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भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

Women representation in Indian politics

Image Credit: The Womb

संदर्भ:

हाल ही में जून 2026 में जारी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद भी, 2024 के लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 10.2% रही।

ADR रिपोर्ट के अनुसार भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व: 

  • व्यापकता: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सितंबर 2023 में कानून बनने के बाद से लेकर 2024 के आम चुनावों और उसके बाद देश के 20 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों के कुल 39,789 उम्मीदवारों का गहन विश्लेषण किया।
  • लैंगिक असमानता: भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) के इतिहास में सितंबर 2023 में संसद द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण विधेयक (Women Reservation Bill) को पारित किया गया।
    • इसका मुख्य लक्ष्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करना है। 
    • इस ऐतिहासिक कदम के बावजूद, चुनावी टिकट वितरण में लैंगिक असमानता अभी भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
  • महिलाओं की स्थिति: कानून पारित होने के बाद हुए इन सभी 21 चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा कुल उम्मीदवारों में से केवल 4,073 महिला उम्मीदवारों (मात्र 10.2%) को ही चुनावी मैदान में टिकट दिया गया। 
  • 2024 लोकसभा चुनाव: वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में, जहां देश भर से कुल 8,360 उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया था, वहां महिला उम्मीदवारों की संख्या केवल 800 (9.6%) थी।
    • इन चुनावों के बाद चुनी गई 18वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या (Lok Sabha Women MPs) 74 (14%) तक पहुँची है, जो पूर्ण संख्या के मामले में अब तक का सबसे उच्च स्तर है, लेकिन यह भी 33% के अनिवार्य कोटे से काफी दूर है।
  • शून्य महिला उम्मीदवार वाले निर्वाचन क्षेत्र: रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से 152 निर्वाचन क्षेत्र (लगभग 28%) ऐसे थे, जहाँ एक भी महिला उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ रही थी। यह डेटा राजनीति में महिलाओं की भागीदारी (Women Representation in Politics) के दावों को पूरी तरह नकारता है। 
  • शीर्ष राज्य: 2023 के बाद हुए राज्य विधानसभा चुनावों में ओडिशा में सबसे अधिक 13.9%, दिल्ली में 13.7% और पुडुचेरी में 13.6% महिला उम्मीदवार देखी गईं। किसी भी राज्य में यह आंकड़ा 14% को पार नहीं कर सका। 
  • निचले राज्य: जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में स्थिति सबसे खराब रही, जहाँ कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 4.9% दर्ज की गई।
  • राजनीतिक दलों का टिकट वितरण पैटर्न: राष्ट्रीय पार्टियाँ 33% का बेंचमार्क हासिल करने में पूरी तरह विफल रहीं: 
  • भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने कुल उम्मीदवारों में से लगभग 16% टिकट महिलाओं को दिए। 
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने केवल 13% महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।
  • क्षेत्रीय दलों का बेहतर प्रदर्शन कुछ राज्य स्तरीय दलों ने बेहतर उदाहरण पेश किया, जैसे नाम तमिलर काची (NTK) ने 50%, बीजू जनता दल (BJD) ने 33%, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने 29% और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने 25% टिकट महिलाओं को आवंटित किए।

महिलाओं की कम राजनीतिक भागीदारी के मुख्य कारण:

  • आंतरिक दलीय लोकतंत्र का अभाव: राजनीतिक दलों के भीतर टिकट बंटवारे की समितियों में पुरुषों का एकाधिकार है। वे महिलाओं की ‘जीतने की क्षमता’ (Winnability) पर संदेह करते हैं।
  • आर्थिक बाधाएं और धनबल: चुनाव लड़ना अत्यधिक खर्चीला हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों में 1 करोड़ रुपये से कम संपत्ति वाली स्वतंत्र महिला उम्मीदवारों की जीत की संभावना मात्र 1.49% रही, जिससे बिना मजबूत पार्टी बैकअप के महिलाओं का आगे आना असंभव हो जाता है। 
  • सच्चे नेतृत्व की जगह सांकेतिकता (Tokenism): स्थानीय निकायों में 50% आरक्षण तो है (जिससे 14 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि सक्रिय हैं), परंतु दलों ने इसे राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर वास्तविक राजनैतिक सशक्तिकरण (Political Empowerment) में बदलने का प्रयास नहीं किया।
  • पारंपरिक सामाजिक मानदंड: आज भी समाज और परिवार में महिलाओं से पारंपरिक देखभाल और रूढ़िवादी भूमिकाओं की अपेक्षा की जाती है, जो उनके पूर्णकालिक राजनीतिक करियर के आड़े आती है।

भारतीय लोकतंत्र में महिला प्रतिनिधित्व का महत्व:

  • संवेदनशील नीति निर्माण: महिला नेतृत्व भारत (Women Leadership India) के नीतिगत ढांचे को स्वास्थ्य, पोषण, बाल सुरक्षा, पेयजल और शिक्षा जैसे बुनियादी और आवश्यक सामाजिक मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
  • पारदर्शी और जवाबदेह शासन: स्थानीय निकायों के अनुभवों से सिद्ध हुआ है कि जब महिलाएँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होती हैं, तो विकास कार्यों में भ्रष्टाचार कम होता है और प्राथमिकताओं का सही निर्धारण होता है।
  • सच्ची लैंगिक समानता: संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की मजबूत उपस्थिति समाज के अन्य क्षेत्रों की युवतियों को भी नेतृत्व की भूमिकाएं अपनाने के लिए प्रेरित करती है, जिससे समाज में पुरुषों के वर्चस्व वाली रूढ़ियाँ टूटती हैं।

FAQs: 

प्रश्न 1: भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कितना है?

उत्तर: वर्तमान 18वीं लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व (Women in Parliament) केवल 14% (74 महिला सांसद) है, जबकि देश के कुल विधायकों और सांसदों में महिलाओं का औसत मात्र 10% के आसपास ही टिका हुआ है।

प्रश्न 2: महिला आरक्षण का क्या महत्व है?

उत्तर: यह कानून विधायी निकायों में महिलाओं की न्यूनतम एक-तिहाई सीटें सुरक्षित कर उनके राजनैतिक सशक्तिकरण (Political Empowerment) को सुनिश्चित करता है और उन्हें नीति-निर्माण में मुख्य भूमिका प्रदान करता है।

प्रश्न 3: राजनीति में महिलाओं की भागीदारी क्यों आवश्यक है?

उत्तर: संतुलित सामाजिक नीतियां बनाने, लैंगिक समानता (Gender Equality) की स्थापना करने, शासन को अधिक पारदर्शी बनाने और देश की आधी आबादी की समस्याओं को मुख्यधारा में उठाने के लिए यह अनिवार्य है।

प्रश्न 4: महिला आरक्षण कानून क्या है?

उत्तर: इसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ (Women Reservation Bill) कहा जाता है, जो लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% चुनावी सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है।

प्रश्न 5: लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका क्या है?

उत्तर: भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) में महिलाएँ एक जागरूक मतदाता, उत्तरदायी जनप्रतिनिधि और नीति-निर्माता के रूप में समाज के हर वंचित वर्ग के अधिकारों की रक्षा कर शासन को समावेशी बनाती हैं।देता है और देश को रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाता है।

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