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हिमालयन ट्राइकारिनेट हिल टर्टल

हिमालयन ट्राइकारिनेट हिल टर्टल

Himalayan Tricarinate Hill Turtle

 

संदर्भ:

हाल ही में छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) के घने जंगलों में अत्यंत दुर्लभ हिमालयन ट्राइकारिनेट हिल टर्टल को देखा गया।

हिमालयन ट्राइकारिनेट हिल टर्टल के बारे में:

  • परिचय: हिमालयन ट्राइकारिनेट हिल टर्टल (Melanochelys tricarinata), जिसे ‘थ्री-कील्ड लैंड टर्टल’ भी कहा जाता है, मुख्य रूप से भूभागीय जीवन जीने वाला एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठा जीव है। 
  • वैज्ञानिक नाम: Melanochelys tricarinata (मूल रूप से 1856 में ब्लिथ द्वारा Geomyda tricarinata के रूप में वर्णित)।
  • जैव-वैज्ञानिक परिवार: यह कछुआ जियोएमीडिडे (Geoemydidae) परिवार से संबंधित है, जो पुरानी दुनिया (Old World) के तालाब और स्थलचर कछुओं का एक बड़ा समूह है।
  • शेल की बनावट (Carapace): इसका ऊपरी खोल (खपड़ा) अत्यधिक गुंबददार (Highly Domed) और लम्बा होता है। इसके कैरापेस पर तीन स्पष्ट अनुदैर्ध्य उभार या धारियाँ (Longitudinal Keels) होती हैं, जो चमकीले पीले या नारंगी-भूरे रंग की होती हैं। इसी त्रिकोणीय उभार के कारण इसका नाम ‘ट्राइकारिनेट’ पड़ा है।
  • रंग और त्वचा: इसका कैरापेस गहरा भूरा, जैतून (Olive) या काले रंग का होता है, जबकि निचला खोल (Plastron) गहरे निशानों के साथ पीलापन लिए होता है। इसका सिर छोटा, नुकीला थूथन वाला और गहरे रंग का होता है।
  • अंगों की अनुकूलता: इसके पैर पूरी तरह से शल्कदार (Scaly Legs) और मजबूत होते हैं, जिनमें जलीय कछुओं की तरह तैरने के लिए ‘वेबिंग’ (Jali) नहीं होती। 
  • आकार: एक वयस्क कछुए के खोल की लंबाई आमतौर पर 16 से 25 सेंटीमीटर के बीच होती है। नर कछुओं की पूंछ मादाओं की तुलना में अधिक लंबी और मोटी होती है। 

पर्यावास और भौगोलिक वितरण:

  • पारंपरिक क्षेत्र: यह प्रजाति ऐतिहासिक रूप से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार), दक्षिणी नेपाल, दक्षिणी भूटान और उत्तरी बांग्लादेश के उप-हिमालयी क्षेत्रों तक ही सीमित मानी जाती रही है।
  • नया माइक्रोहैबिटैट: छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी क्षेत्र में इसकी उपस्थिति यह साबित करती है कि यह शुष्क-नम मिश्रित पर्णपाती जंगलों के भीतर मौजूद नम घाटियों और ‘माइक्रोहैबिटैट्स’ में जीवित रह सकता है।
  • पारिस्थितिकी: यह प्रजाति शुष्क या नम पर्णपाती जंगलों, सदाबहार पर्वतीय जंगलों और हिमालय की तलहटी में स्थित नदी तटीय घास के मैदानों (घास के मैदान जो 300 मीटर तक की ऊंचाई पर हों) में रहना पसंद करती है।

व्यवहार, आहार और प्रजनन विज्ञान:

  • निशाचर और शर्मीला स्वभाव: यह अत्यधिक शर्मीला और एकांतप्रिय जीव है। दिन के समय यह जंगलों में गिरी सूखी पत्तियों के ढेरों (Leaf Litter), सड़े हुए लट्ठों या झाड़ियों के नीचे छिपा रहता है। यह मुख्य रूप से निशाचर (Nocturnal) होता है और रात में सक्रिय होता है।
  • आहार (Trophic Strategy): यह एक सर्वाहारी (Omnivorous) जीव है। इसके मुख्य भोजन में कवक (मशरूम), गिरे हुए जंगली फल, केंचुए, घोंघे (Molluscs), कीड़े-मकोड़े और छोटे मेंढक शामिल हैं।
  • प्रजनन चक्र (Reproduction): यह प्रजाति अंडप्रजक (Oviparous) है। मादा कछुआ एक बार में 1 से 6 अंडे देती है, और इनका ऊष्मायन काल (Incubation Period) लगभग 60 से 72 दिन का होता है। 
    • मानसून के दौरान जब इसके मैदानी पर्यावासों में पानी भर जाता है, तब यह अपेक्षाकृत ऊंचे और सूखे स्थलीय क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो जाता है। 

कानूनी और संरक्षण स्थिति:

  • IUCN रेड लिस्ट: इसे आधिकारिक तौर पर Endangered (लुप्तप्राय) श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है (2020 के नवीनतम मूल्यांकन के अनुसार)।
  • CITES: अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव व्यापार कन्वेंशन के परिशिष्ट-I (Appendix I) में शामिल है, जिसके तहत इसके किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: भारत में इसे अनुसूची-I (Schedule I) के तहत कानूनी सुरक्षा प्राप्त है, जो इसे बाघ और गैंडे के समान उच्चतम सुरक्षा प्रदान करती है और इसके शिकार या कब्जे पर कठोर कारावास का प्रावधान है।

संकट और अस्तित्व को खतरा:

वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे भारत और दक्षिण कोरिया के शोधकर्ताओं की संयुक्त रिपोर्ट) के अनुसार, इस कछुए को निम्नलिखित गंभीर खतरे हैं: 

  • पर्यावास विखंडन: कृषि विस्तार, सड़कों के निर्माण और जंगलों की कटाई के कारण इसके छिपने के प्राकृतिक स्थान तेजी से नष्ट हो रहे हैं।
  • अवैध पेट ट्रेड (तस्करी): इसके अनोखे आकर्षक खोल और दुर्लभता के कारण अंतरराष्ट्रीय ‘एक्सोटिक पेट मार्केट’ (Exotic Pet Market) में इसकी भारी मांग है, जिससे इसका अवैध शिकार बढ़ गया है।
  • स्थानीय अंधविश्वास व उपभोग: कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर इसके मांस के उपभोग और पारंपरिक दवाओं व मुखौटे (Curio Masks) बनाने के लिए भी इसे पकड़ा जाता है। 

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR):

  • स्थापना और स्थान: यह छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी जिलों में फैला हुआ है, जिसे वर्ष 2008 में उदंती और सीतानदी वन्यजीव अभ्यारण्यों को मिलाकर बनाया गया था।
  • सीमाएं: यह पूर्व में ओडिशा के खरियार वन संभाग और सोनबेड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य से सटा हुआ है, जो इसे अंतर-राज्यीय वन्यजीव कॉरिडोर बनाता है।
  • प्रमुख नदियाँ: इस क्षेत्र से उदंती और सीतानदी प्रवाहित होती हैं जो महानदी की सहायक नदियाँ हैं।
  • मुख्य जीव: यहाँ संकटग्रस्त एशियाई जंगली भैंसा (Asiatic Wild Buffalo), बाघ, तेंदुआ और सुस्त भालू पाए जाते हैं।

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