Impeachment motion against the Chief Election Commissioner
संदर्भ:
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को उनके पद से हटाने के लिए लाया गया ‘महाभियोग’ (हटाने का प्रस्ताव: Impeachment) संसद द्वारा खारिज कर दिया गया है। राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष दोनों ने विपक्षी दलों द्वारा दिए गए इस नोटिस को अस्वीकार कर दिया है।
संसद द्वारा प्रस्ताव की अस्वीकृति:
- प्रस्ताव: 12 मार्च 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में हटाने का प्रस्ताव पेश किया था।
- हस्ताक्षर: इस नोटिस पर लोकसभा के 130 सदस्यों और राज्यसभा के 63 सदस्यों के हस्ताक्षर थे।
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विपक्ष के मुख्य आरोप: विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार पर पद के दुरुपयोग और पक्षपात के सात गंभीर आरोप लगाए थे, जिनमें मुख्य हैं:
- मतदाता सूची में गड़बड़ी: विशेष रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं को सूची से बाहर करने का आरोप।
- निष्पक्षता का अभाव: चुनाव आयोग पर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम करने और चुनावी धोखाधड़ी की जांच में बाधा डालने का आरोप।
- सार्वजनिक टिप्पणियां: विपक्षी नेताओं (जैसे राहुल गांधी) के खिलाफ कथित तौर पर पक्षपातपूर्ण बयान देना।
- अस्वीकृति: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने जांच के बाद इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सभापति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत मिली शक्तियों का उपयोग करते हुए इसे खारिज किया।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया:
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- कानून: संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को।
- हटाने के आधार: संविधान में केवल दो ही आधारों पर CEC को हटाया जा सकता है: सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity)।
- प्रक्रिया (न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार):
- प्रस्ताव की शुरुआत: लोकसभा में कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस सभापति/अध्यक्ष को दिया जाता है।
- अध्यक्ष/सभापति का निर्णय: पीठासीन अधिकारी इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। वर्तमान मामले में, इसे यहीं पर खारिज कर दिया गया है।
- जांच समिति: यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो तीन सदस्यीय समिति (SC न्यायाधीश, HC मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद) आरोपों की जांच करती है।
- विशेष बहुमत: यदि समिति दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।
- राष्ट्रपति का आदेश: अंत में, राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
