Stagflation
संदर्भ:
पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘स्टैगफ्लेशन’ (Stagflation) की गंभीर और चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है।
मुद्रास्फीतिजनित मंदी (Stagflation) क्या है?
स्टैगफ्लेशन एक असामान्य आर्थिक स्थिति है जो दो शब्दों— ‘Stagnation’ (ठहराव) और ‘Inflation’ (मुद्रास्फीति) के मेल से बनी है। यह वह स्थिति है जब किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास की दर धीमी (या नकारात्मक) हो जाती है, बेरोजगारी दर उच्च रहती है, और साथ ही वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें (मुद्रास्फीति) तेजी से बढ़ती हैं। सामान्यतः, आर्थिक मंदी के दौरान कीमतें गिरती हैं, लेकिन स्टैगफ्लेशन में इसके विपरीत व्यवहार होता है।
मुख्य घटक:
- उच्च मुद्रास्फीति (High Inflation): उपभोक्ता वस्तुओं, विशेषकर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में निरंतर वृद्धि।
- ठहरी हुई विकास दर (Stagnant Growth): सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में बहुत कम या शून्य वृद्धि।
- उच्च बेरोजगारी (High Unemployment): उत्पादन कम होने और कंपनियों की लागत बढ़ने के कारण रोजगार के अवसरों में भारी गिरावट।
कारण:
- आपूर्ति पक्ष के झटके (Supply Shocks): जब कच्चे तेल या गैस जैसे अनिवार्य संसाधनों की आपूर्ति अचानक कम हो जाती है, तो उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इसे ‘कॉस्ट-पुश’ मुद्रास्फीति कहते हैं। वर्तमान में इज़रायल-ईरान तनाव और लाल सागर संकट इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- खराब मौद्रिक नीति (Poor Monetary Policy): यदि सरकारें या केंद्रीय बैंक मुद्रा की आपूर्ति बहुत अधिक बढ़ा देते हैं, जबकि उत्पादन क्षमता सीमित होती है, तो यह कीमतों को बढ़ाता है। साथ ही, यदि उद्योग जगत पर करों या नियमों का बोझ अधिक हो, तो विकास रुक जाता है।
- मजदूरी-मूल्य सर्पिल (Wage-Price Spiral): बढ़ती कीमतों को देखकर कर्मचारी अधिक वेतन मांगते हैं, जिससे कंपनियों की लागत और बढ़ती है, जो अंततः कीमतों को और ऊपर ले जाती है।
प्रथम प्रयोग:
‘स्टैगफ्लेशन’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1965 में यूनाइटेड किंगडम के कंजर्वेटिव पार्टी के राजनेता इयान मैकलियोड (Iain Macleod) ने हाउस ऑफ कॉमन्स में अपने एक भाषण के दौरान किया था। उन्होंने ब्रिटेन की तत्कालीन अर्थव्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा था, “हमारे पास अब दोनों दुनियाओं का सबसे बुरा हिस्सा है—एक तरफ ‘स्टैग्नेशन’ (ठहराव) और दूसरी तरफ ‘इन्फ्लेशन’ (मुद्रास्फीति)। हम एक ‘स्टैगफ्लेशन’ की स्थिति में हैं।”
ऐतिहासिक संदर्भ:
स्टैगफ्लेशन का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1970 का दशक है। 1973 में, ओपेक (OPEC) देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर तेल प्रतिबंध लगा दिया। इसके परिणामस्वरूप:
- कच्चे तेल की कीमतें रातों-रात 400% तक बढ़ गईं।
- विकसित देशों में उत्पादन लागत आसमान छूने लगी, जिससे कारखाने बंद होने लगे।
- इसने प्रसिद्ध ‘फिलिप्स वक्र’ (Phillips Curve) को गलत साबित कर दिया, जो मानता था कि महंगाई और बेरोजगारी एक साथ नहीं बढ़ सकते।
वैश्विक प्रभाव:
- क्रय शक्ति में कमी: आम जनता की बचत कम हो जाती है क्योंकि आय स्थिर रहती है लेकिन खर्चे बढ़ जाते हैं।
- नीतिगत दुविधा (Policy Dilemma): केंद्रीय बैंकों के लिए यह स्थिति सबसे कठिन होती है। यदि वे मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो निवेश और कम हो जाता है जिससे बेरोजगारी बढ़ती है। यदि वे विकास के लिए दरें घटाते हैं, तो महंगाई और बेकाबू हो जाती है।
- विकासशील देशों पर दबाव: भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, उनके चालू खाता घाटे (CAD) और राजकोषीय घाटे में भारी वृद्धि होती है।
