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मतदान के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मतदान के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला | Supreme Court decision on voting rights

Supreme Court decision on voting rights

संदर्भ:

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका की सुनवाई करते हुए यह पुनः स्पष्ट किया है कि भारत में मतदान का अधिकार (Right to Vote) और चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest) संविधान के भाग III के तहत ‘मौलिक अधिकार’ नहीं हैं। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ये अधिकार ‘वैधानिक अधिकार’ (Statutory Rights) हैं, जो संसद द्वारा निर्मित कानूनों के माध्यम से विनियमित किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्णय:

  • पृष्ठभूमि: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने राजस्थान सहकारी समिति चुनावों से संबंधित एक मामले (Ram Chandra Choudhary v. Roop Nagar Dughd Utpadak Sahakari Samiti Ltd.) में यह व्यवस्था दी।
  • वैधानिक दर्जा: न्यायालय ने दोहराया कि मतदान और चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि कानून जैसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 द्वारा दी गई रियायतें हैं। चूंकि ये अधिकार वैधानिक हैं, इसलिए संसद या संबंधित विधायी निकाय कानून बनाकर इन पर उचित प्रतिबंध लगा सकते हैं।
  • अधिकारों में अंतर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘मतदान का अधिकार’ और ‘चुनाव लड़ने का अधिकार’ अलग-अलग हैं। चुनाव लड़ने का अधिकार पात्रता और अयोग्यता की अधिक सख्त शर्तों के अधीन है।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य:

  • अनुच्छेद 326: यह वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है, लेकिन इसे संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में शामिल नहीं किया गया है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार (18 वर्ष) के आधार पर होंगे।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951: मतदान और चुनाव की पात्रता इसी अधिनियम की धाराओं (जैसे धारा 62) के तहत तय होती है।
  • अनुच्छेद 19(1)(a): 2003 के PUCL मामले में कोर्ट ने माना था कि मतदान करना ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हिस्सा है, लेकिन अधिकार का मूल स्वरूप आज भी वैधानिक ही बना हुआ है।
  • अनुच्छेद 325: धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल होने से वंचित नहीं किया जाएगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • एन.पी. पोन्नुस्वामी (1952): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मतदान का अधिकार  वैधानिक है  और इस पर कानून द्वारा लगाई गई सीमाएं लागू होती हैं। 
  • ज्योति बसु बनाम देवी घोषाल (1982): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “चुनाव का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और न ही सामान्य कानून का अधिकार। यह केवल एक कानून द्वारा निर्मित अधिकार है।”
  • PUCL बनाम भारत संघ (2003): इस मामले में न्यायालय ने थोड़ा अलग रुख अपनाते हुए कहा था कि ‘मतदान करना’ अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हिस्सा है। हालांकि, इसे पूर्ण मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया गया।
  • कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006): संवैधानिक पीठ ने पुष्टि की कि मतदान का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है जिसे कानून के माध्यम से बदला या वापस लिया जा सकता है।

मौलिक अधिकार और वैधानिक अधिकार में अंतर:

स्रोत:

  • मौलिक अधिकार: ये संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) द्वारा प्रदान किए गए हैं। ये राज्य के विरुद्ध नागरिकों को प्राप्त ‘प्राकृतिक’ और ‘आधारभूत’ अधिकार हैं।
  • वैधानिक अधिकार: ये संविधान से सीधे नहीं, बल्कि संसद या राज्य विधायिका द्वारा पारित कानूनों (Acts) से उत्पन्न होते हैं (जैसे- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951)।

प्रवर्तन:

  • मौलिक अधिकार: यदि इनका उल्लंघन होता है, तो नागरिक अनुच्छेद 32 के तहत सीधे ‘उच्चतम न्यायालय’ या अनुच्छेद 226 के तहत ‘उच्च न्यायालय’ जा सकते हैं। न्यायालय इनके लिए रिट (Writs) जारी कर सकता है।
  • वैधानिक अधिकार: इनके उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं जाया जा सकता। इसके लिए व्यक्ति को पहले निचली अदालतों या संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होता है।

संशोधन:

  • मौलिक अधिकार: इन्हें केवल संविधान संशोधन द्वारा ही बदला या सीमित किया जा सकता है (केशवानंद भारती केस के ‘मूल ढांचे’ के अधीन)।
  • वैधानिक अधिकार: संसद एक साधारण कानून पारित करके इन्हें कभी भी बदल सकती है, घटा सकती है या पूरी तरह समाप्त कर सकती है।

उदाहरण:

  • मौलिक: समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19)।
  • वैधानिक: मतदान का अधिकार (RPA Act), चुनाव लड़ने का अधिकार, मनरेगा के तहत काम का अधिकार।

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