भारत का COP33 (2028) की मेजबानी से पीछे हटने का फैसला | India’s decision to withdraw from hosting COP33 (2028)

भारत सरकार ने साल 2028 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP33) की मेजबानी करने के अपने प्रस्ताव को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 2023 में दुबई (COP28) के दौरान भारत की दावेदारी पेश की थी, लेकिन अप्रैल, 2026 को एशिया-प्रशांत समूह के अध्यक्ष को एक पत्र लिखकर भारत ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की सूचना दी है।
- भारत ने जुलाई 2025 में ही पर्यावरण मंत्रालय के तहत एक विशेष COP33 सेल का गठन कर दिया था, जिसे अब भंग किया जा सकता है।
- भारत के हटने के बाद, अब दक्षिण कोरिया इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए एकमात्र प्रमुख दावेदार बचा है।
इसका मुख्य कारण:
- वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake – GST): 2028 में होने वाला COP33 सम्मेलन पेरिस समझौते के तहत दूसरे ‘ग्लोबल स्टॉकटेक’ का समय होगा। मेजबान देश के रूप में भारत पर विकसित देशों से कड़े लक्ष्य मनवाने और खुद भी अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य (जैसे कोयले का चरणबद्ध अंत) अपनाने का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव होता।
- विकसित देशों की विफलता: पूर्व नीति आयोग CEO अमिताभ कांत के अनुसार, विकसित देश पेरिस समझौते (COP21) की अपनी वित्तीय और तकनीकी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विफल रहे हैं। ऐसे में कॉप सम्मेलनों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
- घरेलू प्राथमिकताएं: 2029 में भारत में आम चुनाव होने हैं। चुनाव से ठीक एक साल पहले इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन की सुरक्षा और लॉजिस्टिक व्यवस्था सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती थी। इसके अलावा, भारत का ध्यान वर्तमान में 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स (अहमदाबाद) जैसे अन्य बड़े आयोजनों पर भी केंद्रित है।
COP क्या है?
COP का अर्थ है ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज’ (Conference of the Parties)। यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है।
- उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को स्थिर करना है ताकि जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोका जा सके।
- कार्यप्रणाली: सभी सदस्य देश (पार्टीज) हर साल मिलते हैं ताकि जलवायु समझौतों (जैसे पेरिस समझौता) के कार्यान्वयन की समीक्षा की जा सके और नए लक्ष्यों पर बातचीत की जा सके।
- इतिहास और भागीदारी: पहली COP बैठक 1995 में बर्लिन, जर्मनी में हुई थी। वर्तमान में इसमें 198 सदस्य (197 देश और यूरोपीय संघ) शामिल हैं।
- महत्वपूर्ण उपलब्धियां:
- COP21 (2015): ऐतिहासिक ‘पेरिस समझौता’ अपनाया गया, जिसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करना है।
- COP28 (2023): पहली बार जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) से दूर जाने (Transitioning away) पर वैश्विक सहमति बनी।
- COP29 (2024): इसे “वित्त COP” के रूप में जाना जाता है, जहाँ विकासशील देशों के लिए नए जलवायु वित्त लक्ष्यों पर चर्चा हुई।
COP सम्मेलनों में भारत का योगदान:
- COP8 (2002): भारत में सम्मेलन का पहली बार आयोजन वर्ष 2002 में किया गया। दिल्ली में आयोजन; विकासशील देशों की जरूरतों पर ध्यान केंद्रित किया।
- पंचामृत (Panchamrit) रणनीति: COP26 (ग्लासगो) में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के पांच मुख्य लक्ष्यों की घोषणा की:
- 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करना।
- 2030 तक अपनी 50% ऊर्जा आवश्यकताएं नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करना।
- अब से 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी करना।
- 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45% से कम करना।
- 2070 तक नेट जीरो (Net Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना।
- वैश्विक पहल और नेतृत्व:
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर COP21 के दौरान इसे लॉन्च किया, जो सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने वाला एक बड़ा वैश्विक मंच बन गया है।
- LiFE (Lifestyle for Environment): COP26 में भारत ने ‘पर्यावरण के लिए जीवन शैली’ का विचार पेश किया, जो व्यक्तिगत व्यवहार में बदलाव के जरिए जलवायु संरक्षण पर जोर देता है।
- ग्रीन क्रेडिट पहल: COP28 (2023) में ग्रीन क्रेडिट पहल (Green Credit Initiative) की शुरुआत हुई।
- ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत ने हमेशा विकसित देशों पर ‘ऐतिहासिक जिम्मेदारी’ निभाने और विकासशील देशों को वित्तीय सहायता (Climate Finance) देने का दबाव बनाया है।