जलियांवाला बाग हत्याकांड की 107वीं वर्षगांठ | 107th anniversary of the Jallianwala Bagh massacre

संदर्भ:
13 अप्रैल 2026 को जलियांवाला बाग नरसंहार की 107वीं वर्षगांठ मनाई गई। यह दिन भारतीय इतिहास के सबसे दुखद और काले अध्यायों में से एक के रूप में याद किया जाता है।
- श्रद्धांजलि: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर शहीद हुए निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके साहस व बलिदान को याद किया।
- गार्ड ऑफ ऑनर: प्रयागराज जैसे स्थानों पर शहीदों के सम्मान में 21 बंदूकों की सांकेतिक सलामी दी गई और गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।
- राष्ट्रव्यापी स्मरण: देशभर में विभिन्न नेताओं और नागरिकों ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से उन बलिदानियों को याद किया जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी थी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि:
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, भारत ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में जनशक्ति और संसाधनों के साथ भारी सहयोग किया था, इस उम्मीद में कि युद्ध के बाद भारत को स्वशासन (Self-rule) मिलेगा। हालांकि, युद्ध समाप्त होने पर अंग्रेजों ने रौलेट एक्ट (Rowlatt Act) पारित किया, जिसे ‘काला कानून’ कहा गया।
- दमनकारी कानून: यह कानून सरकार को बिना किसी मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को 2 साल तक जेल में रखने की शक्ति देता था।
- नेताओं की गिरफ्तारी: अमृतसर के लोकप्रिय नेताओं, डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को इस कानून के तहत गिरफ्तार कर देश निकाला दे दिया गया।
- तनाव: इन गिरफ्तारियों के विरोध में अमृतसर में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिसके बाद शहर में मार्शल लॉ लगा दिया गया और सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
13 अप्रैल 1919: उस काली दोपहर का विवरण:
13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार था। हजारों लोग, जिनमें बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे शामिल थे, अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा के लिए और बैसाखी मेला देखने के लिए इकट्ठा हुए थे।
- जनरल डायर की क्रूरता: ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनोल्ड डायर ने इस सभा को अपनी अवज्ञा माना। उसने अपने सैनिकों के साथ बाग के एकमात्र संकरे निकास द्वार को घेर लिया।
- अंधाधुंध गोलीबारी: बिना किसी चेतावनी के, डायर ने सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया। लगभग 10-15 मिनट तक लगातार फायरिंग हुई, जिसमें 1650 राउंड गोलियां चलीं।
- त्रासदी: लोग जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने लगे या वहां मौजूद इकलौते कुएं (शहीदी कुआं) में कूद गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए, लेकिन अनाधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार यह संख्या 1000 से अधिक थी।
हंटर आयोग और जांच:
हत्याकांड की वैश्विक निंदा के बाद, ब्रिटिश सरकार ने 14 अक्टूबर 1919 को हंटर आयोग (Disorders Inquiry Committee) का गठन किया।
- डायर का पक्ष: जांच के दौरान डायर ने स्वीकार किया कि उसका उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि भारतीयों के मन में ‘नैतिक प्रभाव’ (Moral Effect) पैदा करना था।
- निष्कर्ष: आयोग ने डायर की आलोचना की, लेकिन उसके खिलाफ कोई सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। उसे केवल सेवा से मुक्त कर वापस इंग्लैंड भेज दिया गया, जहाँ कई अंग्रेजों ने उसे ‘भारत का रक्षक’ मानकर चंदा इकट्ठा किया।
राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव:
इस घटना ने भारतीय राष्ट्रवाद की लौ को और तेज कर दिया। यह ब्रिटिश शासन के नैतिक पतन का प्रतीक बन गया।
- त्याग और विरोध: विरोध स्वरूप रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि लौटा दी। महात्मा गांधी ने अपनी ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि वापस कर दी और असहयोग आंदोलन की शुरुआत की।
- शहीद उधम सिंह का बदला: इस नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी रहे शहीद उधम सिंह ने इसका बदला लेने की कसम खाई। उन्होंने 13 मार्च 1940 को लंदन में उस समय के पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसने डायर के कृत्य का समर्थन किया था।
तथ्य:
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जलियांवाला बाग स्मारक: आज जलियांवाला बाग एक राष्ट्रीय स्मारक है जिसे 1961 में जनता के लिए खोला गया था।
- बुलेट मार्क: बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं जिन्हें संरक्षित किया गया है।
- शहीदी कुआं और अमर ज्योति: यह स्थान आने वाली पीढ़ियों को उन निर्दोषों के बलिदान की याद दिलाता है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की नींव अपनी आहुति से रखी