भारत का पहला भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र

संदर्भ:
भारत की अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) द्वारा लद्दाख में देश का पहला भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) संयंत्र विकसित किया जा रहा है। हाल ही में लद्दाख के उपराज्यपाल ने इस परियोजना के त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) को अगले 5 वर्षों के लिए विस्तारित करने की स्वीकृति दी।
भारत के पहले भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र के बारे मे:
- अवस्थिति: यह परियोजना पूर्वी लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित है।
- पूगा घाटी और चूमाथांग क्षेत्र हिमालयन जियोथर्मल बेल्ट के अंतर्गत आते हैं। यह क्षेत्र भारतीय और यूरेशियन विवर्तनिक प्लेटों के टकराव क्षेत्र—इण्डस सूचर ज़ोन (ISZ) के समीप स्थित है।
- क्षमता: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार, इस क्षेत्र में उप-सतही तापमान 240°C से अधिक दर्ज किया गया है, जो बिजली उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है।
- निर्माणकर्ता: इस परियोजना को ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) द्वारा ओएनजीसी एनर्जी सेंटर के माध्यम से लद्दाख प्रशासन और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।
- चरण: यह परियोजना मुख्य रूप से तीन चरणों में क्रियान्वित की जा रही है:
- प्रथम चरण (पायलट प्रोजेक्ट): इसके तहत पूगा घाटी में 1 मेगावाट (MWe) की क्षमता का प्रायोगिक संयंत्र स्थापित किया जा रहा है। इसके लिए ओएनजीसी ने अभूतपूर्व सफलता पाते हुए 1,000 मीटर गहरा भू-तापीय कुआं सफलतापूर्वक ड्रिल किया है। इसका संचालन वित्त वर्ष 2026-27 तक संभावित है।
- द्वितीय चरण (विस्तार): इस चरण में संचित डेटा के आधार पर चूमाथांग क्षेत्र में और अधिक गहरे कुओं की ड्रिलिंग तथा व्यापक सर्वेक्षण किए जाएंगे।
- तृतीय चरण (वाणिज्यिक उत्पादन): दीर्घकालिक स्तर पर इस क्षेत्र की कुल 250 मेगावाट तक की क्षमता का दोहन करने के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर वाणिज्यिक उत्पादन शुरू किया जाएगा।
महत्व:
- सतत एवं सतत (24×7) उपलब्धता: सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, भू-तापीय ऊर्जा मौसम या दिन-रात पर निर्भर नहीं होती।
- इसकी पादप उपलब्धता क्षमता (Availability Factor) 90% से अधिक होती है, जो कोयला संयंत्रों (75%) से भी बेहतर है।
- सर्दियों में जीवन सुगम बनाना: लद्दाख में सर्दियों में तापमान -40°C तक गिर जाता है। इस तकनीक से उत्पन्न गर्म पानी का उपयोग स्पेस-हीटिंग (घरों को गर्म रखने) और ग्रीनहाउस कृषि में ताजी सब्जियों के उत्पादन के लिए किया जाएगा।
- लद्दाख की आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा: सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य चौकियों और स्थानीय आबादी के लिए भारी लागत पर डीजल का परिवहन करना पड़ता है। यह परियोजना स्थानीय स्तर पर स्वच्छ बिजली देकर ग्रिड को आत्मनिर्भर बनाएगी।
प्रमुख चुनौतियां:
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कठिन भौगोलिक परिस्थितियां |
14,000+ फीट की ऊंचाई पर अत्यधिक ठंड और वायुमंडलीय ऑक्सीजन की कमी के कारण कार्यशील विंडो केवल जून से सितंबर तक सीमित रहती है। |
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लॉजिस्टिक संबंधी बाधाएं |
भारी ड्रिलिंग उपकरणों को संकरे पहाड़ी रास्तों और कमजोर पुलों के माध्यम से परियोजना स्थल तक पहुंचाना अत्यधिक जटिल है। |
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तकनीकी एवं पर्यावरणीय जोखिम |
पूर्व में अत्यधिक उच्च दबाव वाले जल प्रवाह के कारण कुएं बंद करने पड़े थे। साथ ही, यह क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील (Ecologically Sensitive Area) है। |
विशेष: भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) पृथ्वी की पपड़ी (Crust) के भीतर मौजूद मैग्मा और रेडियोधर्मी पदार्थों के क्षय से उत्पन्न ऊष्मीय ऊर्जा है।
- कार्यप्रणाली: भूमिगत जलाशयों या गर्म चट्टानों से कुएं खोदकर उच्च दबाव वाली भाप और गर्म पानी को सतह पर लाया जाता है, जिससे टर्बाइन चलाकर बिजली बनती है।
- वर्गीकरण: यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है—विद्युत उत्पादन के लिए उच्च ऊर्जा (High-enthalpy, >200°C) और स्पेस-हीटिंग, कृषि व उद्योगों के लिए निम्न-मध्यम ऊर्जा (Low-medium enthalpy)।
- लाभ: यह एक 24×7 उपलब्ध बेसलोड (Baseload) स्वच्छ ऊर्जा है। मौसम पर निर्भर न होने के कारण इसका उपलब्धता कारक (Availability Factor) 90% से अधिक होता है। साथ ही, यह सौर या पवन की तुलना में बेहद कम भूमि और पानी का उपयोग करती है।
- क्षमता: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)] ने देश में 10 भू-तापीय प्रांतों में 381 गर्म झरनों की पहचान की है, जिससे लगभग 10,600 मेगावाट (MW) विद्युत क्षमता का अनुमान है।
- नीतिगत प्रयास: सरकार ने राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति (2025) लागू की है, जिसमें 100% एफडीआई (FDI), कर छूट और व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) का प्रावधान है।