लुप्तप्राय हिमालयी रे-फिनड मछली संरक्षण अभियान
Credit: Francis Day
संदर्भ:
हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी कामेंग जिले में रहने वाले स्वदेशी न्यीशी (Nyishi) जनजाति के ‘संगनो कबीले के सदस्यों ने लुप्तप्राय हिमालयी रे-फिनड मछली (Himalayan Ray-Finned Fish) को विलुप्त होने से बचाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया।
- गाँव के प्रधान (Head Gaon Bura) गजाली संगनो ने नव-स्थापित मछली आबादी को फलने-फूलने का समय देने के लिए रिचासो धारा में अगले 5 वर्षों के लिए मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया है।
लुप्तप्राय हिमालयी रे-फिनड मछली (Himalayan Ray-Finned Fish) के बारे मे:
- वैज्ञानिक नाम: स्किज़ोथोरैक्स पेल्ज़ामी (Schizothorax pelzami)।
- वर्गीकरण (Taxonomy): यह मछली ‘एक्टिनोप्टेरिगी’ (Actinopterygii) वर्ग, ‘साइप्रिनिफोर्मिस’ गण और साइप्रिनिडे (Cyprinidae) परिवार से संबंधित है।
- अन्य नाम: इसे वैश्विक स्तर पर ‘ट्रांसकैस्पियन मरिंका’ (Transcaspian Marinka) और अरुणाचल प्रदेश में न्यीशी भाषा में ‘नगारसिंग’ (Ngarsing) कहा जाता है।
- शारीरिक संरचना (Anatomy): यह एक ‘रे-फिनड’ मछली है, जिसके पंख त्वचा की पतली झिल्ली और महीन कांटेदार हड्डियों (Bony Rays) द्वारा समर्थित होते हैं।
- पूंछ की बनावट (Homocercal Tail): इसकी पूंछ के ऊपरी और निचले हिस्से समान होते हैं, जो तेज जलधाराओं में संतुलित थ्रस्ट (गति) उत्पन्न करते हैं।
- मुख तंत्र (Jaw Mechanics): इसका मुंह लचीला और बाहर निकलने योग्य (Protractile) होता है, जो चट्टानों से भोजन खुरचने में मदद करता है।
- शारीरिक आकार: वयस्क होने पर यह Endangered Fish अधिकतम 36 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती है।
- त्वचा की सुरक्षा: इसके शरीर पर बेहद महीन, आपस में जुड़े हुए छिलके (Overlapping Scales) होते हैं, जो पानी के घर्षण को कम करते हैं।
- प्राकृतिक पर्यावास (Habitat): यह मुख्य रूप से उच्च ऊंचाई वाले ठंडे, साफ और अत्यधिक ऑक्सीजन युक्त ग्लेशियर के मीठे पानी (Freshwater) के झरनों में पाई जाती है।
- पारिस्थितिक श्रेणी (Niche): यह एक बेंथोपेलैजिक (Benthopelagic) जीव है, जो मुख्य रूप से नदी की तलहटी और मध्य जल स्तंभ में सक्रिय रहती है।
- भौगोलिक वितरण: उप-हिमालयी क्षेत्रों के अलावा यह अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान के पहाड़ी नदी बेसिनों (जैसे भूमिगत क्वानात नहरों) में मूल रूप से मौजूद है।
- जैव-सूचक (Bio-indicator): जल की गुणवत्ता, तापमान और प्रदूषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण इसे River Ecosystem के स्वास्थ्य का सटीक पैमाना माना जाता है।
- आहार (Diet): यह मुख्य रूप से शाकाहारी/मिश्रित आहारी है, जो नदी के पत्थरों पर जमी शैवाल (Algae) और छोटे जलीय जीवों को खाती है।
- प्रजनन (Reproduction): यह केवल सुरक्षित, कम गहरे और कम बहाव वाले पर्वतीय क्षेत्रों में ही सुरक्षित रूप से अंडे देती है।
- संरक्षण स्थिति (IUCN Status): वैश्विक स्तर पर IUCN द्वारा इसे ‘Least Concern’ माना गया है, परंतु भारत के पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों में आवास विनाश के कारण यह संकटग्रस्त (Endangered Species) श्रेणी में है।
- पारिस्थितिक खतरा: यह प्राकृतिक रूप से बड़ी शिकारी मछलियों, विशेषकर ‘पानी के बाघ’ कही जाने वाली आक्रामक महसीर (Mahseer) मछली के अत्यधिक शिकार का शिकार बनती है।
FAQs:
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हिमालयी रे-फिनड मछली क्या है?
वैज्ञानिक रूप से Schizothorax pelzami (सामान्य नाम: ट्रांसकैस्पियन मरिंका, स्थानीय नाम: न्यीशी भाषा में ‘नगारसिंग’) के रूप में जानी जाने वाली यह मछली कार्प और मिनो परिवार (Cyprinidae) से संबंधित एक विशिष्ट ताजे पानी की प्रजाति (Freshwater Fish) है।
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यह मछली संकटग्रस्त या असुरक्षित क्यों है
इसके विलुप्त होने के मुख्य कारणों में शामिल हैं: महसीर मछली का अत्यधिक शिकार दबाव (Predation Pressure)। मानव जनित गतिविधियाँ और आवास विखंडन (Habitat Degradation)।
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इसके संरक्षण के लिए अभियान क्यों शुरू किया गया?
स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने और अपनी लुप्त होती जनजातीय सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखने के लिए संगनो भाइयों द्वारा यह स्वैच्छिक Aquatic Conservation अभियान शुरू किया गया ताकि कृत्रिम पर्यावास बनाकर इस दुर्लभ प्रजाति को नया जीवन दिया जा सके।
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यह मछली किन क्षेत्रों में पाई जाती है?
वैश्विक स्तर पर यह प्रजाति मध्य एशिया और उसके आसपास (जैसे तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान) के पर्वतीय नदी बेसिन में दर्ज है। भारत में यह पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश के उच्च ऊंचाई वाले ठंडे पहाड़ी झरनों में पाई जाती है।
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जैव विविधता संरक्षण में इसका क्या महत्व है?
यह जलीय खाद्य श्रृंखला (Aquatic Food Chain) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और शैवाल (Algal growth) को नियंत्रित कर नदी पारिस्थितिकी तंत्र को साफ रखती है।
