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विमुक्त जनजातियों की जनगणना प्रपत्र 2027 में अलग कॉलम की मांग (Demand for separate column for Denotified Tribes in Census Form 2027) | UPSC Preparation

Demand for separate column for Denotified Tribes in Census Form 2027

Demand for separate column for Denotified Tribes in Census Form 2027

संदर्भ:

हाल ही में विमुक्त जनजातियों (Denotified Tribes – DNTs) ने जनगणना 2027 में अपनी विशिष्ट पहचान के लिए एक अलग ‘कॉलम’ और पृथक ‘संवैधानिक मान्यता’ की मांग की है। 

विमुक्त जनजातियां (Denotified Tribes – DNTs) कौन है?

भारत के सामाजिक ढांचे में ‘विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू’ (DNTs – Denotified, Nomadic and Semi-Nomadic Tribes) समुदाय वे समूह हैं जिन्हें इतिहास में सबसे अधिक उपेक्षित किया गया है। इन्हें अक्सर “अदृश्य समुदाय” कहा जाता है क्योंकि इनकी कोई स्थायी पहचान या सटीक जनगणना डेटा उपलब्ध नहीं रहा है।

  • विमुक्त जनजातियाँ (Denotified Tribes – DNT): ये वे समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान “जन्मजात अपराधी” घोषित किया गया था। जिसे भारत सरकार ने निरस्त कर इन्हें “विमुक्त” (आजाद) कर दिया। इसीलिए इन्हें ‘विमुक्त जनजाति’ कहा जाता है।
  • घुमंतू जनजातियाँ (Nomadic Tribes): ये वे लोग हैं जो आजीविका की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर निरंतर यात्रा करते रहते हैं। इनका कोई स्थायी घर नहीं होता।
  • अर्ध-घुमंतू जनजातियाँ (Semi-Nomadic Tribes): ये वे समुदाय हैं जो मूलतः घुमंतू हैं, लेकिन साल के कुछ महीनों में एक निश्चित स्थान पर टिक कर रहते हैं और बाकी समय यात्रा करते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 

  • क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871: ब्रिटिश सरकार ने लगभग 200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। उन्हें सख्त निगरानी और आवाजाही पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।  
  • विमुक्ति (1952): स्वतंत्रता के बाद, 31 अगस्त 1952 को इस काले कानून को निरस्त किया गया, जिसके बाद ये समुदाय ‘विमुक्त’ (Denotified) कहलाए। इसीलिए 31 अगस्त को ये समुदाय अपना ‘मुक्ति दिवस’ मनाते हैं।  
  • आदतन अपराधी अधिनियम (Habitual Offenders Act): हालांकि 1871 का कानून हटा दिया गया, लेकिन इसके स्थान पर लाए गए 1952 के इस अधिनियम ने पुलिस को इन पर निगरानी रखने की शक्ति प्रदान की, जिससे सामाजिक उपेक्षिता बनी रही ।

इनकी प्रमुख मांगें:

  • पृथक जनगणना कॉलम: वर्तमान में DNTs को SC, ST या OBC श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान लुप्त हो जाती है। वे 2027 की जनगणना में एक समर्पित ‘कोड’ की मांग कर रहे हैं।
  • संवैधानिक अनुसूची: SC और ST की तरह, DNTs के लिए संविधान में एक अलग अनुसूची (Schedule) बनाने की मांग की जा रही है ताकि उन्हें कानूनी संरक्षण मिल सके।
  • उप-वर्गीकरण (Sub-classification): हालिया सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए, समुदाय के भीतर ‘ग्रेडेड पिछड़ेपन’ (Graded Backwardness) को पहचानने और आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग की गई है। 

प्रमुख सरकारी प्रयास और सिफारिशें:

  • DWBDNC: ‘विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के लिए विकास और कल्याण बोर्ड’ की स्थापना।
  • कालेलकर आयोग (1953): DNTs को अलग श्रेणी के रूप में पहचानने का पहला सुझाव।
  • रेनके आयोग (2008): अनुमान लगाया कि इनकी जनसंख्या लगभग 11 करोड़ है। 10% आरक्षण और अलग संवैधानिक दर्जे की सिफारिश की।
  • इदाते आयोग (2017): बताया कि लगभग 267 समुदाय किसी भी श्रेणी (SC/ST/OBC) में शामिल नहीं हैं। इनके लिए एक स्थायी आयोग और अलग मंत्रालय की सिफारिश की।
  • SEED योजना (2022): (Scheme for Economic Empowerment of DNTs) जिसके तहत शिक्षा (कोचिंग), स्वास्थ्य बीमा, आजीविका और आवास के लिए ₹200 करोड़ का प्रावधान किया गया। 
  • RGI की सहमति: हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत के महापंजीयक (RGI) ने 2027 की गणना में इन्हें शामिल करने पर सैद्धांतिक सहमति दे दी है।

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