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कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म

Carbon Border Adjustment Mechanism

संदर्भ:

हाल ही में भारत ने यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लागू ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) को एकतरफा कदम करार करते हुए इसे WTO (विश्व व्यापार संगठन) नियमों के खिलाफ और विकासशील देशों के लिए भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी।

‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) क्या है? 

CBAM यूरोपीय संघ की ‘Fit for 55’ योजना का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक उत्सर्जन में 55% की कटौती करना है। इसके तहत आयातित वस्तुओं (जैसे स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक) पर उनकी कार्बन सघनता के आधार पर टैक्स लगाया जाता है ताकि यूरोपीय कंपनियों को उन देशों से “अनुचित प्रतिस्पर्धा” का सामना न करना पड़े जहाँ पर्यावरण नियम कम सख्त हैं।

  • यह 1 जनवरी 2026 से लागू हो चुका है, जिसके तहत आयातकों को अब वास्तविक कार्बन शुल्क का भुगतान करना होगा। 
  • इसे अक्सर ‘कार्बन बॉर्डर टैक्स’ भी कहा जाता है।
  • इसका प्राथमिक लक्ष्य ‘कार्बन लीकेज’ को रोकना है।
  • यदि किसी निर्यातक देश में पहले से ही कार्बन टैक्स का भुगतान किया जा चुका है, तो EU उस राशि को CBAM शुल्क से घटा देता है। 

भारत की मुख्य आपत्तियाँ:

  • CBDR-RC सिद्धांत का उल्लंघन: यह ‘सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां’ (Common But Differentiated Responsibilities) के वैश्विक जलवायु सिद्धांत के खिलाफ है। भारत का तर्क है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है, इसलिए विकासशील देशों पर समान वित्तीय बोझ डालना अन्यायपूर्ण है।
  • निर्यात पर आर्थिक प्रभाव: भारत के कुल निर्यात का लगभग 15% EU को जाता है। अकेले स्टील और एल्युमीनियम क्षेत्र में निर्यात लागत 20-35% तक बढ़ सकती है। GTRI के अनुसार, भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए कीमतों में 15-22% की कटौती करनी पड़ सकती है।
  • MSMEs पर संकट: छोटे उद्योगों के पास कार्बन उत्सर्जन की गणना और रिपोर्टिंग के लिए आवश्यक डेटा और तकनीक का अभाव है। डेटा जमा करने में विफल रहने पर EU ‘डिफ़ॉल्ट वैल्यू’ (उच्चतम उत्सर्जन दर) लागू करता है, जो लागत को और बढ़ा देता है।
  • डेटा गोपनीयता (Data Privacy): EU लगभग 1,000 डेटा पॉइंट्स की मांग करता है, जिससे भारतीय कंपनियों की व्यापारिक गोपनीयता (Confidentiality) को खतरा है।

भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया:

  • WTO में कानूनी चुनौती: भारत ने WTO में इसे भेदभावपूर्ण और ‘Most Favored Nation’ (MFN) सिद्धांत का उल्लंघन बताया है।
  • भारतीय कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS): भारत ने अपना स्वयं का कार्बन बाजार (Indian Carbon Market) शुरू किया है। इसका लक्ष्य भारत में भुगतान किए गए कार्बन मूल्य को EU के टैक्स में से ‘डिटेक्ट’ (कटौती) करवाना है।
  • FTAs में बातचीत: भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं में CBAM एक प्रमुख मुद्दा है। भारत ‘सेक्टर-विशिष्ट छूट’ (Carve-outs) और विशेष रूप से MSMEs के लिए रियायतें मांग रहा है।
  • ग्रीन स्टील रेटिंग: इस्पात मंत्रालय ने घरेलू स्तर पर ‘ग्रीन स्टील’ मानकों और स्टार-रेटिंग को बढ़ावा देना शुरू किया है ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनी रहे।

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