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पारंपरिक पवित्र उपवन ओरण

Traditional sacred groves

traditional sacred groves

संदर्भ:

हाल ही में भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने ओरण को ‘वन’ (Forests) के रूप में मान्यता देने और उन्हें संवैधानिक व कानूनी संरक्षण प्रदान करने के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया।

ओरण (Orans) क्या हैं?

  • परिचय: ओरण राजस्थान के पारंपरिक ‘पवित्र उपवन’ हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा सदियों से धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण संरक्षित किया गया है। ये रेगिस्तानी जैव विविधता, जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के केंद्र हैं, जहाँ मानवीय हस्तक्षेप बहुत कम होता है।
  • मूल और महत्व: ओरण (Oran) राजस्थान के थार रेगिस्तान में पाए जाने वाले पवित्र जंगल हैं। ये गोगाजी, पाबूजी, और देवनारायण जैसे स्थानीय देवताओं को समर्पित होते हैं।
  • पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance):
    • जैव विविधता का संरक्षण: ओरण दुर्लभ वनस्पतियों और जीवों को सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं।
    • जल संरक्षण: ये शुष्क रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
    • ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB): ओरण भारत के सबसे लुप्तप्राय पक्षी, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, के लिए एक प्राकृतिक आवास हैं।
  • सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व:
    • स्थानीय देवता: ये स्थल स्थानीय आस्था का केंद्र हैं और इन्हें पवित्र मानकर काटा नहीं जाता।
    • सामुदायिक भागीदारी: इनका संरक्षण स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता है, जो परंपराओं का पालन करते हैं।
  • कानूनी स्थिति (Current Scenario): राजस्थान सरकार ने ओरण भूमि को वनों के रूप में वर्गीकृत करने और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत इन्हें “सामुदायिक रिज़र्व” घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की है।
  • देश में अन्य नाम: जैसे राजस्थान में ओरण हैं, वैसे ही देश के अन्य हिस्सों में भी पवित्र उपवन हैं:
    • बिहार: सरना
    • हिमाचल प्रदेश: देव वन
    • कर्नाटक: देवराकाडु
    • केरल: कावु
    • मणिपुर: लाई उमंग 

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय:

  • दिसंबर 2024 में टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामले में शीर्ष अदालत ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
    • ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ का दर्जा: भूमि के किसी भी भूखंड को, जिस पर वनस्पति है, को वन संरक्षण अधिनियम (FCA), 1980 के तहत ‘वन’ माना जाएगा, चाहे वे राजस्व रिकॉर्ड में किसी भी नाम से दर्ज हों।
    • मानचित्रण (Mapping): राजस्थान सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह सभी ओरणों, देव-वनों और रूंधों का उपग्रह और ऑन-ग्राउंड मानचित्रण पूरा करे।
    • सामुदायिक रिजर्व: कोर्ट ने सुझाव दिया कि इन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36-C के तहत ‘सामुदायिक रिजर्व’ घोषित किया जाए।
    • राष्ट्रीय नीति: केंद्र सरकार (MoEFCC) को पूरे देश में पवित्र उपवनों के संरक्षण के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने का सुझाव दिया गया है। 

चुनौतियाँ:

  • विकास बनाम संरक्षण: जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा (सौर और पवन ऊर्जा) परियोजनाओं के लिए ओरण भूमि का आवंटन एक बड़ा विवाद रहा है।
  • कानूनी द्वंद्व: ओरणों को ‘वन’ घोषित करने से स्थानीय समुदायों को उनके पारंपरिक चराई (Grazing) अधिकारों के सीमित होने का डर है। यहाँ वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
  • राजस्व रिकॉर्ड की कमी: आधिकारिक रिकॉर्ड में इन्हें अक्सर ‘बंजर भूमि’ (Wasteland) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे इनका अतिक्रमण आसान हो जाता है। 

संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद/अधिनियम

विवरण

अनुच्छेद 21

स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

अनुच्छेद 48A

राज्य का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण की रक्षा और सुधार करे।

अनुच्छेद 51A(g)

नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है कि वे वनों और वन्यजीवों की रक्षा करें।

अनुच्छेद 25

पवित्र उपवनों से जुड़ी धार्मिक प्रथाओं का संरक्षण।

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