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दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता संशोधन विधेयक 2025 | UPSC

Insolvency and Bankruptcy Code Amendment Bill 2025

Insolvency and Bankruptcy Code Amendment Bill 2025

संदर्भ:

हाल ही में लोक सभा द्वारा दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 (Insolvency and Bankruptcy Code Amendment Bill) को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। इस विधेयक में दिवालियापन और दिवालिया संहिता 2016 के मूल कानून में 12 महत्वपूर्ण संशोधन किए गए है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य समाधान प्रक्रिया में होने वाली न्यायिक और प्रक्रियात्मक देरी को समाप्त करना है। 

विधेयक की मुख्य विशेषताएं:

  • लेनदार-संचालित समाधान प्रक्रिया (CIIRP): पुराने और कम प्रभावी ‘फास्ट-ट्रैक’ तंत्र के स्थान पर एक नया ‘क्रेडिटर-इनीशिएटेड इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस’ शुरू किया गया है।
    • इसमें चुनिंदा वित्तीय संस्थान अदालती हस्तक्षेप के बिना (out-of-court) समाधान प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
    • प्रक्रिया के दौरान प्रबंधन ‘डैटर-इन-पजेशन’ मॉडल के तहत मौजूदा बोर्ड के पास ही रहेगा, लेकिन उस पर रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) की निगरानी होगी।
  • सख्त समयसीमा (Strict Timelines): देरी को कम करने के लिए नए समयबद्ध प्रावधान किए गए हैं:
    • प्रवेश (Admission): डिफॉल्ट स्थापित होने के बाद NCLT को 14 दिनों के भीतर आवेदन स्वीकार करना अनिवार्य होगा।
    • योजना की स्वीकृति: समाधान योजना प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर उसे स्वीकृत या अस्वीकृत करना होगा।
    • अपील का निपटान: NCLAT को किसी भी अपील का निपटान 3 महीने के भीतर करना होगा।
  • सीमा-पार और समूह दिवाला (Cross-Border & Group Insolvency): विधेयक वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत के बाहर की संपत्तियों और आपस में जुड़ी कंपनियों (Interconnected entities) के एक साथ समाधान के लिए रूपरेखा तैयार करता है।
  • MSME के लिए राहत: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए मतदान की सीमा (voting threshold) को 66% से घटाकर 51% कर दिया गया है, जिससे मौजूदा प्रमोटरों को अपना व्यवसाय बचाने में आसानी होगी।
  • व्यर्थ मुकदमों पर जुर्माना: न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग और अनावश्यक देरी को रोकने के लिए ₹1 लाख से ₹2 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। 

महत्व:

  • बैंकिंग क्षेत्र का स्वास्थ्य: वित्त मंत्री के अनुसार, IBC के माध्यम से अब तक ₹4.11 लाख करोड़ की वसूली की गई है। यह संशोधन फंसे हुए कर्ज (NPA) के त्वरित निपटान में सहायक होगा।
  • व्यवसाय सुगमता (Ease of Doing Business): समयबद्ध निकास (Exit) प्रक्रिया विदेशी निवेशकों के भरोसे को बढ़ाती है और पूंजी के कुशल आवंटन को सुनिश्चित करती है।
  • संवैधानिक और विधिक पहलू: विधेयक स्पष्ट करता है कि सरकारी देय राशि (Government dues) को ‘सुरक्षित लेनदार’ (Secured Creditor) का दर्जा नहीं दिया जाएगा, जो ‘वॉटरफॉल मैकेनिज्म’ में स्पष्टता लाता है।

चुनौतियां: 

वर्तमान में NCLT में 30,000 से अधिक मामले लंबित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून में बदलाव पर्याप्त नहीं है; बुनियादी ढांचे और जजों की संख्या में वृद्धि भी उतनी ही आवश्यक है।

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