हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध | Himalayan Griffon Vulture
संदर्भ:
हाल ही में दुधवा टाइगर रिजर्व (DTR) के बफर जोन में 25 हिमालयन ग्रिफॉन गिद्धों (Himalayan Griffon Vultures) की मृत्यु हुई। प्रारंभिक जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, इन गिद्धों की मृत्यु सीधे शिकार के कारण नहीं, बल्कि द्वितीयक विषाक्तता के कारण हुई है।
हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध के बारे मे:
- परिचय: हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध (Gyps himalayensis) हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक विशालकाय शिकारी पक्षी है, जो अपने पारिस्थितिक महत्व और शारीरिक विशेषताओं के कारण ‘प्रकृति के सफाईकर्मी’ के रूप में जाना जाता है।
- आकार और वजन: यह दुनिया के सबसे भारी और बड़े गिद्धों में से एक है। इसका वजन 8 से 12 किलोग्राम और पंखों का फैलाव (wingspan) लगभग 2.5 से 3.1 मीटर तक होता है।
- रंग और दिखावट: वयस्कों का शरीर रेतीले भूरे या मटमैले रंग का होता है, जो उनके गहरे रंग के उड़ने वाले पंखों के साथ स्पष्ट विरोधाभास पैदा करता है। इनकी गर्दन पर सफेद पंखों का एक गुच्छा और सिर पर हल्की सफेद रुई जैसे पंख होते हैं।
- विशेष अंग: इनकी चोंच बहुत मजबूत और पीली होती है, जबकि चेहरे की त्वचा पीली-नीली दिखाई देती है।
- प्राकृतिक आवास: यह मुख्य रूप से 1,200 से 5,500 मीटर की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह चट्टानी ढलानों, खड़ी चट्टानों (cliffs) और ऊंचे पहाड़ों की घाटियों में रहना पसंद करता है।
- भौगोलिक विस्तार: इसका विस्तार अफगानिस्तान से लेकर भूटान तक, तिब्बती पठार, मध्य एशियाई पहाड़ों, चीन और मंगोलिया तक है।
- प्रवास: यह एक ‘स्थानीय प्रवासी’ है। सर्दियों के दौरान, विशेषकर युवा गिद्ध भोजन की तलाश में उत्तर भारत के मैदानी इलाकों (जैसे यूपी, पश्चिम बंगाल, असम) में चले आते हैं।
- आहार: यह एक शुद्ध मुर्दाखोर (Scavenger) है। यह केवल मृत जानवरों (जैसे मवेशी, जंगली हिमालयी तहर, गोरल) के शवों को खाता है।
- पारिस्थितिक महत्व: शवों को जल्दी खाकर यह पर्यावरण से संक्रामक बीमारियों (जैसे एंथ्रेक्स और रेबीज) के प्रसार को रोकता है।
- प्रजनन काल: इनका प्रजनन सीजन आमतौर पर जनवरी में शुरू होता है।
- घोंसला: ये दुर्गम चट्टानों पर टहनियों से बड़ा मंच जैसा घोंसला बनाते हैं।
- अंडे: मादा आमतौर पर केवल एक सफेद अंडा देती है, जिस पर लाल धब्बे होते हैं। अंडे सेने (incubation) में लगभग 54-58 दिन लगते हैं।
- जीवनकाल: ये गिद्ध जंगली वातावरण में 40 से 45 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं।
संरक्षण स्थिति और खतरे:
- IUCN स्थिति: इसे ‘Near Threatened’ (संकट के करीब) श्रेणी में रखा गया है।
- कानूनी सुरक्षा: भारत में यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची IV (Schedule IV) के तहत संरक्षित है।
- मुख्य खतरे:
- पशु चिकित्सा दवाएं: डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) जैसी दर्द निवारक दवाओं का उपयोग, जो मवेशियों के माध्यम से गिद्धों के शरीर में जाकर उनकी किडनी फेल कर देता है।
- विषाक्तता: दुधवा जैसी घटनाओं में देखा गया ‘द्वितीयक विषाक्तता’ (Secondary Poisoning) एक बड़ा खतरा है।
- आवास विनाश: बिजली की लाइनों से करंट लगना और भोजन की कमी अन्य कारण हैं।
| गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत के प्रयास:गिद्ध कार्य योजना (Vulture Action Plan 2020-25): पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गिद्धों की संख्या बढ़ाने और उनके खाद्य स्रोतों को सुरक्षित करने के लिए शुरू की गई।प्रतिबंधित दवाएं: डाइक्लोफेनाक (Diclofenac), केटोप्रोफेन और एसेक्लोफेनाक जैसी पशु चिकित्सा दवाओं पर प्रतिबंध, जो गिद्धों में गुर्दे की विफलता का कारण बनती हैं।संरक्षण और प्रजनन केंद्र (VCBC): बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के सहयोग से पिंजौर (हरियाणा), रानी (असम) सहित देश में 9 केंद्र संचालित हैं। |