संविधान एक सौ इकत्तीसवाँ संशोधन विधेयक 2026 | Constitution One Hundred and Thirty-First Amendment Bill 2026

संदर्भ:
लोकसभा में 16 अप्रैल 2026 को संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 (Constitution (131st Amendment) Bill, 2026) पेश किया गया। यह विधेयक भारतीय चुनावी और विधायी ढांचे में एक ऐतिहासिक बदलाव का संकेत है, जिसे मत विभाजन (Division Vote) के बाद पेश किया गया।
- प्रस्तुतकर्ता: अर्जुन राम मेघवाल (केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री)
- मुख्य उद्देश्य: लोकसभा की सीटों में वृद्धि और महिला आरक्षण का त्वरित कार्यान्वयन
- प्रस्तुति तिथि: 16 अप्रैल 2026
- मत परिणाम: पक्ष में 251, विपक्ष में 185
विधेयक की मुख्य विशेषताएं:
- लोकसभा की सीटों में भारी वृद्धि (Expansion of Lok Sabha): विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को वर्तमान 550 से बढ़ाकर 850 करना है। इसमें राज्यों से: अधिकतम 815 सदस्य और केंद्र शासित प्रदेशों से: अधिकतम 35 सदस्य।
- यह विस्तार 1971 की जनगणना के आधार पर लगे “सीट फ्रीज” को समाप्त कर वर्तमान जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करेगा।
- अनुच्छेद 82 में संशोधन और परिसीमन (Amendment to Article 82): वर्तमान में, परिसीमन (Delimitation) 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक स्थगित था। यह विधेयक इस प्रतिबंध को हटाता है।
- संसद अब कानून बनाकर यह तय कर सकेगी कि परिसीमन कब और किस जनगणना के आधार पर होगा। संकेत मिले हैं कि 2029 के चुनावों के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा सकता है।
- महिला आरक्षण का त्वरित क्रियान्वयन (Expedited Women’s Reservation): 106वें संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) में प्रावधान था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद की जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा।
- अनुच्छेद 334A में बदलाव, यह विधेयक जनगणना की अनिवार्यता वाली शर्त को हटाकर इसे परिसीमन के तुरंत बाद लागू करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
- इसके माध्यम से 2029 के आम चुनाव में ही 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित करने का लक्ष्य है।
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नोट: परिसीमन आयोग 2026 (Delimitation Commission): विधेयक के साथ ‘परिसीमन विधेयक, 2026’ भी पेश किया गया है, जो एक नए आयोग के गठन का प्रावधान करता है:
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प्रमुख चिंताएं:
- संघीय ढांचा (Federal Balance): उत्तर भारत (अधिक जनसंख्या वृद्धि) बनाम दक्षिण भारत (सफल जनसंख्या नियंत्रण) के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का असंतुलन चिंता का विषय है। हालांकि, सरकार ने आश्वासन दिया है कि दक्षिणी राज्यों की सीटों का अनुपात कम नहीं होने दिया जाएगा।
- राज्यसभा की शक्ति: लोकसभा की सीटें बढ़ने से संयुक्त सत्र (Joint Sitting) और राष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा की सापेक्ष शक्ति कम हो सकती है।
- प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता: सीटों की संख्या बढ़ने से एक सांसद के लिए निर्वाचन क्षेत्र छोटा होगा, जिससे जवाबदेही और शासन बेहतर होने की उम्मीद है।