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छात्र प्रदर्शन से जुड़े FIR सुप्रीम कोर्ट ने किए रद्द, अनुच्छेद 142 के तहत लिया गया फैसला

Supreme Court Cancels FIRs Against Students छात्र प्रदर्शन से जुड़े FIR सुप्रीम कोर्ट ने किए रद्द, अनुच्छेद 142 के तहत लिया गया फैसला

Supreme Court Cancels FIRs Against Students

संदर्भ:

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने देशव्यापी नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद के बाद 20 जुलाई से 25 जुलाई 2026 के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े देशभर में दर्ज प्राथमिक चिकित्सा रिपोर्टों या प्राथमिकी (First Information Report – FIR) को पूर्णतः रद्द करने का आदेश दिया। 

  • न्यायालय ने देश के युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया।

एफआईआर (FIR) पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला:

  • खंडपीठ: Student Protest FIR संबंधी निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहाना की तीन-न्यायाधीशों की पीठ (Three-judge Bench) द्वारा 1 सितंबर 2026 को सुनाया गया। 
  • फैसला: कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनों से जुड़े देशभर में दर्ज प्राथमिक चिकित्सा रिपोर्टों या प्राथमिकी (First Information Report – FIR) को पूर्णतः रद्द करने का आदेश दिया।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (States and Union Territories) में हुए प्रदर्शनों पर समान रूप से प्रभावी होगा। 
  • मुख्य न्यायाधीश ने अपने वक्तव्य में कहा कि न्यायालय का यह आदेश प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए एक ‘हीलिंग बाम’ (Healing Balm) यानी मरहम की तरह काम करेगा। 
  • न्यायालय ने रेखांकित किया कि जो छात्र प्रामाणिक और सद्भावनापूर्ण (Bona fide) तरीके से अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन का हिस्सा बने थे, उनके करियर और शैक्षणिक भविष्य को आपराधिक मुकदमों (Criminal Proceedings) के कारण प्रभावित नहीं किया जा सकता। 
  • शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देशित किया है कि 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच की घटनाओं को लेकर छात्रों के खिलाफ कोई भी नई प्राथमिकी (Fresh FIR) दर्ज नहीं की जाएगी। 
  • न्यायालय ने केंद्र सरकार को नीट पेपर लीक प्रकरण से आहत होकर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों और पुलिस कार्रवाई में घायल हुए प्रदर्शनकारियों के लिए तीन महीने के भीतर एक अखिल भारतीय मुआवजा नीति (Pan-India Compensation Policy) तैयार करने का भी आदेश दिया है। 
  • अपवाद: दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार द्वारा फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (Facial Recognition System – FRS) तकनीक के माध्यम से जंतर-मंतर विरोध स्थल पर पहचाने गए 2,873 व्यक्तियों को इस राहत से बाहर रखा गया है।
    • इन व्यक्तियों की गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि (Serious Criminal Antecedents) पाई गई है। पुलिस को इनके खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के मामलों में ‘ताजा और विशिष्ट प्राथमिकी’ (Fresh and Specific FIR) दर्ज कर जांच जारी रखने की अनुमति दी गई है।

छात्रों के ‘प्रदर्शन के अधिकार’ (Right to Protest) पर कोर्ट की टिप्पणी:

सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असंतोष की पवित्रता को दोहराया है: 

  • संवैधानिक रूप से पवित्र: न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाना और विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।
  • समानुपातिक पुलिस बल का नियम (Rule of Proportionality): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी सार्वजनिक आंदोलन या छात्र प्रदर्शन (Student Demonstration) की उपस्थिति मात्र से कानून प्रवर्तन एजेंसियों को छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग या अंधाधुंध लाठीचार्ज (Lathi-charge) करने का अधिकार नहीं मिल जाता। पुलिस की कार्रवाई हमेशा वैध, अनुपातिक और संवैधानिक अधिकारों के प्रति सम्मानजनक होनी चाहिए।

संविधान का अनुच्छेद 142: पूर्ण न्याय की असाधारण शक्ति (Article 142: Power of Complete Justice)

