित करना (Abeyance): भारत ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि जब तक पाकिस्तान अपनी सीमा से प्रायोजित होने वाले सीमा पार आतंकवाद को स्थायी और अपरिवर्तनीय रूप से बंद नहीं करता, तब तक भारत सिंधु जल संधि 1960 को स्थगित (In Abeyance) रखेगा.
  • जल कूटनीति का शस्त्रीकरण: भारत का यह निर्णय ‘रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते’ की नीति का कड़ा विस्तार था, जिसने अंतरराष्ट्रीय संधियों को जमीनी वास्तविकताओं और आतंकवाद-मुक्त माहौल से जोड़ दिया.
  • स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration: PCA): पाकिस्तान ने भारत के जलविद्युत डिजाइनों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चुनौती देने के लिए एक समानांतर कानूनी रणनीति अपनाई: 
  • वर्ष 2016 में पाकिस्तान ने संधि के त्रि-स्तरीय तंत्र के क्रमिक नियमों का उल्लंघन करते हुए किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के विवाद को सीधे द हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) में ले जाने की अपील की.
  • स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) का मुख्यालय द हेग, नीदरलैंड में पीस पैलेस में स्थित है. इस विशिष्ट मामले की सुनवाई प्रोफ़ेसर शॉन डी. मर्फी (Sean D. Murphy – USA) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय न्यायाधिकरण पीठ कर रही है.
  • भारत ने इसके विपरीत विश्व बैंक से एक ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) नियुक्त करने की मांग की. इसके परिणामस्वरूप विश्व बैंक ने दोनों प्रक्रियाओं को एक साथ शुरू कर दिया, जिससे एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग मंच सक्रिय हो गए.
  • भारत ने इस न्यायाधिकरण की वैधता को अवैध मानते हुए इसके गठन के समय से ही इसकी बहसों और कार्यवाहियों का पूर्ण बहिष्कार (Boycott) किया है. 

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (PCA) के फैसले और भारत द्वारा अस्वीकृति (India Rejects PCA Ruling): 

  • जुलाई 2023 का फैसला: न्यायालय ने भारत की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए फैसला दिया था कि उसके पास पाकिस्तान की शिकायतों पर सुनवाई करने का पूर्ण विधिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) है.
  • मई 2026 का अनुपूरक फैसला: पीसीए ने भारत की परियोजनाओं की ‘मैक्सिमम पौंडेज’ (Maximum Pondage/जल भंडारण सीमा) की तकनीकी व्याख्या पर पाकिस्तान के पक्ष में आदेश जारी किया.
  • 31 अगस्त 2026 का ताजा अंतरिम आदेश (Latest Ruling): न्यायाधिकरण ने सर्वसम्मति से दो मुख्य बिंदु तय किए:
    • भारत द्वारा पहलगाम हमले के बाद संधि को ‘स्थगित’ (Abeyance) रखने का एकतरफा निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून में मान्य नहीं है और यह संधि पूरी तरह लागू और वैध बनी रहेगी।
    • अदालत ने रतले जलविद्युत परियोजना (RHEP) के बांध की दीवार की कंक्रीटिंग और पावर इनटेक संरचना के निर्माण पर एक निश्चित स्तर से ऊपर तब तक अंतरिम रोक (Prohibition) लगा दी है, जब तक कि विश्व बैंक के तटस्थ विशेषज्ञ की अंतिम रिपोर्ट (जो जुलाई 2027 में संभावित है) नहीं आ जाती। 
  • भारत द्वारा फैसले को खारिज करने के मुख्य कारण:
    • भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता ने इस फैसले को “अमान्य, शून्य और गैर-बाध्यकारी” (Null and Void) घोषित करते हुए सिरे से खारिज कर दिया है.  
  • अवैध गठन (Illegally Constituted): भारत का रुख स्पष्ट है कि सिंधु जल संधि (IWT 1960) के तहत विवादों के समाधान के लिए एक चरणबद्ध और क्रमिक (Graduated) प्रक्रिया निर्धारित है. पाकिस्तान ने तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया के समानांतर मध्यस्थता न्यायालय का गठन करवाकर संधि के प्रावधानों का घोर उल्लंघन किया है, इसलिए यह कोर्ट विधिक रूप से अवैध है.
  • संप्रभु अधिकारों का हनन: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी बाहरी या तथाकथित अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण भारत की संप्रभु सीमाओं के भीतर विकासात्मक परियोजनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर हुक्म नहीं चला सकता.
  • समानांतर कार्यवाहियों की विसंगति: एक ही तकनीकी विवाद पर तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) और मध्यस्थता न्यायालय (CoA) दोनों का एक साथ विचार करना विधिक रूप से असंगत है और भारत केवल तटस्थ विशेषज्ञ की संस्थागत प्रक्रिया को मान्यता देता है।
  • जमीनी हकीकत से अलगाव: भारत का मानना है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता आतंकवाद और शत्रुतापूर्ण क्षेत्रीय माहौल से अलग होकर काम नहीं कर सकता. जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर पूर्ण रोक नहीं लगाता, भारत अपनी जल कूटनीति के कड़े रुख पर अडिग रहेगा.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: Indus Waters Treaty क्या है?

उत्तर: यह वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ एक नदी जल साझाकरण समझौता है, जो छह नदियों के पानी का वितरण तय करता है. 

प्रश्न 2: Permanent Court of Arbitration ने Indus Waters Treaty पर क्या फैसला दिया?

उत्तर: 31 अगस्त 2026 को पीसीए ने फैसला दिया कि भारत का संधि स्थगन अमान्य है और तटस्थ विशेषज्ञ की रिपोर्ट (जुलाई 2027) आने तक रतले परियोजना के ऊंचे निर्माण पर अंतरिम रोक रहेगी.

प्रश्न 3: भारत ने PCA के फैसले को क्यों खारिज किया?

उत्तर: भारत इस न्यायाधिकरण को ‘अवैध रूप से गठित’ मानता है क्योंकि यह संधि में उल्लिखित क्रमिक विवाद तंत्र का उल्लंघन कर बनाया गया है, अतः इसका कोई कानूनी क्षेत्राधिकार नहीं है। 

प्रश्न 4: India Pakistan Indus Waters Dispute क्या है?

उत्तर: यह मुख्य रूप से भारत द्वारा पश्चिमी नदियों (झेलम-चिनाब) पर बनाई जा रही किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइनों और जल भंडारण क्षमता पर पाकिस्तान की आपत्तियों से जुड़ा है। 

प्रश्न 5: Indus Waters Treaty 1960 में किन बातों का प्रावधान है?

उत्तर: इसके तहत तीन पूर्वी नदियों का पानी भारत को और तीन पश्चिमी नदियों का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान को आवंटित किया गया है, साथ ही विवाद सुलझाने के लिए एक त्रि-स्तरीय व्यवस्था दी गई है।

प्रश्न 6: Permanent Court of Arbitration की इस मामले में क्या भूमिका है?

उत्तर: पाकिस्तान की सीधी अपील पर पीसीए ने इस मामले में दखल दिया है, लेकिन भारत द्वारा इस प्रक्रिया का पूरी तरह से बहिष्कार करने के कारण इसकी वैधता विवादों में है।

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