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प्लास्टिक बैंक नोट का प्रस्ताव

प्लास्टिक बैंक नोट का प्रस्ताव

Plastic banknote proposal

 

संदर्भ:

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश में नकदी प्रबंधन को आधुनिक बनाने और छपाई लागत को कम करने के लिए पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंक नोट पेश करने के अपने दशक पुराने प्रस्ताव को पुनर्जीवित किया। जिस पर जल्द ही एक सीमित पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा होने की संभावना है।

भारत में प्लास्टिक नोट की पृष्ठभूमि:

  • अतीत के प्रयास (2012): केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में देश के 5 विभिन्न भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों (कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला) में ₹10 के 1 बिलियन पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल स्वीकृत किया था।
  • विफलता का कारण: तकनीकी चुनौतियों, नोटों के आपस में चिपकने तथा ऑटोमेटेड टेलर मशीनों (ATMs) द्वारा इन्हें प्रोसेस करने में आ रही परिचालन संबंधी बाधाओं के कारण इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। 
  • वर्तमान स्थिति: हालिया रिपोर्टों के अनुसार, एटीएम की तकनीकी सीमाओं को अब सुलझा लिया गया है, जिससे प्लास्टिक केंट नोटों को डिस्पेंस करना आसान हो गया है।

वर्तमान में पॉलिमर नोट्स की आवश्यकता क्यों?

  • मुद्रा की छपाई लागत में भारी उछाल: आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में कागजी नोटों की छपाई पर खर्च बढ़कर ₹6,372.8 करोड़ हो गया, जो इससे पिछले वर्ष ₹5,101.4 करोड़ था। पॉलिमर नोट दीर्घकालिक रूप से इस लागत को कम करेंगे।
  • सॉइल्ड (गंदे/फटे) नोटों का निपटान: वित्त वर्ष 2025 में केंद्रीय बैंक द्वारा 23.8 अरब सॉइल्ड नोटों को प्रचलन से हटाकर नष्ट किया गया। इनमें ₹500 और ₹100 के नोटों की संख्या सबसे अधिक थी।
  • डिजिटलीकरण के बावजूद नकदी की मांग (CiC): यूपीआई (UPI) और डिजिटल भुगतान में तीव्र वृद्धि के बावजूद, भारत में ‘करेंसी इन सर्कुलेशन’ (CiC) 15 मई 2026 तक 11.5% की वार्षिक वृद्धि के साथ ₹42.86 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। छोटे मूल्यवर्ग (₹10 और ₹20) की मांग लगातार उच्च बनी हुई है, जो जल्दी खराब होते हैं।

पॉलिमर बैंक नोटों के मुख्य लाभ:

लंबी शेल्फ लाइफ

यह पारंपरिक सूती-कागज नोटों की तुलना में 2.5 से 4 गुना अधिक टिकाऊ होते हैं।

सुरक्षा विशेषताएं

इनमें उन्नत सुरक्षा तत्व जैसे पारदर्शी विंडो (See-through Windows) और माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोट बनाना लगभग असंभव हो जाता है।

स्वच्छता और प्रतिरोध

ये जल-प्रतिरोधी (Waterproof) होते हैं और इन पर धूल, नमी या तेल आसानी से नहीं चिपकते।

पर्यावरणीय अनुकूलता

फटे हुए पॉलिमर नोटों को पूरी तरह से रीसायकल (Recycle) करके अन्य प्लास्टिक उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिससे कार्बन फुटप्रिंट घटता है।

संभावित चुनौतियाँ:

  • प्रारंभिक उच्च लागत: पॉलिमर नोटों के उत्पादन के लिए आवश्यक मशीनरी और सबस्ट्रेट (Substrate) सामग्री की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों से काफी अधिक होती है।
  • एटीएम और मशीनी अनुकूलन: देशभर के लाखों एटीएम (ATMs) और कैश सॉर्टिंग मशीनों के सेंसर और कैलिब्रेशन को नए सिरे से अपग्रेड करना होगा।
  • भौतिक कमियां: अत्यधिक तापमान (120°C से ऊपर) पर ये सिकुड़ या पिघल सकते हैं (जैसे अनजाने में प्रेस करने पर)। साथ ही नए नोटों के आपस में चिपकने की समस्या भी देखी गई है।

वैश्विक परिदृश्य: विश्व के 60 से अधिक देश वर्तमान में पूर्ण या आंशिक रूप से पॉलिमर केंट नोटों का उपयोग कर रहे हैं: 

  • ऑस्ट्रेलिया: वर्ष 1988 में पॉलिमर नोट जारी करने वाला विश्व का पहला देश बना।
  • अन्य प्रमुख देश: कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, न्यूजीलैंड, वियतनाम, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों ने इसे सफलतापूर्वक अपनाया है।

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