  • परिचय: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142(1) (Article 142) सर्वोच्च न्यायालय को एक अद्वितीय विधिक शक्ति प्रदान करता है।
    • इसके अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है, जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या विषय में ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।
  • आवश्यकता:
    • प्रक्रियात्मक जटिलताओं को दूर करना: सामान्य कानून के तहत, एक बार प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने के बाद उसे बंद करने के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट के पास क्लोजर रिपोर्ट (Closure Report) दाखिल करनी पड़ती है। मजिस्ट्रेट को इसे खारिज करने का विवेकाधिकार होता है, जिससे मामले सालों खिंच सकते हैं।
    • एकल आदेश से राष्ट्रव्यापी समाधान: अनुच्छेद 142 की असाधारण शक्तियों (Extraordinary Powers) के प्रयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने सैकड़ों अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं की आवश्यकता को समाप्त करते हुए एक ही झटके में (At one stroke) पूरे देश की प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया।
  • विधिक दृष्टिकोण:
    • संवैधानिक मर्यादा: प्रेम चंद गर्ग बनाम आबकारी आयुक्त (1962) मामले में कहा गया कि अनुच्छेद 142 का प्रयोग मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के उल्लंघन या वैधानिक कानूनों की स्पष्ट उपेक्षा के लिए नहीं किया जा सकता।
    • असीमित किंतु विवेकाधीन शक्ति: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998) मामले में कोर्ट ने माना कि यह शक्ति विधायी शक्तियों (Legislative Powers) को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उपयोग कानून के अंतराल को पाटने (To fill the lacunae) और ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए एक पूरक के रूप में किया जाना चाहिए।
    • हालिया विकास (2023-2026): न्यायालय ने हाल के वर्षों में अनुच्छेद 142 का दायरा बढ़ाते हुए विवाह के अपूरणीय टूटने (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर सीधे तलाक देने और व्यापक जनहित के मामलों में आपराधिक मुकदमों को सीधे समाप्त करने के लिए इसका रचनात्मक उपयोग किया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: Supreme Court ने छात्रों के खिलाफ FIR क्यों रद्द की?

उत्तर: न्यायालय ने प्रदर्शनकारी युवाओं के भविष्य और करियर को सुरक्षित करने तथा उनके शांतिपूर्ण असंतोष जताने के मौलिक अधिकार (Fundamental Right) को बनाए रखने के लिए प्राथमिकियां रद्द की हैं। 

प्रश्न 2: Student Protest से जुड़े FIR किस मामले में दर्ज किए गए थे?

उत्तर: ये मामले जुलाई 2026 के दौरान देश भर में नीट-यूजी (NEET-UG 2026) प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों और रैलियों के संबंध में दर्ज किए गए थे।

प्रश्न 3: Supreme Court ने FIR रद्द करने के लिए Article 142 का इस्तेमाल क्यों किया?

उत्तर: विभिन्न राज्यों की जटिल कानूनी और प्रक्रियात्मक देरी को दरकिनार कर एक ही आदेश के जरिए देशव्यापी स्तर पर पूर्ण न्याय (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए इसका प्रयोग किया गया।

प्रश्न 4: Article 142 क्या है?

उत्तर: यह भारतीय संविधान का एक विशेष प्रावधान है जो सर्वोच्च न्यायालय को उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए असाधारण आदेश पारित करने की शक्ति देता है। 

प्रश्न 5: Article 142 के तहत Supreme Court को कौन-सी शक्तियां प्राप्त हैं?

उत्तर: इसके तहत न्यायालय को कानून के दायरे में रहते हुए किसी भी प्रक्रियात्मक कानून को शिथिल करने, आदेश जारी करने या डिक्री लागू करने की असीमित न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं।

प्रश्न 6: क्या Supreme Court का यह फैसला सभी Student Protest Cases पर लागू होगा?

उत्तर: नहीं, यह विशिष्ट राहत केवल 20 जुलाई से 25 जुलाई 2026 के मध्य हुए नीट-यूजी पेपर लीक प्रदर्शन से जुड़े मामलों पर ही प्रभावी है। 

प्रश्न 7: छात्रों के Right to Protest को लेकर Supreme Court ने क्या कहा?

उत्तर: न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार संवैधानिक रूप से पवित्र है और कोई भी आंदोलन छात्रों पर अत्यधिक पुलिस बल प्रयोग या लाठीचार्ज को न्यायसंगत नहीं ठहराता। 

प्रश्न 8: FIR रद्द होने के बाद छात्रों को क्या राहत मिलेगी?

उत्तर: इस ऐतिहासिक आदेश के बाद छात्र बिना किसी आपराधिक मुकदमे या पुलिस रिकॉर्ड के डर के अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगे और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन कर सकेंगे। 

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