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Quit India Movement 84th Anniversary – भारत छोड़ो आंदोलन पृष्ठभूमि और कारण जानिए विस्तार से

Quit India Movement 84th Anniversary-  भारत छोड़ो आंदोलन पृष्ठभूमि और कारण जानिए विस्तार से 

Quit India Movement 84th Anniversary

संदर्भ:

9 अगस्त 2026 को देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ (Quit India Movement 84th Anniversary) मनाई गई। इस गौरवशाली दिन को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Indian Freedom Movement) के मील के पत्थर के रूप में याद किया जाता है।

भारत छोड़ो आंदोलन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कारण

  • परिचय: भारत छोड़ो आंदोलन 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया एक ऐतिहासिक जन आंदोलन था। इसका मुख्य लक्ष्य भारत से ब्रिटिश शासन को तुरंत समाप्त करना था।
  • शुरुआत और प्रमुख घटनाक्रम:
    • वर्धा प्रस्ताव और बॉम्बे घोषणा (Wardha Resolution & Bombay Declaration):
  • वर्धा बैठक: जुलाई 1942 में कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने वर्धा में अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का प्रस्ताव पारित किया।
  • ऐतिहासिक घोषणा: 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने आधिकारिक तौर पर भारत छोड़ो प्रस्ताव को मंजूरी दी।
  • महात्मा गांधी का आह्वान: इसी मंच से महात्मा गांधी ने राष्ट्र को ‘करो या मरो’ (Do or Die) का ऐतिहासिक मंत्र दिया, जिसका अर्थ था या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे।
  • ऑपरेशन थंडरबोल्ट और नेतृत्व शून्यता (Operation Thunderbolt):
    • नेताओं की गिरफ्तारी: 9 अगस्त 1942 की सुबह ब्रिटिश सरकार ने ‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट’ (Operation Thunderbolt) चलाकर गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद सहित कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
    • अज्ञात स्थानों पर नजरबंदी: गांधीजी को पुणे के आगा खां पैलेस में और अन्य नेताओं को अहमदनगर किले में बंद कर दिया गया।
    • अगस्त क्रांति: शीर्ष नेतृत्व के जेल जाने के बाद आम जनता ने आंदोलन की कमान खुद संभाल ली। 9 अगस्त को ही अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराया, जिससे इसे अगस्त क्रांति आंदोलन (August Kranti Movement) का नाम मिला।
  • कारण: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (Freedom Struggle of India) के इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन 1942 (Quit India Movement 1942) एक अत्यंत युगांतकारी घटना थी। इस व्यापक जन-आंदोलन की शुरुआत के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
  • क्रिप्स मिशन की विफलता (Failure of Cripps Mission): मार्च 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भारत आया। ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों का समर्थन चाहती थी। क्रिप्स मिशन ने युद्ध के बाद भारत को ‘डोमिनियन स्टेटस’ (Dominion Status) देने का प्रस्ताव रखा, जिसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने खारिज कर दिया। महात्मा गांधी ने इसे ‘एक दिवालिया बैंक के नाम आगे की तारीख का चेक’ (Post-dated cheque on a crashing bank) कहा।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के आर्थिक प्रभाव (Economic Impacts of WWII): युद्ध के कारण भारत में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही थीं। खाद्यान्न की भारी कमी हो गई थी और ब्रिटिश शासन के प्रति जनता में तीव्र असंतोष व्याप्त था।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश पीछे हटना (British Retreat from South-East Asia): विश्व युद्ध में जापान की सेनाएं तेजी से भारत की ओर बढ़ रही थीं। सिंगापुर, मलाया और बर्मा से ब्रिटिश सेनाओं के पीछे हटने के तरीके से भारतीयों को स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज उनकी रक्षा करने में असमर्थ थे।

प्रमुख व्यक्तित्व और उनका योगदान:

भारत छोड़ो आंदोलन इतिहास (Quit India Movement History) के पन्नों में अपनी अप्रत्याशित जनभागीदारी के लिए अमर है। इसमें विभिन्न नेताओं ने भूमिगत होकर और मोर्चे पर रहकर नेतृत्व किया: 

  • महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi Quit India Movement): आंदोलन के वैचारिक सूत्रधार, जिन्होंने अहिंसक प्रतिरोध की चरम सीमा के रूप में इस अंतिम संघर्ष की रूपरेखा तैयार की।
  • अरुणा आसफ अली (Aruna Asaf Ali): इन्हें ‘1942 आंदोलन की वीरांगना’ कहा जाता है। उन्होंने सरकारी दमन के बीच तिरंगा फहराया और बाद में भूमिगत होकर आंदोलन का संचालन किया।
  • जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया: इन्होंने हजारीबाग जेल से भागकर ‘आजाद दस्ता’ का गठन किया। इन नेताओं ने भूमिगत गतिविधियों और गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) के जरिए ब्रिटिश शासन को पंगु बना दिया।
  • उषा मेहता (Usha Mehta): उन्होंने ब्रिटिश सेंसरशिप को धता बताते हुए गुप्त रूप से ‘कांग्रेस रेडियो’ (Secret Congress Radio) की शुरुआत की, जिसने पूरे देश में आंदोलन की खबरों का प्रसारण किया।
  • क्षेत्रीय समानांतर सरकारें (Parallel Governments):
    • बलिया (उत्तर प्रदेश) में चित्तू पांडे ने पहली समानांतर सरकार बनाई।
    • तामलुक (बंगाल) में जातीय सरकार का गठन हुआ, जिसमें मातंगिनी हाजरा ने शहादत दी।
    • सतारा (महाराष्ट्र) में वाई.बी. चव्हाण और नाना पाटिल के नेतृत्व में सबसे लंबे समय तक चलने वाली प्रति सरकार स्थापित हुई।

आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व:

  • ब्रिटिश शासन का भ्रम टूटना (End of British Rule Illusion): इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन (British Rule in India) को यह अहसास करा दिया कि वे अब भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध उन पर शासन नहीं कर सकते। स्वतंत्रता अब समय की बात रह गई थी।
  • अभूतपूर्व जनभागीदारी (Mass Participation): इसमें छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों और सरकारी कर्मचारियों ने भी खुलकर भाग लिया। यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा स्वतःस्फूर्त आंदोलन (Spontaneous Movement) था।
  • नेतृत्व की नई पीढ़ी का उदय: शीर्ष नेताओं के जेल में होने से स्थानीय और युवा नेताओं (जैसे अच्युत पटवर्धन, सुचेता कृपलानी) का उदय हुआ, जिन्होंने भविष्य के स्वतंत्र भारत के राजनीतिक परिदृश्य को आकार दिया।
  • राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा: इस आंदोलन ने देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना और संप्रभुता की भावना को इस कदर स्थापित कर दिया कि इसके बाद कोई भी दमन चक्र उसे दबा नहीं सका।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत कब हुई थी?

उत्तर: इस ऐतिहासिक आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत महात्मा गांधी के नेतृत्व में 9 अगस्त 1942 को बॉम्बे के ग्वालिया टैंक मैदान से हुई थी।

प्रश्न 2: भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ कब मनाई गई?

उत्तर: भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ (Quit India Movement Anniversary 2026) देश भर में 9 अगस्त 2026 को आधिकारिक रूप से मनाई गई।

प्रश्न 3: भारत छोड़ो आंदोलन को अगस्त क्रांति क्यों कहा जाता है?

उत्तर: अगस्त के महीने (9 अगस्त) में शुरू होने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक तीव्र, स्वतःस्फूर्त क्रांतिकारी रूप लेने के कारण इसे अगस्त क्रांति कहा जाता है।

प्रश्न 4: भारत छोड़ो आंदोलन का नारा क्या था?

उत्तर: इस आंदोलन का मुख्य और सबसे प्रभावशाली नारा महात्मा गांधी द्वारा दिया गया ‘करो या मरो’ (Do or Die) था।

प्रश्न 5: भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था?

उत्तर: शीर्ष नेताओं की त्वरित गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन मुख्य रूप से आम जनता द्वारा स्वतःस्फूर्त और युवा भूमिगत नेताओं द्वारा संचालित किया गया था।

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