महात्मा ज्योतिराव फुले | Mahatma Jyotirao Phule

संदर्भ:
हाल ही में 11 अप्रैल 2026 को आधुनिक भारत के महान समाज सुधारक, विचारक और क्रांतिकारी कार्यकर्ता महात्मा ज्योतिराव फुले (1827-1890) की 200वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर के साथ ही उनके 200वें जन्मवर्ष (द्विशताब्दी) समारोह (11 अप्रैल 2026 – 11 अप्रैल 2028) का राष्ट्रव्यापी आगाज़ हुआ।
- ‘Phule Across India’ कार्यक्रम के तहत देशभर में सांस्कृतिक संगम और प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा रहा है।
- डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन इस दो वर्षीय समारोह का समन्वय कर रहा है।
आधुनिक भारत के सामाजिक क्रांति के अग्रदूत महात्मा ज्योतिराव फुले:
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जन्म: ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे, महाराष्ट्र के एक ‘माली’ परिवार में हुआ था।
- शिक्षा: उन्होंने स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल, पुणे से शिक्षा प्राप्त की, जहाँ थॉमस पेन की पुस्तक ‘Rights of Man’ ने उनके विचारों को नई दिशा दी।
- जातिगत भेदभाव का अनुभव: 1848 में एक ब्राह्मण मित्र की शादी में हुए अपमान ने उन्हें जाति व्यवस्था की क्रूरता का प्रत्यक्ष बोध कराया, जिसके बाद उन्होंने अपना जीवन दलितों और महिलाओं के उद्धार के लिए समर्पित कर दिया।
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शैक्षिक क्रांति: फुले का मानना था कि “विद्या के बिना मति गई, मति के बिना नीति गई…”
- प्रथम बालिका विद्यालय: 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में उन्होंने भारत का पहला स्वदेशी बालिका विद्यालय खोला।
- सावित्रीबाई फुले का योगदान: उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित कर देश की पहली महिला शिक्षिका बनाया।
- समावेशी शिक्षा: उन्होंने अछूतों (महार और मांग जातियों) के लिए स्कूल खोले और मजदूरों व किसानों के लिए 1855 में रात्रि पाठशाला की शुरुआत की।
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सत्यशोधक समाज (1873): 24 सितंबर 1873 को फुले ने सत्यशोधक समाज (सत्य की खोज करने वाला समाज) की स्थापना की।
- उद्देश्य: पिछड़ी जातियों, दलितों और महिलाओं को मानसिक गुलामी और पुरोहितवाद के शोषण से मुक्त करना।
- सिद्धांत: ईश्वर की प्रार्थना के लिए किसी मध्यस्थ (पुजारी) की आवश्यकता नहीं है। इस समाज ने तर्कवाद और सामाजिक समानता पर बल दिया।
- दलित शब्द का प्रयोग: ज्योतिराव फुले को शोषित वर्गों के लिए पहली बार ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करने का श्रेय दिया जाता है।
सामाजिक सुधार के अन्य महत्वपूर्ण आयाम:
- विधवाओं के लिए कार्य: 1863 में उन्होंने गर्भवती विधवाओं को समाज के तिरस्कार से बचाने के लिए ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की।
- छुआछूत का विरोध: उन्होंने 1868 में अपने घर का पानी का हौज अछूतों के लिए खोलकर एक मिसाल पेश की।
- हंटर कमीशन (1882): उन्होंने हंटर शिक्षा आयोग के समक्ष प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क बनाने की पुरजोर वकालत की।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ:
- गुलामगिरी (1873): यह पुस्तक अमेरिकी दासता विरोधी आंदोलन के सेनानियों को समर्पित है। इसमें उन्होंने जाति प्रथा की तुलना गुलामी से की है।
- शेतकऱ्याचा असूड (1883): इसमें किसानों के शोषण और उनकी बदहाली के कारणों का विवरण है।
- सार्वजनिक सत्य धर्म: उनके मानवतावादी और तर्कसंगत धार्मिक विचारों का संकलन।
- तृतीय रत्न: शिक्षा के महत्व पर आधारित उनका प्रसिद्ध नाटक।
उपाधि:
11 मई 1888 को मुंबई की एक विशाल जनसभा में विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर उन्हें अपना ‘गुरु’ मानते थे।